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द लास्ट कोच: बच जाए आंखों में भी पानी

यूनिसेफ की रिपोर्ट बता रही है कि बढ़ती जनसंख्या से पानी की खपत बढ़ रही है। 36 देशों में हालत खराब है। धरती में जल कम होने से तापमान बढ़ गया है। समुद्र का जल स्तर कम हो रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। जगह-जगह सूखे की नौबत पैदा हो गई है। दूसरी ओर हम नदियों का पानी नहीं संभाल नहीं पा रहे। भारत में भूजल की खपत 230 क्यूबिक किलोलीटर है। यानी पूरी दुनिया की खपत का एक चौथाई। विश्व बैंक ने तो आगाह कर दिया है कि अगर इसी रफ्तार से भारत जल दोहन करता रहा तो वह 2032 तक वह 60 फीसद भूजल भंडार खत्म कर देगा। इसी परिदृश्य पर संजय स्वतंत्र की द लास्ट कोच शृंखला।

Author Published on: October 6, 2019 2:25 PM
सांकेतिक तस्वीर।

मेट्रो में सफर करते समय सामने बैठी दो कालेज छात्राओं में हंसी-मजाक के बीच पानी की बोतल कोच के फर्श पर गिर गई है। जिसके हाथ में ढक्कन है, वह फर्श पर बिखर चुके पानी को देख कर झेंप गई है। उसने सहयात्रियों की ओर देखते हुए खेद जरूर जताया, मगर मेरी आंखों के आगे उन राज्यों की तस्वीरें घूम गर्इं हैं, जहां महिलाएं कई किलोमीटर दूर पानी लाने के लिए भटकती हैं। उन कुओं की तस्वीरें भी याद आ रही हैं जिसमें महिलाएं जान जोखिम में डाल कर उतरती हैं और घरों तक पानी ले जाती हैं। मुझे वे खबरें भी याद आर्इं, जिनमें बताया गया था कि महज एक बाल्टी पानी के लिए कैसे किसी की हत्या कर दी गई। यही नहीं इसी पानी के लिए तीसरा विश्व युद्ध होने की आशंका जताई जाती है।

….तो बोतल का पानी मेट्रो कोच के फर्श पर गिर जाना बड़ी बात नहीं। अफसोस इस बात का है कि हम पानी की बर्बादी को रोक नहीं पा रहे। नहाते समय एक परिवार एक सौ से डेढ़ सौ लीटर पानी स्नानागार में बहा देता है। चेन्नई, मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में वाल्ब खराब होने से पाइप लाइनों से 17 से 44 फीसद पानी सड़कों पर बह जाता है। और हमें देखते रह जाते हैं। क्योंकि हमारी आंखों का पानी सूख गया है।

…….सुबह स्कूल जाने की तैयारी कर रहे बच्चे ब्रश करते समय अकसर नल खुला छोड़ देते हैं। आज मेरी नींद पड़ोसी की आवाज से खुली। वे बेटे पर चिल्ला रहे थे- वॉश बेसिन का नल बंद कर तरुण। टंकी का पानी खत्म हो जाएगा। बेटे को चिंता नहीं। याद आया मुझे कि शेव बनाते समय हम से ज्यादातर लोग नल खुला छोड़ देते हैं। इसका अगर हिसाब लगाएं तो जो तथ्य सामने आएगा, उसे जान कर आप भी चिंता में पड़ जाएंगे। इस तरह बाप और बेटे दोनों मिल कर रोज दो बाल्टी पानी बर्बाद कर देते हैं। यानी हर महीने करीब 60 लीटर पानी। दूसरी तरफ एक मनुष्य को जीने के लिए प्रतिदिन कम से कम तीन लीटर पानी चाहिए। और कड़वा सच यह कि भारत में दस में से एक व्यक्ति को पीने का साफ पानी मिल पाता है। भारतीय ग्रामीण स्त्रियां दो घड़ों में पानी भरने के लिए चार मील पैदल चलती हैं। फिर भी हम आंसू नहीं बहाते। तो हमारी आंखों का पानी इसलिए भी सूख गया है कि हम भावी पीढ़ी और आने वाले कल के लिए पानी नहीं बचा रहे।

