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किताबें मिलीं: ‘ताजमहल- छ: फिट नीचे’, ‘कनस्तर में गंगा’, ‘खुद से कई सवाल’ और ‘शिक्षा-परीक्षा और प्रधानमंत्री’

ताजमहल निस्संदेह सौंदर्य और भव्यता का प्रतीक है। पर क्या वह वास्तव में प्रेम का सही प्रतीक भी है? ‘ताजमहल : छ: फिट नीचे’ हरम की राजनीति और इस राजनीति की पृष्ठभूमि के किरदारों की कहानी है।

Author June 3, 2018 4:43 AM
प्रस्तुत पुस्तक के जरिए शिक्षा-परीक्षा की जटिलताओं और विद्यार्थियों में घर कर गए तनाव, अवसाद का विवेचन किया गया है।

ताजमहल- छ: फिट नीचे

ताजमहल निस्संदेह सौंदर्य और भव्यता का प्रतीक है। पर क्या वह वास्तव में प्रेम का सही प्रतीक भी है? ‘ताजमहल : छ: फिट नीचे’ हरम की राजनीति और इस राजनीति की पृष्ठभूमि के किरदारों की कहानी है। दो भागों में लिखी गई इस कहानी के पहले भाग में मुख्यत: अकबर और सलीम के संबंधों के परिप्रेक्ष्य में इंतिसार और सरजू की कहानी है। यह उपन्यास एक ऐतिहासिक परिकल्पना का हिस्सा है। यह और बात है कि यह दूसरी कई ऐतिहासिक परिकल्पनाओं की तुलना में सच के ज्यादा करीब हो सकती है। खास तौर से उन परिकल्पनाओं की तुलना में, जिन्हें हम इतिहास समझ कर पाठ्य पुस्तकों में पढ़ते आए हैं। इसमें मुगल सल्तनत के दमन के खिलाफ तीन पीढ़ियों के व्यक्तिगत साहस की कहानी है। एक ऐसी लड़ाई, जिसमें उनकी हार तय है, जिसमें वे प्रेम, निष्ठा और हवस के धागों से जुड़े हुए हैं तो वहीं कपट, षड्यंत्र, लोभ और सत्ता की कटार से कटे हुए भी हैं।

ताजमहल- छह फिट नीचे : अबीर आनंद; जोरबा बुक्स; 249 रुपए।

कनस्तर में गंगा

राधेश्याम तिवारी की कविता एक सहज संवेदनशील मनुष्य की कविता है। वे अपने आसपास के छोटे-छोटे चरित्रों, छोटी-छोटी घटनाओं को मर्मस्पर्शी सजगता के साथ निरखते हैं और करुणा के उन अदृश्य धागों को दृश्य में लाते हैं, जिनसे चरित्र और घटनाएं आपस में जुड़ी हुई होती हैं। ये वही धागे हैं, जिनसे समाज और संस्कृति का ताना-बाना बना होता है। अपने समय को कविता में उपस्थित करने का यह उनका अपना तरीका है। विचार यहां भाषा से कहीं ज्यादा मौन में व्यक्त होता है। इस संग्रह की पहली ही कविता ‘भाषा में संभव नहीं’ में वे पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर अब तक के इतिहास और समाज-संस्कृति के पूरे वितान में उस ‘मौन’ की व्यापकता को रेखांकित करते हैं, जिसकी ‘अभिव्यक्ति भाषा में संभव नहीं है।’

उनकी कविताओं में प्रसंग जितने छोटे होते हैं, उनकी अनुगूंजें उतनी ही लंबी। लुधियाना की महिला कुली, बस्तर के किसी अनजान स्टेशन पर उतर जाने वाली ट्रेन में मिली विधवा आदिवासी युवती, बलात्कार की शिकार अनाम लड़की जैसे कई ऐसे चरित्र हैं, जो कविता समाप्त हो जाने के बाद भी पाठक की स्मृति में लंबे समय तक बने रहेंगे। वे विडंबनाओं को केवल वहीं नहीं देखते, जहां ये सहज रूप से दिखती हैं अथवा जहां इनके होने की अपेक्षा की जाती है। बल्कि, वे सुसंगत परिस्थितियों की विसंगति को भी उजागर करते हैं। ‘सुविधा’ जैसी कविता इसका उदाहरण है। कई बार वे सुपरिचित समकालीन रचनाकारों के जीवन की घटनाओं के माध्यम से भी समय की विसंगतियों को उद्घाटित करते हैं, जिससे उनके सरोकारों की व्यापकता का पता चलता है। सबसे अच्छी बात यह है कि उनके यहां विडंबना-बोध व्यंग्यात्मक कम है, मार्मिक ज्यादा, जो जीवन और समय की एक नई व्याख्या की मांग करता है।

‘उनकी कविताओं में दुख है, लेकिन कटुता नहीं, अभाव है लेकिन हड़पने की बेचैनी नहीं। वे एक गहरी और व्यापक दार्शनिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में अपने समय का आलोचनात्मक पाठ तैयार करते हैं।’ त्रिलोचन के बारे में कही गई यह उक्ति उन पर भी लागू होती है और इन अर्थों में वे त्रिलोचन की परंपरा के कवि हैं, जहां पीड़ादायी अभाव की पृष्ठभूमि में संस्कृति का विराट वैभव भी है। विडंबनाओं पर लगातार उंगली रखते हुए भी उनकी भाषा तीखे व्यंग्य की खरोंच नहीं लगाती।

