प्रयागराज में कुछ जगहें ऐसी हैं, जिनके सामने से गुजरते हुए यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कभी वहां से निकले कागज के पन्ने हिंदी और भारतीय साहित्य की दुनिया में कितनी दूर तक गए थे। इंडियन प्रेस भी ऐसी ही एक जगह थी। एक समय यहां छपाई की मशीनों के बीच सिर्फ अक्षर नहीं उतरते थे, साहित्य की कई धाराएं पाठकों तक अपना रास्ता बनाती थीं। इन्हीं पन्नों से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में ‘सरस्वती’ निकली और इसी प्रकाशकीय संसार का रिश्ता रवींद्रनाथ ठाकुर की रचनाओं से भी जुड़ा। 1910 की बांग्ला ‘गीतांजलि’ में शामिल कुछ रचनाएं इससे पहले इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित हो चुकी थीं। यानी प्रयागराज का यह प्रेस हिंदी और बंगाल के साहित्यिक संसारों के बीच बन रही उस आवाजाही का भी हिस्सा था, जिसकी कहानी आज बहुत कम याद की जाती है।
इस कहानी में एक नाम चिंतामणि घोष का है और दूसरा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का। दोनों की भूमिकाएं अलग थीं, लेकिन रास्ता एक ही जगह से होकर गुजरता था – इंडियन प्रेस। एक ने ऐसा प्रकाशकीय संसार खड़ा किया, जिसमें कई भाषाओं की किताबें और पत्रिकाएं जगह पा सकें, तो दूसरे ने उसी संसार से निकलने वाली ‘सरस्वती’ को ऐसी संपादकीय दिशा दी, जिसका असर हिंदी के लेखन पर लंबे समय तक दिखाई दिया। और इसी कहानी का एक सिरा रवींद्रनाथ ठाकुर तक जाता है, जिनकी रचनाओं ने इस प्रेस की दुनिया को हिंदी से आगे बंगाली साहित्य तक भी पहुंचाया।
एक प्रेस से शुरू हुई कहानी
चिंतामणि घोष ने 4 जून 1884 को इंडियन प्रेस की शुरुआत की थी। उस समय छपाई का काम आज की तरह आसान नहीं था। किताब तैयार होने का मतलब केवल लेखक का लिख देना नहीं था। उसके लिए प्रेस चाहिए था, कागज चाहिए था, अक्षरों की व्यवस्था करनी पड़ती थी और फिर तैयार सामग्री को पाठकों तक पहुंचाने का रास्ता भी तलाशना पड़ता था। घोष ने इसी दुनिया में धीरे-धीरे अपना काम खड़ा किया।
इंडियन प्रेस शुरू से केवल हिंदी की किताबें छापने वाली संस्था नहीं थी। यहां हिंदी के साथ अंग्रेजी, उर्दू, बंगाली और दूसरी भाषाओं की सामग्री प्रकाशित हुई। फारसी में भी प्रकाशन हुए। उपलब्ध शोध से पता चलता है कि अपने शुरुआती वर्षों में इंडियन प्रेस का प्रकाशन संसार काफी बहुभाषी था। यानी यह प्रेस उस समय के प्रयागराज की उस बौद्धिक दुनिया का हिस्सा था, जहां अलग-अलग भाषाओं में लिखने और पढ़ने वाले लोग एक-दूसरे के संपर्क में आ रहे थे।
धीरे-धीरे इंडियन प्रेस का काम बढ़ता गया। बीसवीं सदी की शुरुआत तक यह केवल एक छापाखाना नहीं रह गया था। लेखकों, संपादकों और पाठकों के बीच उसकी अपनी पहचान बन चुकी थी। इसी प्रकाशकीय संसार में 1900 में एक ऐसी पत्रिका का जन्म हुआ, जिसका नाम आगे चलकर हिंदी साहित्य के इतिहास में बार-बार लिया जाना था।
1900 में आई ‘सरस्वती’
जनवरी 1900 में ‘सरस्वती’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ। इसके शुरुआती दौर से बाबू श्यामसुंदर दास का नाम जुड़ा रहा। पत्रिका अभी अपने लिए जगह बना ही रही थी कि कुछ वर्षों बाद उसके संपादन की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति के हाथ में आई, जिनका नाम आगे चलकर हिंदी के आधुनिक विकास के साथ गहराई से जुड़ गया। वह थे महावीर प्रसाद द्विवेदी।
