नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बीच कई अजब-गजब शिगूफे भी दिखे। एक पत्रकार ने सवाल पूछा कि यहां पर इंकलाब जिंदाबाद जैसे ‘गलत’ नारे क्यों लग रहे हैं? जब आंदोलन के मंच पर इस तरह के सवाल उठ जाएं तो इंकलाब जिंदाबाद के इतिहास को जानना लाजिम हो जाता है।

मौलाना हसरत मोहानी वो शख्स हैं, जिन्हें इस इंकलाबी नारे को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। मोहानी ने 1921 में ब्रितानी हुकूमत की मुखालफत के दौरान यह नारा दिया था। मोहानी पूर्ण स्वतंत्रता की आवाज उठाने वाले अगुआओं में से एक थे। हसरत मोहानी का मूल नाम सय्यद फजल-उल-हसन तखल्लुस हसरत था। वे उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मोहान कस्बे में 1875 को पैदा हुए। उनके पिता का नाम सय्यद अजहर हुसैन था। मोहानी ने आरंभिक शिक्षा घर पर ही प्राप्त की और 1903 में अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय से बीए किया। शुरू ही से उन्हें शायरी में रुचि थी।

आठ अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के बाद इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया। इसके बाद अदालत में पेशी, जेल और जनसभाओं में भी यह नारा लगातार गूंजता रहा। भगत सिंह ने इस नारे की भूमिका को स्पष्ट करते हुए लिखा था कि इंकलाब का अर्थ केवल हिंसा नहीं है।

इसका अर्थ अन्यायपूर्ण व्यवस्था में बुनियादी बदलाव करना है। भगत सिंह का मानना था कि इंकलाब का अर्थ महज एक सत्ता के बदले दूसरी सत्ता ले आना नहीं है। इस एक नारे के साथ कई मांग अपने आप निकल जाती है। इन मांगों में है आर्थिक और सामाजिक समानता लाने की कोशिश करते हुए शोषणमुक्त समाज की स्थापना करना। यह नारा सांप्रदायिकता और जातिगत भेदभाव खत्म करने की हुंकार भी भरता है। यह नारा वैज्ञानिक सोच के साथ तर्कवाद में भरोसा रखता है।