कनस्तर में गंगा: राधेश्याम तिवारी; संजना प्रकाशन, डी-70/4, अंकुर एन्कलेव, करावल नगर, दिल्ली; 300 रुपए।

खुद से कई सवाल

अमित दत्ता एक युवा फिल्मकार हैं और यह पुस्तक उनके नोट्स का संचयन है, जिनमें जब-तब सोची गई बातें दर्ज हैं। उनके खोज की बेचैनी और अचरज, विचार-विनोद, अपने माध्यम की स्वतंत्रता को लेकर प्रश्नाकुलता और खुलापन सब कुछ साथ हैं। फिल्म को, सौभाग्य से, रचना और चिंतन की एक विश्व-परंपरा उपलभ्य है: अमित उसे आसानी से स्वायत्त करते, उससे स्पंदित होते और अपने ढंग से सोच-विचार करते फिल्मकार हैं और उनकी जिज्ञासा, विकलता, प्रश्नवाचकता हमें नई रोशनी में फिल्म देखने-समझने की उत्तेजना देती है।

यह किताब कलाओं के बुनियादी सवालों से व्यवहार करते हुए दर्शन के विराट प्रश्नों की ओर प्रस्थान करती है। लेकिन इसी क्रम में नहीं। क्रम कलाकार का निजी सौंदर्यशास्त्र है। इस किताब में प्रश्नों का क्रम व व्यतिक्रम अमित दत्ता के निजी सौंदर्यशास्त्र की संरचना बताता चलता है। यह उनकी कलात्मक आकांक्षाओं की बही है। दृष्टि का बर्तन दर्शन की राख से मांजा जाता है। चिंतन के पानी से धोया जाता है। यह ‘कलाकार के स्वाभाविक कर्मज्ञान’ के तलाश की किताब है। ‘स्वाभाविक कर्मज्ञान’ शब्दबंध शुक्ल यजुर्वेद संहिता में प्रयुक्त हुआ है, यानी जिसे अपने कर्मों का ज्ञान हो गया, उसने मृत्यु को प्राप्त कर लिया। कला के संदर्भ में यह बहुलार्थी हो जाता है।

कला के स्वाभाविक कर्मों का ज्ञान मिलते ही कलाकार को मृत्यु का वरदान मिलता है, हर तरह की मृत्यु- आंशिक और अर्ध-मृत्यु भी; और उसी से कला की नई दुनिया के द्वार खुलते हैं। संभवत: इसीलिए यह किताब अपने मूल स्वरूप में भी फ्रेगमेंटेड है, छोटे खंडों में बंटी हुई, छोटी मृत्युओं का वरण करती हुई। खंडित सोपानों पर चलकर एक वृहत् लक्ष्य की ओर बढ़ती हुई। और यह जो लक्ष्य है, वह सिर्फ सिनेमा के छात्र का अभीष्ट नहीं है, बल्कि कविता, कहानी, संगीत और चित्र जैसी हर कला के छात्र को अंतत: वहां तक पहुंचना होता है। इसीलिए यह किताब कला के हर छात्र के लिए जरूरी बन जाती है। खुद अमित दत्ता सहोदर कलाओं से कितना जीवद्रव्य पाते हैं, चित्रों, संगीत, साहित्य व दर्शन की मिट्टियों में अपनी जड़ों का प्रसार करते हैं, यह किताब इसका पता भी बताती है।

खुद से कई सवाल, एक भारतीय फिल्म-छात्र की नोटबुक: अमित दत्ता, अंग्रेजी से अनुवाद: गीत चतुर्वेदी; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, दिल्ली; 399 रुपए।

शिक्षा-परीक्षा और प्रधानमंत्री

प्रस्तुत पुस्तक के जरिए शिक्षा-परीक्षा की जटिलताओं और विद्यार्थियों में घर कर गए तनाव, अवसाद का विवेचन किया गया है। समझाइश है कि जिंदगी को व्यापक अर्थों और सफलता के विस्तृत फलक पर देखना चाहिए, केवल मार्कशीट के आईने में नहीं। बच्चों और बड़ों को भी यह समझना चाहिए कि जिंदगी की सफलता से ज्यादा अहम है जिंदगी को सार्थक रूप में जीना। मौजूदा दौर की यह अत्यंत गंभीर समस्या है। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने भी ‘मन की बात’ में इस पर ध्यान केंद्रित किया है। प्रेम प्रकाश ने इस पुस्तक में कई कोणों से न केवल गंभीर विमर्श किया है, बल्कि शिक्षाविदों व समाजविज्ञानियों के माध्यम से इसका समाधान भी प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास किया है। प्रेम प्रकाश मूलत: पत्रकार होने के कारण समस्या की गहराई तक गए हैं और इस विषय पर लोकशिक्षण की दृष्टि से गहन चिंतन भी किया है। यह अच्छी बात है कि एक ऐसे चिंतनपरक विषय को भी उन्होंने रूढ़ और बोझिल नहीं बनने दिया, बल्कि रोचक तरीके से कुछ-कुछ संवादात्मक शैली में इसे प्रस्तुत किया है।

शिक्षा-परीक्षा और प्रधानमंत्री: प्रेम प्रकाश; अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं. 1, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली; 150 रुपए।

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