1903 में द्विवेदी ‘सरस्वती’ के संपादक बने और 1920 तक इसका संपादन करते रहे। करीब सत्रह वर्षों के इस दौर में ‘सरस्वती’ का प्रभाव लगातार बढ़ा। वह केवल साहित्यिक रचनाएं छापने वाली पत्रिका नहीं रही। उसके पन्नों पर भाषा, समाज, इतिहास, शिक्षा, विज्ञान और ज्ञान से जुड़े विषय भी जगह पाने लगे। हिंदी के बढ़ते पाठक वर्ग के लिए यह एक ऐसा मंच बन रही थी, जहां साहित्य के साथ अपने समय को समझने की कोशिश भी दिखाई देती थी।
लेकिन द्विवेदी और चिंतामणि घोष का संबंध केवल ‘सरस्वती’ के संपादन से शुरू नहीं हुआ था। दोनों के परिचय के पीछे भी एक छोटी-सी घटना थी, जिसने आगे चलकर हिंदी के लिए बड़ी भूमिका निभाई।
एक किताब की अशुद्धियों से बनी पहचान
इंडियन प्रेस से प्रकाशित एक ऐसी पुस्तक में, जिसे स्कूलों के लिए उपयोग किया जाना था, कई अशुद्धियां रह गई थीं। महावीर प्रसाद द्विवेदी की नजर उन पर गई। उन्होंने इन गलतियों की ओर ध्यान दिलाया। यही प्रसंग चिंतामणि घोष का ध्यान द्विवेदी की ओर ले गया और दोनों के बीच परिचय आगे बढ़ा।
यह मुलाकात आगे चलकर हिंदी के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई। घोष को ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी, जो हिंदी के लेखन और भाषा को लेकर गंभीर हो। द्विवेदी में वह क्षमता थी। वे शब्दों के इस्तेमाल, वाक्य की बनावट, व्याकरण और विचार की स्पष्टता को लेकर सजग रहते थे। उनके सामने अब एक ऐसा मंच था, जहां इन बातों को बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचाया जा सकता था। वह मंच था – ‘सरस्वती’।
संपादक के हाथ में आई ‘सरस्वती’
द्विवेदी के संपादन में ‘सरस्वती’ का दायरा केवल कविता और कहानी तक सीमित नहीं रहा। साहित्य के साथ इतिहास, समाज, शिक्षा, विज्ञान, भाषा और ज्ञान के दूसरे विषयों पर भी सामग्री प्रकाशित होती रही। उस समय हिंदी एक बदलाव के दौर से गुजर रही थी। ब्रजभाषा की अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा थी, लेकिन खड़ी बोली का इस्तेमाल बढ़ रहा था। आधुनिक शिक्षा और नए विषयों के विस्तार के साथ ऐसी भाषा की जरूरत भी महसूस हो रही थी, जिसमें नए विचार अपेक्षाकृत सहज ढंग से लिखे और पढ़े जा सकें।
‘सरस्वती’ इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण जगह बनी। द्विवेदी लेखकों की भाषा पर ध्यान देते थे, लेखों को संपादित करते थे और जरूरत पड़ने पर उनमें सुधार भी करवाते थे। इस तरह पत्रिका केवल रचनाएं प्रकाशित करने का माध्यम नहीं रही। उसने हिंदी के लेखन में भाषा और संपादन के प्रति एक खास तरह की सजगता पैदा करने में भूमिका निभाई।
यहीं से इंडियन प्रेस की कहानी हिंदी साहित्य के इतिहास से गहराई से जुड़ जाती है। लेकिन इंडियन प्रेस की कहानी को सिर्फ ‘सरस्वती’ तक सीमित कर देना भी उसके साथ न्याय नहीं होगा।
‘सरस्वती’ के साथ टैगोर भी
इंडियन प्रेस की दुनिया सिर्फ हिंदी तक सीमित नहीं थी। प्रयागराज में खड़ा यह प्रेस अपने समय की बहुभाषी छपाई की एक खास मिसाल था। हिंदी की ‘सरस्वती’ के साथ बंगाली की ‘प्रबासी’, अंग्रेजी की ‘द मॉडर्न रिव्यू’ और उर्दू की ‘अदीब’ जैसी पत्रिकाएं भी इसी प्रेस से जुड़ी थीं। यानी एक ही प्रकाशकीय परिसर से अलग-अलग भाषाओं में लिखने-पढ़ने वालों के लिए सामग्री तैयार हो रही थी।
इसका एक दिलचस्प सिरा रवींद्रनाथ ठाकुर तक पहुंचता है। बंगाली पत्रिका ‘प्रबासी’ के पहले अंक में ही ठाकुर की एक कविता प्रकाशित हुई थी। इससे पता चलता है कि प्रयागराज का यह प्रेस केवल हिंदी साहित्य के संसार तक सीमित नहीं था। वह बंगाल और उत्तर भारत की साहित्यिक दुनिया के बीच भी एक संपर्क का माध्यम बन रहा था।
