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प्राचीन ग्रंथों के साथ नवाचार की पहल

अल्पना नायक अक्सर अपनी शिष्याओं को लेकर परंपरागत नृत्य में नवीनता लाने का प्रयास करती हैं, जो युवा शिष्याओं को आकर्षित करता है। उनमें उत्साह भरता होगा कि वो ऐसी रचनाओं को पूरी तन्मयता से नृत्य में पिरोएं।

Author Published on: September 6, 2019 5:40 AM
समारोह की दूसरी प्रस्तुति वृंदावनी सारंग में निबद्ध पल्लवी थी।

शशिप्रभा तिवारी

कल्पना की ओर नृत्य समारोह भूमि प्रणाम का आयोजन किया गया जिसमें ओडिशी नृत्यांगना अल्पना नायक के साथ उनकी शिष्याओं ने भी ओडिशी नृत्य पेश किया। इस समारोह का आरंभ परंपरागत मंगलाचरण के बजाय रंग स्तुति से हुआ। यह स्तुति आचार्य नंदिकेश्वर की कृति अभिनय दर्पण से लिए गए अंश-सभा लक्षणम पर आधारित थी। इस रचना में सभा लक्षणम, सभा रचना, प्रार्थना, रंग देवी की स्तुति और पुष्पांजलि को दर्शाया गया। इसका समापन गणेश स्तुति ‘पदबंदे गणनाथ’ से हुआ। इस पेशकश में गुरु अल्पना नायक और उनकी शिष्याओं ने शिरकत की। आमतौर पर ओडिशी में कलाकार भगवान जगन्नाथ की वंदना पेश करते हैं। उस लीक से हटकर अल्पना नायक ने अपनी नई सोच और परिकल्पना को रंग स्तुति के माध्यम से पेश किया। कलाकारों की ऐसी पहल स्वागत योग्य है कि वो प्राचीन गं्रथों के साथ एक नवाचार की पहल करते हैं।

समारोह की दूसरी प्रस्तुति वृंदावनी सारंग में निबद्ध पल्लवी थी। यह राग वृंदावनी सारंग में पिरोए गए पल्लवी में ओडिशी नृत्य की तकनीकी बारीकियों का अंग, पद और हस्त संचालन के जरिए पेश किया गया। लयात्मक गतियों में लय के विस्तार के साथ अंगों के संचालन का विस्तार मोहक था। इस प्रस्तुति में कलाकारों का आपसी सामंजस्य और संयोजन देखने लायक था। पल्लवी की इस पेशकश में भी नयापन और एक नई उमंग और गति दिखी। अलस कन्याओं समेत कई नायिकाओं की भंगिमाओं का प्रयोग अपना अनूठा प्रभाव छोड़ता नजर आया। हालांकि किसी नई परिकल्पना को साकार करना चुनौतिपूर्ण होता है पर यह समेकित प्रयास भी सुंदर था।

अल्पना नायक अक्सर अपनी शिष्याओं को लेकर परंपरागत नृत्य में नवीनता लाने का प्रयास करती हैं, जो युवा शिष्याओं को आकर्षित करता है। उनमें उत्साह भरता होगा कि वो ऐसी रचनाओं को पूरी तन्मयता से नृत्य में पिरोएं। गुरु के प्रयास को शिष्याओं ने भी अपने लगातार रियाज और तैयारी के जरिए साकार किया। अगली प्रस्तुति उड़िया गीत पर आधारित थी। यह भक्त चरण दास रचित चैतीसा-‘कला कलेबारा कन्हाई’ थी। इसमें परंपरागत शैली का अनुसरण करते हुए भगवान जगन्नाथ को रथ पर विराजित दर्शाया गया। नृत्य के इस अंदाज ने एक अलग प्रभाव छोड़ा। वहीं, पूतना वध, गिरि गोवर्धन धारण, कुब्जा उपख्यान का चित्रण भी कलाकारों ने बहुत ही सुंदर अंदाज में किया।

एक-एक प्रसंग के चित्रण में संचारी भाव के साथ अभिनय में अच्छी परिपक्वता दिखी। इस प्रस्तुति में गुरु अल्पना नायक सहित उनकी शिष्याएं प्राप्ति गुप्ता, देविका सेठा, दीक्षा कन्नन, पीहू श्रीवास्तव, प्रगति मलिक, यस्तिका धवन और श्रेयशा ने शिरकत की। ओडिशी नृत्यांगना अल्पना नायक ने करीब बीस वर्ष पहले अपनी शिष्याओं को नृत्य सिखाना शुरू किया था। धीरे-धीरे शिष्याओं ने ओडिशी नृत्य को अपने जीवन में पूर्णता से अंगीकार किया और गुरु का मार्गदर्शन निरंतर प्राप्त किया। इस में कोई दो राय नहीं कि गुरु के तौर पर सहृदयता से शिष्याओं को गुणग्राही बनाने की परंपरा को अल्पना नायक ने समृद्ध किया है।

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