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तंगदिल निकले सारे नायक

कोरोना महामारी की नई लहर पहले से ज्यादा मातमी साबित हो रही है। इस दौरान देश में स्वास्थ्य व्यवस्था की ढांचागत कमजोरी तो हर स्तर पर खुलकर जाहिर हुई ही है, साथ ही यह भी दिखा है कि एक संवेदनशील समाज-रचना की अपेक्षाओं पर भी हम कहीं से खरे नहीं उतरे हैं।

सांकेतिक फोटो।

कोरोना महामारी की नई लहर पहले से ज्यादा मातमी साबित हो रही है। इस दौरान देश में स्वास्थ्य व्यवस्था की ढांचागत कमजोरी तो हर स्तर पर खुलकर जाहिर हुई ही है, साथ ही यह भी दिखा है कि एक संवेदनशील समाज-रचना की अपेक्षाओं पर भी हम कहीं से खरे नहीं उतरे हैं। सबसे ज्यादा निराश किया है खेल और सिनेमा की दुनिया के उन सितारों ने जिन्हें हमारा समाज अपनी पलकों पर बिठाता रहा है। पर एक ऐसे समय में जब हर तरफ मानवता कराह रही है, इन सितारों ने अपनी संवेदना और सामर्थ्य दोनों को समेट लिया है। उनकी तंगदिली यह दिखाती है कि हमारे समय का नायकत्व इंसानी लिहाज से कितना कमजोर और सतही है। महामारी के मुश्किल दौर में इन चमकदार नामों के निराशा से भर देने वाले रवैए और उनसे जुड़े तमाम सामाजिक पक्षों की चर्चा कर रहे हैं प्रेम प्रकाश।

भारत एक अनुष्ठान प्रिय देश है। इस अनुष्ठानप्रियता में महज सांस्कृतिक उत्सव और उल्लास का रंग देखना इस देश की लोक संरचना को इकहरे तौर पर देखना-समझना होगा। आज जबकि कोरोना महामारी ने अपनी विदाई के संभावित मुहूर्त को अपने बरकरार रहने की खतरनाक सच्चाई में बदल दिया है तो यह देखना खासा दिलचस्प है कि जीवन और संवेदना के हर तल को आनुष्ठानिक स्पर्श देने वाला भारतीय समाज मनुष्यता की हिफाजत के लिए क्या कर रहा है।

यह देखना और महसूस करना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि दान और पुण्य जैसी नैतिकता में अपने समय का नायकत्व तलाशने वाले भारतीय समाज के पास ऐसे नायकों और आदर्शों का घोर अभाव है जो इस मुश्किल दौर को मानवीय संवेदना के अनुष्ठान में बदलने का नैतिक-सामाजिक विवेक दिखाए। बिहार में अंग का लोकांचल भगवान कृष्ण के लीला पुरुषोतम होने पर उतना नहीं अघाता है जितना अपने धरतीपुत्र कर्ण की दानवीरता की कथा सुनते-गाते हुए। यह स्थिति भारत के किसी एक लोकांचल की है, ऐसा भी नहीं है। पौराणिक दौर से शुरू होकर राजे-रजवाड़ों और सामंतों के दौर तक कुबेरी संग्रह को कभी भी भारतीय लोक समाज ने अपना अनुमोदन नहीं दिया बल्कि सिर-माथे पर ऐसे ‘दधीचियों’ को बैठाया, जो मानवता की संभाल के लिए अपनी सारी साधन-संपन्नता के साथ खुले मन से सामने आते हैं।

कुबेरी रूतबा

भारत आज दुनिया के ऐसे देश में शामिल है जिसकी आर्थिक संरचना की ताकत और संभावना को सभी कबूलते हैं। हमारी सरकार भी इस भाव से गदगद रहती है कि एक बड़ी आर्थिक शक्ति के तौर पर उसे दुनिया के हर मंच पर इज्जत दी जाती है। आलम यह है कि खेल से लेकर सिनेमा की दुनिया के जितने कुबेरी सितारे भारत के पास हैं, उतने शायद ही किसी अन्य देश के पास हों। ये वे सितारे हैं जिनके नायकत्व को लोकप्रियता के शीर्ष तक ले जाने में भारतीय समाज ने बड़ी भूमिका निभाई है।

यह भूमिका संवेदना से शुरू होकर उस अपेक्षा तक फैली है, जिसमें नायकों से यह उम्मीद रहती है कि वह एक बड़े आदर्श के तौर पर देश-समाज के सामने आएं, खासतौर पर जब उनके चाहने वाले मुश्किलों से घिरे हों। पर इसे क्या कहेंगे कि जब कोरोना महामारी के दौर में एक साल से लंबे समय में दुनिया के साथ भारत में लोग लगातार स्वास्थ्य और दूसरी परेशानियों से घिरे हैं तो हमारे नायक हमारे साथ नहीं खड़े हैं। जो उदाहरण हैं वे इतने कम या अपर्याप्त कि हम उन पर किसी गर्वीले अहसास से नहीं भर सकते हैं।