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टैगोर का इंडियन प्रेस से रिश्ता आगे चलकर और गहरा हुआ। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में चिंतामणि घोष के पौत्र कल्याण घोष के हवाले से बताया गया है कि 1908 से 1922 के बीच इंडियन प्रेस ने टैगोर की 87 रचनाओं के प्रकाशन में भूमिका निभाई। इस दौर में टैगोर की किताबों का प्रकाशन भी प्रयागराज के इस प्रेस की पहचान का हिस्सा बन गया। यानी जिस प्रकाशकीय संसार से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में ‘सरस्वती’ निकल रही थी, उसी संसार में बंगाल के रवींद्रनाथ ठाकुर की रचनाएं भी पाठकों तक पहुंच रही थीं।
एक तरफ हिंदी के लेखन को दिशा देने वाली ‘सरस्वती’ थी और दूसरी तरफ बंगाल के उस लेखक की रचनाएं, जिसे आगे चलकर दुनिया रवींद्रनाथ ठाकुर के नाम से जानेगी। एक ही प्रेस से निकलती ये दो साहित्यिक धाराएं बताती हैं कि इंडियन प्रेस को केवल एक पुराने छापाखाने के रूप में देखना उसकी भूमिका को छोटा करना होगा।
चिंतामणि घोष की भूमिका
हिंदी साहित्य के इतिहास में महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। लेकिन उनके संपादन के पीछे जिस प्रकाशकीय व्यवस्था ने ‘सरस्वती’ को नियमित रूप से पाठकों तक पहुंचाया, उसमें चिंतामणि घोष की भूमिका को भूलना मुश्किल है। किसी पत्रिका का प्रभाव केवल संपादकीय विचारों से नहीं बनता। उसके लिए संस्थान चाहिए, छपाई चाहिए, कागज चाहिए, आर्थिक जोखिम उठाने वाला प्रकाशक चाहिए और पाठकों तक पहुंचने की व्यवस्था भी चाहिए।
घोष ने यह आधार उपलब्ध कराया। इस अर्थ में इंडियन प्रेस और ‘सरस्वती’ का संबंध केवल प्रकाशक और पत्रिका का संबंध नहीं था। यह उस दौर के साहित्य और मुद्रण की साझी कहानी थी। एक तरफ प्रेस की मशीनें थीं और दूसरी तरफ संपादक की मेज। मशीन कागज पर अक्षर उतारती थी और संपादक यह तय करता था कि वे अक्षर किस रूप में पाठक तक पहुंचेंगे। यहीं तकनीक और साहित्य एक-दूसरे से मिल रहे थे।
प्रयागराज में बन रहा था एक नया पाठक
इंडियन प्रेस की कहानी को उस समय के प्रयागराज से अलग करके देखना भी मुश्किल है। शहर में शिक्षा का विस्तार हो रहा था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का अपना बौद्धिक वातावरण था। अदालतों और प्रशासन के कारण देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आते थे। अखबार और पत्रिकाएं पढ़ने का चलन भी बढ़ रहा था। ऐसे माहौल में किताब और पत्रिका केवल पढ़ने की चीज नहीं रह गई थी। वे विचारों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का माध्यम भी बन रही थीं।
‘सरस्वती’ ने इसी उभरते पाठक वर्ग को एक नियमित मंच दिया। लेखक कहीं और बैठकर लिखता था और उसकी रचना प्रयागराज के इंडियन प्रेस में छपकर देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकती थी। किसी छोटे शहर का पाठक भी उसे पढ़ सकता था। किसी युवा लेखक को यह भरोसा हो सकता था कि उसकी रचना अब केवल उसके कमरे या परिचितों के बीच नहीं रहेगी। छपी हुई भाषा का यह विस्तार आगे चलकर हिंदी के साहित्यिक संसार को बड़ा करने वाली प्रक्रियाओं में शामिल हुआ।
इंडियन प्रेस का बहुभाषी स्वरूप इस तस्वीर को और बड़ा करता है। यहां हिंदी के साथ बंगाली, अंग्रेजी और उर्दू की पत्रिकाएं और दूसरी भाषाओं की सामग्री भी छप रही थी। ऐसे में प्रयागराज सिर्फ एक शहर नहीं रह जाता, बल्कि अलग-अलग भाषाओं और साहित्यिक संसारों के बीच आने-जाने वाले शब्दों का एक पड़ाव दिखाई देता है।
