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संगीत : बैरन घर ना जा…

पंजाब के असली पारंपरिक संगीत का आनंद भाई बलवंत सिंह नामधारी ने दिया। अपने प्रभावी गायन की शुरुआत उन्होंने राग ‘जैजै बागेश्री’ में तलवंडी घराने की एक झपताल बंदिश से की।

किराना घराने की गायिका निशि गुप्ता कार्यक्रम पेश करतीं।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर सभागार में पिछले सप्ताह शास्त्रीय संगीत के दो कार्यक्रम हुए। पंजाबी अकादमी द्वारा पंजाब के पारंपरिक संगीत का दोरोजा जलसा और निशि गुप्ता के गायन का एक अलग से कार्यक्रम। पंजाबी अकादमी का संगीतोत्सव दिल्ली सरकार की कला, संस्कृति और भाषा विभाग के मंत्री कपिल मिश्र द्वारा उद्घाटन की प्रतीक्षा में तकरीबन घंटा भर देर से शुरू हुआ। डा. निवेदिता सिंह ने अच्छी-भली शुरुआत राग भीमपलासी से की लेकिन गले में खराश की वजह से वे मंच छोड़ गईं। बहलहाल उनके वापस आने तक परोमिता मुखर्जी ने हारमोनियम पर इस राग का सुरीला माहौल बनाए रखा। इस बार निवेदिता ने राग देस की बंदिश शुरू की तो परोमिता ने देस का दर्दीला समां बांधा। इसके बाद जोगकौंस में प्रो. तारासिंह के रचे पंजाबी चतुरंग से उन्होंने अपना गायन संपन्न किया।

पंजाब के असली पारंपरिक संगीत का आनंद भाई बलवंत सिंह नामधारी ने दिया। अपने प्रभावी गायन की शुरुआत उन्होंने राग ‘जैजै बागेश्री’ में तलवंडी घराने की एक झपताल बंदिश से की। यह विरल राग जैजैवंती और बागेश्री का सुरीला समन्वय था। इसके बाद ककुभ और खमाज की पंजाबी बंदिशों में पंजाब का पुराना रंग सुनने को मिला।

डा. निशि गुप्ता किराना घराने की गायिका हैं और उन्होंने पं. रामाश्रय झा, विदुषी गिरिजा देवी और पं. छन्नू लाल मिश्र जैसे गुरुओं से मार्गदर्शन पाया है। उन्होंने शुरुआत एक छोटी सी गणेश स्तुति से की और सीधे ठुमरी ‘तुम राधे बनो श्याम’ पर आ गईं। इसके बाद उन्होंने अद्धे ठेके में एक बंदिशी ठुमरी ‘लागे तोसे नैन’ और एक दोहे सहित मिश्र पहाड़ी में एक दादरा गाया। अपने गुरु पं. छन्नू लाल मिश्र का प्रिय दोहा ‘नागिन बैठी राह में, कि बिरहन पहुंची आय…’ ठीक उन्हीं जैसी भूमिका सहित नत्थी करके एक अन्य दादरा ‘बैरन घर ना जा…’ सुनाया। इसके अलावा होरी, चैती वगैरह का भी दौर चला।

गायन के दौरान श्रोताओं से वह लगातार संपर्क साधे रहीं, लेकिन महज उपशास्त्रीय गायन, और उसमें भी संगत कलाकारों के छिपाने के बावजूद उनके अक्सर बेसुरा/बेताला हादसों ने सुधीजनों को निराश किया। बहरहाल वायलिन पर सुखदेव प्रसाद मिश्र और तबले पर ललित कुमार की संगति उनके लिए भी वरदान रही और श्रोताओं के लिए भी, जिनके चारुकेशी बंदिश के सुरीले अंतराल ने उन्हें सुस्ताने का मौका दिया और श्रोताओं को जायका बदलने का।

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