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असम के सत्रीय नृत्य की पारंपरिक झलक

असम का लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य सत्रीय नृत्य है। इसकी नींव सत्राधीश गुरु शंकर देव और उनके शिष्य माधव देव ने रखी थी। धीरे-धीरे सत्र में गुरु और शिष्यों के समर्पण और लगन से सत्रीय नृत्य आमजन में रच-बस गया। आज इस नृत्य के कलाकार देश-विदेश में अपनी प्रस्तुति से लोगों का मन मोह लेते हैं। ऐसे ही कलाकार युगल हैं-दीपज्योति और दीपांकर, जिन्होंने भारत एकता संस्कृति उत्सव में नृत्य पेश किया।

सत्रीय नर्तक दीपज्योति और दीपांकर ने अपने नृत्य का आरंभ अंकीय नाच से किया। यह शंकर देव की रचना-‘श्रीकृष्णाय नम: भजे-भजे एक मंगलम’ पर आधारित थी।

असम का लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य सत्रीय नृत्य है। इसकी नींव सत्राधीश गुरु शंकर देव और उनके शिष्य माधव देव ने रखी थी। धीरे-धीरे सत्र में गुरु और शिष्यों के समर्पण और लगन से सत्रीय नृत्य आमजन में रच-बस गया। आज इस नृत्य के कलाकार देश-विदेश में अपनी प्रस्तुति से लोगों का मन मोह लेते हैं। ऐसे ही कलाकार युगल हैं-दीपज्योति और दीपांकर, जिन्होंने भारत एकता संस्कृति उत्सव में नृत्य पेश किया। सत्रीय नर्तक दीपज्योति और दीपांकर ने अपने नृत्य का आरंभ अंकीय नाच से किया। यह शंकर देव की रचना-‘श्रीकृष्णाय नम: भजे-भजे एक मंगलम’ पर आधारित थी। नृत्य में इन कलाकारों ने कृष्ण की वंदना की। सूत्रधारी नृत्य शैली में प्रस्तुत नृत्य में उन्होंने कृष्ण के वासुदेव, देवकीनंदन, गोपकुमार, गोविंद, कृष्णनागरम रूपों का विवेचन किया। उनकी अगली पेशकश शंकर देव के बड़गीत ‘रघुनाथ चरणम’ पर आधारित थी। इसके बोल थे-‘रामाय राचंद्राय रामभद्राय’। इसमें सीता हरण, सेतु बंध और रावण वध के प्रसंगों को नृत्याभिनय के जरिए पेश किया गया। इन दोनों कलाकारों ने सीता और राम के भावों का विवेचन बहुत मार्मिक तरीके से किया।

सत्रीय नर्तक दीपज्योति और दीपांकर ने मिलकर गुवाहाटी में मणिकंचन कला मंजरी नृत्य संस्था का संचालन करते हैं। यहां दोनों कलाकार मिलकर बाल और युवा कलाकारों को सत्रीय नृत्य का प्रशिक्षण देते हैं। इसके साथ ही, मणिकंचन नृत्य महोत्सव का आयोजन गुवाहाटी में करते हैं, जो काफी लोकप्रिय है। उन्होंने प्रहलाद और हिरण्यकश्यप नृत्य रचना की है। इसमें सत्रीय नृत और अभिनय का अच्छा सुयोग है। उन्होंने मेला नाच नृत्य पेश किया। यह रामदानी और रचना ‘हरे कृष्णा हरि बिना’ पर आधारित थी। माधव देव की एक अन्य रचना ‘ब्रम्हादि करी जीव जगत’ में गजेंद्र मोक्ष प्रसंग को पेश किया।

इस सत्रीय नृत्य युगल का मानना है कि सत्रीय नृत्य को संगीत नाटक अकादमी ने मान्यता प्रदान की है। यह असम में तो प्रचलित है, पर देश के अन्य प्रदेशों में लोग इस नृत्य शैली के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं। हमारी कोशिश है कि हम अन्य कलाकारों के साथ मिलकर इसे देश-विदेश में लोकप्रिय बनाएं, ताकि सत्र और सत्रीय नृत्य की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित और समृद्ध हो पाए। उत्सव में शिरकत करने वाले कलाकारों अंजना मोई सैकिया, अमुसाना देवी व नर्मदा देवी और गायत्री डेका शामिल थीं। ओडिशी नृत्यांगना अंजना ने देवी स्तुति पेश की। मणिपुरी नृत्यांगना अमुसाना देवी ने गीत ‘श्रीकृष्ण कानवे यशोदा देव’ पर यशोदा के वात्सल्य भाव को पेश किया। विष्णु के दशावतार को उन्होंने जयदेव की रचना ‘जय जगदीश हरे’ में दर्शाया जबकि, नर्मदा देवी ने गोपालचरण दास की रचना ‘नील कमल दल श्याम घनश्याम’ पर नृत्य किया।

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