उस घर में सिर्फ किताबें नहीं छपती थीं
इंडियन प्रेस का यही पहलू उसे खास बनाता है। इसे केवल एक पुराने प्रकाशन संस्थान की कहानी मानना शायद पर्याप्त नहीं होगा। यह उस समय की कहानी है जब भारत में आधुनिक मुद्रण संस्कृति मजबूत हो रही थी, किताबें और पत्रिकाएं सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन रही थीं, भाषाएं अपने नए पाठक तलाश रही थीं और लेखक अपने लिए नए मंच खोज रहे थे।
प्रयागराज में इंडियन प्रेस ने इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चिंतामणि घोष ने एक संस्था बनाई। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उसी प्रकाशकीय संसार से जुड़े मंच को संपादकीय दृष्टि दी। ‘सरस्वती’ ने लेखकों और पाठकों के बीच एक रास्ता बनाया और इंडियन प्रेस की दूसरी भाषाओं वाली दुनिया ने इस रास्ते को हिंदी से आगे भी फैला दिया।
इस पूरी कड़ी में किसी एक व्यक्ति को अकेले श्रेय देना शायद कहानी को छोटा कर देगा। प्रेस, प्रकाशक, संपादक, लेखक और पाठक – इन सबके मिलने से ही वह साहित्यिक संसार तैयार होता है, जिसे हम बाद में इतिहास के रूप में देखते हैं।
आज पीछे मुड़कर देखें तो
पुराने प्रयागराज की साहित्यिक पहचान को अक्सर बड़े लेखकों और कवियों के नामों से याद किया जाता है। लेकिन किसी शहर का साहित्यिक इतिहास केवल उसके लेखकों से नहीं बनता। उसके पीछे वे प्रेस भी होते हैं, जहां उनकी रचनाएं छपती हैं; वे संपादक होते हैं, जो उन्हें जगह देते हैं; प्रकाशक होते हैं, जो जोखिम उठाते हैं और वे पाठक होते हैं, जो उन शब्दों को अपने साथ आगे ले जाते हैं।
इंडियन प्रेस इसी व्यवस्था का दिखाई देने वाला हिस्सा था। 1884 में शुरू हुई चिंतामणि घोष की पहल ने आगे चलकर एक बड़े प्रकाशकीय संसार का रूप लिया। उसी संसार में ‘सरस्वती’ आई और महावीर प्रसाद द्विवेदी के लंबे संपादन ने उसे हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में शामिल कर दिया। इसी प्रकाशकीय दुनिया में टैगोर की रचनाएं भी पाठकों तक पहुंचीं।
आज पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि उस जगह सिर्फ किताबें नहीं छप रही थीं। वहां अलग-अलग भाषाओं के शब्द एक ही छत के नीचे आ रहे थे। लेखक और पाठक के बीच दूरी कम हो रही थी। हिंदी अपने समय के नए सवालों से रूबरू हो रही थी और बंगाल की साहित्यिक आवाज भी प्रयागराज के रास्ते देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंच रही थी।
शायद इसीलिए इंडियन प्रेस की कहानी को याद करना सिर्फ एक पुराने छापाखाने को याद करना नहीं है। यह उस दौर को याद करना है, जब प्रयागराज की एक जगह पर कागज, स्याही, मशीन, संपादन और साहित्य साथ-साथ मौजूद थे – और उन्हीं के बीच आचार्य द्विवेदी की ‘सरस्वती’ और टैगोर की किताबें पाठकों तक पहुंच रही थीं।
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उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्रयागराज तेजी से बदल रहे उत्तर भारत के उन शहरों में था, जहां नए रास्ते बन रहे थे और उनके साथ नई आवाजाही भी। 1859 में यहां से कानपुर के लिए रेल चली तो शहर का रिश्ता सिर्फ यात्रियों और माल के आवागमन से नहीं बदला। रेल के साथ अखबार, किताबें और नए विचार भी आने-जाने लगे। कुछ दशकों बाद रेलवे स्टेशन पर किताबों की दुकान खुली और इसी शहर से रेल यात्रियों के लिए किताबें छपने लगीं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