यूनिसेफ की रिपोर्ट बता रही है कि 36 देशों में हालत खराब है। बढ़ती जनसंख्या से पानी की खपत बढ़ रही है। धरती में जल कम होने से तापमान बढ़ गया है। समुद्र का जल स्तर कम हो रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। जगह-जगह सूखे की नौबत पैदा हो गई है। दूसरी ओर हम नदियों का पानी नहीं संभाल नहीं पा रहे। वे मानसून में पूरे आवेग के साथ आती हैं और खेत-खलिहानों एवं बस्तियों को तबाह करती हुई समुद्र में मिल जाती हैं। हम गंगा-यमुना, कोसी-गंडक और ब्रह्मपुत्र और नर्मदा समेत तमाम नदियों का आज तक जल प्रबंधन नहीं कर पाए। हम भूमिगत जल का पहले से ही दोहन कर रहे हैं। भारत में भूजल की खपत 230 क्यूबिक किलोलीटर है। यानी पूरी दुनिया की खपत का एक चौथाई। विश्व बैंक ने तो आगाह कर दिया है कि अगर इसी रफ्तार से भारत जल दोहन करता रहा तो वह 2032 तक वह 60 फीसद भूजल भंडार खत्म कर देगा।

उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन सिविल लाइंस है। दरवाजे बायीं ओर खुलेंगे। ……..तभी मेरे मोबाइल की घंटी बज उठी है। जयपुर से अपराजिता की कॉल है। ‘क्या हुआ? कहां हो तुम अभी’, मैंने पूछा तो उसने कहा, ‘रिपोर्टिंग के लिए रेगिस्तानी इलाके में हूं। पानी नहीं मिला तो दो दिन से नहाई नहीं हूं। अजीब सा लग रहा है।’ यह जान कर मैंने कहा, काम खत्म कर के जल्दी जयपुर लौटो। अब पता चला पानी का महत्त्व?’ उसने जवाब दिया, ‘ सच में। यहां तो हाथ धोने के लिए भी पानी नहीं मिलता।’ मैंने मन ही मन सोचा, जिस इलाके में नहाने के लिए पानी नहीं, वह हाथ धोने के लिए कहां से लाएगा। कहीं यह हालत सब जगह न हो जाए।

अपराजिता की बात सुन कर हैरत में नहीं हूं। यह भारत ही है जहां कुछ इलाकों में मल त्याग करने के बाद लोग रेत और मिट्टी से हाथ रगड़ कर घर लौटते हैं। पिछले दिनों न्यूजरूम में काम करते हुए खबर पर निगाह गई थी, जिसमें बताया गया था कि सेनेटाइजर से नहीं, पानी से हाथ धोने से किटाणु खत्म होते हैं। जापान में हुए अध्ययन में बताया गया है कि सेनेटाइजर से हाथ धोने के दो मिनट बाद फ्लू के वायरस जिंदा हो जाते हैं। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि गरम पानी से या एंटीबॉयटिक साबुन से अच्छी तरह हाथ धोना चाहिए। यानी स्वच्छता और सफाई के लिए जल का कितना महत्त्व है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन कश्मीरी गेट है। ….. मैंने अपराजिता को जल्द लौटने की सलाह दी है। मेट्रो अगले स्टेशन की ओर बढ़ चली है। मोबाइल की घंटी एक बार फिर से बजने लगी है। यह मेरे घर काम करने वाली बीना का फोन है। कह रही है ‘साहब जी, आप तो निकल गए दफ्तर। मगर टंकी में पानी नहीं? जल बोर्ड का भी पानी नहीं आ रहा।’ ‘……. कोई बात नहीं। तुम सिर्फ झाड़ू लगा दो।’ मैंने उससे कहा। ‘जी लगा दी। कुछ कागज गिरे पड़े थे वो संभाल कर रख दिए। और कागज का पुिलंदा भी टेबल पर रख दिया है।’ उसने कहा। ‘अच्छा-अच्छा….. वो डॉक्टर साहब का शोधपत्र?’ मैंने कहा। पता नहीं साहब जी, उस पर लिखा है-राष्ट्र निर्माण का गांधीवादी तरीका: स्वास्थ्य और सफाई। ‘हां…हां वही।’ बीना मैट्रिक तक पढ़ी है। मां की मदद के लिए घरों में साफ-सफाई का काम करती है। इसलिए कागजों पर लिखे मेरे शब्दों को सबसे पहले पढ़ लेती है।

….. याद आया कि डॉ एके अरुण ने पानी की कमी पर अपना चिंतन साझा करते हुए अपना शोधपत्र मुझे पढ़ने के लिए दिया था। एक दिन मुलाकात के दौरान बता रहे थे कि ब्रिटेन की महारानी टेम्स नदी के पास टहलते समय उसमें गंदगी देख कर किस तरह बेहोश होकर गिर पड़ी थीं। गर्मी की वजह से नदी आधी सूख गई थी। वह मानव नल से बजबजा रही थी। अब समझ में आया कि उन्होंने अपने शोध में सबसे पहले यहीं क्यों लिखा- स्वास्थ्य और सफाई हमारे जीवन के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। स्वास्थ्य के बिना जीवन नहीं और सफाई के बिना स्वास्थ्य नहीं। और इन दोनों के बिना व्यक्ति नहीं। व्यक्ति नहीं तो राष्ट्र नहीं। स्वास्थ्य और सफाई दोनों के लिए पानी का जरूरत होती है और हमारे पर्यावरणविद बता रहे हैं कि भारत की भूजल परतें सूख रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे हमारी आंखों से पानी सूख रहा है।

