आज जब पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है तो दुनिया भर की नारीवादी स्त्रियां आपस में बंटी हुई हैं। एक तबका कह रहा है कि ईरान के सुप्रीम नेता खानेमई की मौत पर मातम मनाने वालीं महिलाएं पितृसत्ता के साथ हैं। वहीं, दूसरे तबके की नारीवादी महिलाओं का कहना है कि हम अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश के इशारे पर अपने नारीवाद को परिभाषित नहीं कर सकती हैं।

पितृसत्ता पर आधारित इस दुनिया में स्त्री शोषण के जितने रूप हैं, उन्हें एक जगह इकट्ठा करना मुश्किल है। हर समाज की जितनी परतें खुलती हैं, उसमें स्त्री-शोषण का उतना ही नया रूप दिखता है। कहीं हिजाब और महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध दिखते हैं, तो नंगी आंखों को भी समझ में आ जाता है कि यहां पर महिलाओं की क्या स्थिति है।

वहीं, कोई समाज ऐसा होता है, जहां का कथित विकास और खुलापन हमारी आंखें चकाचौंध किए रहता है। लगता है, यहां पर तो सब कुछ ठीक होगा। यहां की स्त्रियां तो आजाद और शोषण-मुक्त होंगी। ऐसे ही चकाचौंध वाले समाज के बीच में एक दिन ‘एपस्टीन फाइल’ सामने आती है, जो स्त्रियों के शोषण का जघन्यतम रूप है। यह अपराध तो इतना घृणित है जहां, बच्चियों को गरिमामय तरीके से स्त्री बनने ही नहीं दिया गया। बाल यौन उत्पीड़न वह अपराध है जो व्यक्ति को जिंदगी भर सहज वयस्क नहीं होने देता है।

हिजाब के मुल्क वालीं महिलाएं सवाल उठा रही हैं कि वह मुल्क क्या हम स्त्रियों को अधिकार दिलाएगा जहां यौन शोषण के आरोपी सत्ता के सभी स्तरों में हैं। जो देश खुद स्त्रियों का मुजरिम है, वह दुनिया को युद्ध में झोंक रहा है। युद्ध के अपराधी दावा कर रहे हैं कि हम ईरान की स्त्रियों को धार्मिक कट्टरपंथ से मुक्त कर रहे हैं। सवाल है कि किन स्त्रियों को मुक्त कर रहे हैं—जिसका पिता, पति, बेटा युद्ध में मारा जा चुका है। जिसकी स्कूल गई नन्ही सी बेटी बम गिरने से मारी गईं। 160 स्कूली बच्चियों की कब्रें पूछ रही हैं कि इस तरह तुमने स्त्रियों को मुक्त किया है? स्कूलों के अंदर बच्चियों को मौत देना स्त्री-मुक्ति का कौन सा पथ है? किसी भी तरह के युद्ध ने स्त्री को और ज्यादा गुलामी व विनाश की राह पर ही धकेला है।

ईरान में मानवाधिकार और स्त्री-मुक्ति लाने के अमेरिकी दावों के बीच स्पेन से यूरोपीय संसद की सदस्य व युद्ध विरोधी नेता इरेने मोनतेरो ने कहा—“अमेरिकी बमों और अवैध अतिक्रमण से आज तक किसी भी स्त्री को मुक्ति नहीं मिली है। न तो सीरिया में, न ईराक में, न लेबनान में और न ही अफगानिस्तान में। ईरान में भी कोई स्त्री-मुक्ति जैसी चीज नहीं होने वाली है।” उनका आरोप है कि अमेरिका जैसी शक्तियां अपने साम्राज्यवादी युद्ध को न्यायोचित ठहराने के लिए महिला अधिकारों के पीछे छुप जाती हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का संदेश यही था कि दुनिया भर की स्त्रियों का दुख एक है और उनकी मुक्ति का रास्ता भी एक है। साम्राज्यवादी युद्धों के इस दौर में दुनिया भर की स्त्रियों को नए सिरे से एकजुट होने की जरूरत है।