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सबरंग- हमारी याद आएगी: नारायण की कल्पना, शंकर ने बदली हकीकत में

सिनेमा की दुनिया में दक्षिण के दो शंकर मशहूर हैं। एक तो 55 साल के मैकेनिकल इंजीनियर शंकर षणमुगम, जिन्हें दर्शक अनिल कपूर की फिल्म ‘नायक’, रजनीकांत की ‘शिवाजी’ व ‘रोबोट’ के जरिए जानते हैं। जबकि दूसरे शंकर हैं, कन्नड़ फिल्मों के निर्देशक शंकर नाग यानी नागरकट्टे, जिनकी आज 64वीं जयंती है। 90 फिल्मों में अभिनय करने वाले शंकर नागरकट्टे ने थियेटर, फिल्म और टीवी हर माध्यम में खूब नाम कमाया और मात्र 36 साल की उम्र में 30 सितंबर, 1990 को एक सड़क हादसे में उनका निधन हो गया।

1987 में दूरदर्शन पर तीन बार 13-13 कड़ियों के ‘मालगुड़ी डेज’ और प्रमुख किरदार में स्वामी की भूमिका निभाने वाले कलाकार मास्टर मंजूनाथ को खूब लोकप्रियता मिली थी।

कर नाग को लोग नाम से नहीं पहचानते हैं। लेकिन उनके द्वारा निर्देशित धारावाहिक का नाम एक पूरी पीढ़ी के होठों पर मुस्कान ला देता है। यह धारावाहिक था ‘मालगुडी डेज’। 1987 में दूरदर्शन पर तीन बार 13-13 कड़ियों के ‘मालगुड़ी डेज’ और प्रमुख किरदार में स्वामी की भूमिका निभाने वाले कलाकार मास्टर मंजूनाथ को खूब लोकप्रियता मिली। यह धारावाहिक शंकर नाग के लिए चुनौती था क्योंकि उन्हें सीमित संसाधनों में इसे बनाना था। मालगुड़ी एक काल्पनिक गांव था, जिसकी कल्पना लेखक आरके नारायण ने 1923 में दशहरे के दिन की थी। इस धारावाहिक में कार्टून और रेखाचित्र बनाने वाले आरके लक्ष्मण नारायण के भाई थे। नारायण के उपन्यास ‘गाइड’ पर देव आनंद ने गाइड बनाई थी, जो आज क्लासिक फिल्म मानी जाती है। मगर निर्देशक विजय आनंद ने ‘गाइड’ जिस तरह से बनाई, उससे नारायण नाखुश थे। इस वजह से जब दूरदर्शन ने नारायण को उनकी कहानियों पर हिंदी व अंग्रेजी में एक धारावाहिक बनाने का प्रस्ताव दिया था। तब किसी हिंदी निर्देशक के बजाय नारायण ने उस कन्नड़ निर्माता का नाम आगे किया। जिन्होंने उनके उपन्यास पर कन्नड़ फिल्म बनाई थी।

मालगुड़ी चाहे काल्पनिक गांव रहा हो, मगर निर्देशक शंकर ने नारायण के सपने को हकीकत में उतार दिया था। 1985 में इसकी शूटिंग के लिए उन्होंने कर्नाटक स्थित शिमोगा जिले के अगुंबे गांव को चुना था। सौ से ज्यादा लोगों की यूनिट लेकर जब शंकर वहां पहुंचे थे, तो उनके सामने समस्याओं की भरमार थी। हिंदी और अंग्रेजी में बने इस धारावाहिक में स्वामी की भूमिका कर रहे मंजूनाथ को कन्नड़ के अलावा न तो हिंदी आती थी, न अंग्रेजी। यहां तक यूनिट के 80 फीसद लोगों को हिंदी नहीं आती थी। गांव में कोई होटल न होने के कारण यूनिट के लोगों के लिए रहने, खाने व सोने की भी समस्या थी। वहीं किसी का घर इतना बड़ा नहीं था कि वहां पूरी यूनिट को ठहराया जा सके। यह देख गांव वाले आगे आए और उन्होंने अपने घर खोल दिए और कहा कि जहां रहना चाहो रहो, जैसे रहना चाहो रहो। हर दूसरे घर में यूनिट के लोग मेहमान की तरह रहे। कोई छत पर सो रहा था तो कोई आंगन में। पास में बहने वाली नदी में यूनिट नहाती थी और काम पर लग जाती थी।

शंकर के पास बहुत ही कम संसाधन थे। यहां तक कि धारावाहिक में इस्तेमाल होने वाले जानवर और वाहन भी जमा करना एक मुश्किल का काम था। शंकर ने वाहनों की जरूरत तो अपने दोस्तों की गाड़ियां मांग-मांग कर पूरी की। जानवर खासतौर से शिमोगा से लाए गए। भीड़ के दृश्य फिल्माना भी उनके लिए मुसीबत था। गांव में लोग मिलते नहीं थे। किसानी बस्ती थी। लोग खेतों में चले जाते थे। तब आसपास के गांवों से लोगों को यह लालच देकर लाया गया कि उन्हें आने-जाने का किराया और खाना मिलेगा। शंकर की पत्नी अरुंधति निर्देशन में उनकी सहायक थीं। कलाकारों के कपड़ों की डिजाइनिंग का काम भी वह खुद ही कर देती थीं।

1987 में जब यह धारावाहिक प्रसारित हुआ तो अपनी अलग तरह की प्रस्तुति के कारण इसने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया था। दक्षिण भारत की पृष्ठभूमि पर बना यह संभवतया पहला धारावाहिक था, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। यहां तक कि ‘गाइड’ का नाम आते ही जिन नारायण का मुंह कड़वा हो जाता है, उन्होंने एक पार्टी में ‘मालगुड़ी डेज’ में स्वामी की भूमिका निभाने वाले मंजूनाथ की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने स्वामी की जैसी कल्पना की थी, मंजूनाथ ‘मालगुड़ी डेज’ में बिलकुल वैसे ही नजर आते हैं। यही नहीं दर्शकों ने इस धारावाहिकों को खूब पसंद किया। शंकर के लिए इससे बड़ी सफलता और क्या हो सकती थी कि उन्होंने एक काल्पनिक गांव को हकीकत में जमीन पर उतार दिया।

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