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कविताएं: रेत पर मछली और तुम

चलो आज-भरते हैं तुम में... ढेर सारी मिठास... उन मुस्कुराहटों के लिए... जिन्हें समय की रेत पर पड़ी... मछली निगल गई है। उसकी आंखों में है मेरा संदेश, पढ़ना जब फुर्सत मिले।

चलो न आज
एक नई शुरुआत करते हैं,
लिख कर एक कविता
बिखेरते हैं मुस्कान
उन बच्चों के लिए
जिन्होंने अभी-अभी
खाई है नून-रोटी,
जिन्हें स्कूलों में मिला है
दाल की जगह पानी,
जिन्होंने महीनों से
नहीं देखी गुड़ की ढेली।
चलो न आज
हम अपनी कविता में
उतार लाते हैं आसमान
उन स्त्रियों के लिए
जो चूल्हे-चौके से
बाहर निकल कर
कभी नहीं रच सकीं
अपने लिए संसार।

चलो आज हम कविता में
भरते हैं असीम ऊर्जा
उन युवाओं के लिए
जो रोजगार की तलाश में
अपने-अपने घरों से
निकल गए हैं बहुत दूर,
जिनकी मांएं चौखट पर
खड़ीं देख रहीं राह।

चलो एक नई शुरुआत करते हैं,
छोड़ कर धरती पर
अपनी-अपनी देह
कुछ देर बैठते हैं
सफेद रुई से बादलों पर
और रचते हैं प्रेम कविता
उन युगलों के लिए
जो बंदिशों से घबरा कर
सो गए हैं रेल पटरियों पर।

चलो न आज
उतार लाते हैं कविता में
नाउम्मीदियों के गुब्बारे,
पहले उड़ाते हैं फिर फोड़ते हैं
एक-एक कर।
ढूंढ़ कर लाते हैं
बचपन की शैतानियां,
कुछ नादानियां, कुछ टॉफियां
और लाल पुड़िया में चूरन।
चलो आज-
बूढ़ी हो गई सांझ में
भरते हैं सुबह की लालिमा,
लोगों के चेहरे से
छीलते हैं उदासियां,
कहीं से ले आते हैं
कुछ पैकेट उम्मीदों के
और बांटते हैं हौसला।

चलो आज कविता में रचते हैं
चांदी की कुछ बूंदें
पसीना बहा रहे
उन कामगारों के लिए
जो अपने से दुगने वजन की
बोरियां उठा कर भी
नहीं थकते सुबह से शाम।

चलो न आज-
लिखते हैं कुछ प्रेम कहानियां,
एक कहानी में हम
कत्थई आंखों वाली लड़की को
मिलवाते है उसके नायक से
जो पुरानी दिल्ली की
गलियों में जलेबियों का दोना
लिए उसके इंतजार में खड़ा है।

चलो आज-
भरते हैं तुम में
ढेर सारी मिठास
उन मुस्कुराहटों के लिए
जिन्हें समय की रेत पर पड़ी
मछली निगल गई है।
उसकी आंखों में है मेरा संदेश,
पढ़ना जब फुर्सत मिले।

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