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रंगमंच कॉलम में मंजरी श्रीवास्तव का लेख : स्त्री विमर्श के नए आयाम

विद्योत्तमा कहानी है एक ऐसी औरत के अद्भुत साहस व धैर्य की जो राजा विक्रमादित्य की पुत्री और कवि कालिदास की पत्नी होने के नाते चाहती तो पिता के स्नेह और पति के प्रेम भरे संरक्षण में एक निश्चिंत और सुरक्षित जीवन जी सकती थी लेकिन अपने राजसी और आरामदायक जीवन का त्याग करके वह स्वयं के लिए एक चुनौतीपूर्ण भूमिका का चुनाव करती है।
Author नई दिल्ली | June 13, 2016 02:47 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह का तीसरा नाटक ‘विद्योत्तमा’ वरिष्ठ रंगकर्मी मोहन महर्षि द्वारा लिखित व निर्देशित था। विद्योत्तमा कहानी है एक ऐसी औरत के अद्भुत साहस व धैर्य की जो राजा विक्रमादित्य की पुत्री और कवि कालिदास की पत्नी होने के नाते चाहती तो पिता के स्नेह और पति के प्रेम भरे संरक्षण में एक निश्चिंत और सुरक्षित जीवन जी सकती थी लेकिन अपने राजसी और आरामदायक जीवन का त्याग करके वह स्वयं के लिए एक चुनौतीपूर्ण भूमिका का चुनाव करती है। वह शिव की आराधना करने का निर्णय लेती है और समय व स्थान में मुक्त विचरण का इच्छित वरदान महादेव से हासिल करती है। इस शक्ति की वजह से अपने लापता होने और फिर महल में इच्छानुसार वापस आने के बारे में वह कोई भी स्पष्टीकरण देने से इनकार कर देती है।

प्रस्तुति के दौरान कलात्मक अभिव्यक्ति के नए मुहावरों की तलाश में निर्देशक कई बार भटक गए हैं और प्राचीन व समकालीन के बीच एक तादात्म्य स्थापित कर पाने में चूक गए हैं। दरअसल, निर्देशक प्राचीन से समकालीन के बीच का फासला निरंतरता में तय न करके अनायास तय कर लेते हैं और शायद यही वजह है कि कई दृश्य आरोपित लगते हैं। एक दृश्य दूसरे दृश्य से संबद्ध नहीं लगता फिर भी परिधान, वेशभूषा, संगीत और नृत्य के लिहाज से यह नाटक सराहा जा सकता है।

समारोह का चौथा नाटक ‘गजब तेरी अदा’ विद्यालय के निदेशक वामन केंद्रे का जो युद्धबंदी व विश्व शांति की अपील करता है। नाटक एक राजा, उसके सिपाहियों और उनकी पत्नियों के इर्द-गिर्द घूमता है। साम्राज्य विस्तार की अंतहीन लिप्सा या यूं कहें कि साम्राज्य विस्तार के नशे में चूर राजा आए दिन अपने सिपाहियों को युद्ध पर भेज देता है। युद्ध में हुए विनाश, सैनिकों द्वारा किए गए अत्याचार से सैनिकों की पत्नियां द्रवित हो उठती हैं और युद्धबंदी के तमाम उपायों को सोचते हुए अंत में यह निर्णय लेती हैं कि जबतक उनके पति युद्ध खत्म करने का वचन नहीं देते तब तक वे उनके साथ कोई शारीरिक संबंध स्थापित नहीं करेंगी। अंत में विश्व शांति के लिए संघर्षरत वे स्त्रियां विजयी होती हैं। राजा और सिपाहियों को उनके आगे घुटने टेकने पड़ते हैं और वे युद्ध न करने का वचन देते हैं।

यह नाटक इस मायने में भी महत्त्वपूर्ण है कि यह आज भी हमारे समाज में स्त्रियों की दशा को रेखांकित करता है और आला दर्जे के स्त्री विमर्श को वाणी देता है। नाटक का संगीत पक्ष बेहद प्रभावशाली और काव्यात्मक है जो युद्ध, विनाश और मारकाट के दृश्यों के साथ एक संतुलन कायम करता है। कई जगहों पर बहुत हलके-फुल्के ढंग से बहुत गंभीर और संजीदा मुद्दों को उठाया गया है। इसके अलावा, लोक संगीत और लोक नाट्य शैलियों का अद्भुत तालमेल भी देखने को मिला है।

सबसे खास और रोचक बात यह है कि नाटक में अन्य वाद्ययंत्रों के साथ-साथ घंटियों का बहुत सुंदर प्रयोग किया गया है। प्रस्तुति इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि नाटक की नायिकाएं इस बात की प्रतिस्थापना करती हैं कि वे जननी हैं, निर्मात्री हैं इसलिए वे विध्वंस बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगी।

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