ली और कमिंस

इस बार जब कोविड-19 की दूसरी लहर आई तो मदद की जो कुछ घोषणाएं ऐसे नायकों की तरफ से हुईं, उनमें दो नाम तो ऐसे थे, जो भारतीय नहीं हैं। बावजूद इसके एक खिलाड़ी के तौर पर भारतीय लोगों से मिले प्रेम के कारण उन्हें यह गंवारा नहीं लगा कि वे अपने हजारों-लाखों ऐसे चाहने वालों के लिए कुछ न करें जो बड़े संकट से घिरे हैं। भारत में कोरोना संक्रमण के दूसरे दौर में भयावह हुई स्थिति के बीच पहली बड़ी घोषणा की पैट कमिंस ने। आइपीएल 2021 में कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए खेलने वाले आॅस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाज कमिंस ने भारतीय अस्पतालों के लिए आॅक्सीजन की आपूर्ति के लिए ‘पीएम केयर्स फंड’ को 50 हजार डॉलर (लगभग 37 लाख रुपए) दान करने की घोषणा की। कमिंस ने साथी खिलाड़ियों से भी मदद के लिए आगे आने की भावुक अपील की।

कमिंस के बाद आॅस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी ब्रेट ली भारतीयों की मदद के लिए आगे आए। ली ने भारत के अस्पतालों में आॅक्सीजन की आपूर्ति के लिए एक बिटकॉइन (लगभग 42 लाख रुपए) दान किया है। उन्होंने कहा, ‘भारत हमेशा मेरे लिए दूसरे घर जैसा रहा है। मुझे यहां पर लोगों से पेशेवर करियर और संन्यास के बाद भी जो प्यार मिला है उसके लिए मेरे दिल में एक खास जगह है।’ ली ने यह भी कहा कि इस संकट में लोगों को मरते हुए देखना हृदयविदारक है।

ली इससे पहले भी कई मौकों पर भारतीयों की मदद के लिए आगे आते रहे हैं। इससे पहले कमिंस ने भी कुछ इसी अंदाज में कहा, ‘भारत एक ऐसा देश है जहां पिछले कुछ सालों से मुझे बहुत प्यार मिला है और यहां के लोग भी बहुत प्यारे और सपोर्टिंग हैं। मैं जानता हूं कि पिछले कुछ समय से इस देश में कोरोना वायरस की वजह से काफी मुश्किलें पैदा हो गई हैं।’

अपनों की बेरुखी

गौरतलब है कि भारत एक ऐसा देश है जहां खेल के रूप में क्रिकेट की लोकप्रियता ऐसी है कि लोग इसे धर्म का दर्जा देते हैं। सचिन तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी को भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ के अलंकरण से सम्मानित किया, उन्हें राज्यसभा भेजा। महेंद्र सिंह धोनी से लेकर विराट कोहली और रोहित शर्मा तक को मैदान में खेलते देख भारतीय दर्शकों का दिली रोमांच देखते ही बनता है। ये उन्हें जिस तरह दिल में स्थान देते हैं, वैसा सम्मान सार्वजनिक जीवन के कई ऐतिहासिक नामों को भी हासिल नहीं है।

पर इसे हमारे दौर के नायकों की तंगदिली कहें या भारतीय समाज-रचना में आई स्फीति कि जब पूरा देश गंभीर संकट से गुजर रहा है तो हमारे दिलों पर राज करने वाले ये सितारे हमारे साथ किसी तौर पर खड़े नहीं हैं। इनमें से ज्यादातर मदद के तदर्थ इरादे के साथ या तो बहुत देर से सामने आए या फिर उन्होंने किसी गैरसरकारी मुहिम का हिस्सा बनकर अपने दायित्व को पूरा मान लिया।

दुर्भाग्य से यह बात क्रिकेट या खेल की दुनिया तक ही सीमित नहीं है। भारतीय फिल्म उद्योग का कुबेरी विस्तार दुनिया में सबसे बड़ा है। नायकों और महानायकों की एक पूरी जमात है भारतीय सिनेमा के पास, जिन पर उनके चाहने वाले जान न्योछावर करते हैं। सौ करोड़ और पांच सौ करोड़ की कमाई का कीर्तिमान कुछ ही हफ्तों में रच देने वाली फिल्मी हस्तियों की दुनिया कोरोना के महाप्रकोप के दौर में विज्ञापन के जरिए कमाई करते हुए जरूर दिख रही है। जो कुछ घोषणाएं उनकी तरफ से इस बीच हुई भी हैं, उनमें से ज्यादातर छवि प्रबंधन के लिए हैं।

बड़ी स्फीति

ये सारी स्थिति देश के नैतिक-सामाजिक मूल्य में एक बड़ी स्फीति का प्रमाण है। दान को पुण्य का दर्जा देने वाले भारतीय समाज का नया आनुष्ठानिक यथार्थ खुदगर्जी में सना है। हमारे पास नायक भी हैं, उनकी वैभवशाली दुनिया भी है पर गाढ़े समय में सभी अकर्मक हैं, मूर्तिवत हैं। यह स्थिति उस भारतीय समाज के लिए कितना बड़ा दुर्भाग्य है, जिसने औपनिवेशिक दासता के दिनों में भी सांस्कृतिक नवजागरण के लिए तैयार होने के नैतिक शील को अपने लिए जरूरी माना।

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