मैं पानी को लेकर भावुक हो गया हूं। मैं डाक्टर साहब को कॉल कर रहा हूं। मगर उनसे संपर्क नहीं हो रहा। इस बीच उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन राजीव चौक है। मैं सीट से उठ गया हूं। मैं कुछ सहयात्रियों के हाथों में ब्रांड कंपनियों की बोतल देखता हूं तो लगता है कि जिस मनुष्य का जल पर एकाधिकार होना चाहिए उस पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां कब्जा करती जा रही हैं। आज तमिलनाडु और पंजाब में पानी की जो किल्लत है, उसके लिए शीतल पेय बनाने वाली कंपनियां जिम्मेदार हैं।

……. कोच के दरवाजे खुल गए हैं। मैं प्लेटफार्म नंबर तीन पर जा रहा हूं। मेरे ठीक सामने बहुराष्ट्रीय कंपनी का आउटलेट है। यात्री वहां से शीतल जल खरीद रहे हैं। हमने जल को बोतलों में कैद कर लिया है। जो पानी हमें मुफ्त में मिलना था, उसे आज हम खरीद कर पी रहे हैं। पांच-दस पैसे में बिकने वाला पानी दस रुपए बोतल में खरीदना होगा, यह किसने सोचा था। अगले सौ सालों में हम आक्सीजन सिलेंडर खरीद कर सड़कों पर चल रहे होंगे।

मैं इस वक्त प्लेटफार्म के अंतिम छोर पर खड़ा हूं। नोएडा इलेक्ट्रानिक सिटी जाने वली मेट्रो आ गई है। मैं लास्ट कोच की अंतिम सीट पर बैठ गया हूं। …….डाक्टर साहब फोन कर रहे हैं। मोबाइल स्क्रीन पर उनका नाम चमक रहा है। …… जी अरुण जी। दुनिया भर में जल संकट पर कुछ लिखने के लिए सोच रहा था। सोचा आपसे बात कर लूं। मैने कहा। ‘अच्छा हुआ आप से बात हो गई। बस अभी लौटा हूं बागेश्वर से’, डॉक्टर साहब ने जवाब दिया। ‘स्वच्छता पर अध्ययन कर रहा हूं। आप तो जानते ही हंै कि हम लोग नदियों और तलाबों को किस तरह गंदा कर रहे हैं। बागेश्वर में मैने अपनी आंखों से देखा। एक अधिकारी ने शौचालय का मॉडल प्रोजेक्ट देखने के लिए बुलाया था। पहाड़ पर शौचालय का टैंक देख कर आश्चर्य हुआ। पूछने पर बाबू लोगों ने कहा कि बारिश के दिनों में टैंक को खोल दिया जाता है और सारी गंदगी नदी में बहती हुई निकल जाती है। लंदन ने बरसों पहले अपनी गलती सुधार कर टेम्स नदी को रमणिक स्थल में बदल दिया और एक हम हैं कि अपनी नदियों को आज भी मल-मूत्र और कल-कारखानों की गंदगी से मैली किए जा रहे हैं।’

मैंने डाक्टर साहब से पूछा, आखिरी नदियों को बचाने का उपाय क्या है? मेरे इस सवाल पर वे बता रहे हैं, टेम्स में भी सीवर का पानी छोड़ा जाता था। दरअसल, समस्या की जड़ हमारा सीवर सिस्टम है। 1858 में लंदन में भयंकर गर्मी पड़ी। टेम्स नदी लगभग सूख गई थी। वह मानव-मल और से बजबजा उठी। उस गंदगी और बदबू को आज भी द ग्रेट स्टिंक के नाम से याद किया जाता है। तब तक टेम्स लंदन का शौचालय बन चुकी थी। मध्य काल में यूरोप के शहरों में मलमूत्र खुले में कहीं भी पड़े रहते थे। जबकि उस समय का भारत वहां से कहीं बेहतर था। धीरे-धीरे लोग घर के बाहर गड्ढा बना कर उसमें मल-मूत्र जमा करने लगे। इस गड्ढे को सेसपिट कहा जाता था। फ्लश कमोड और सेसपिट 1800 से 1850 तक लगभग दोगुनी हो चुकी लंदन की आबादी का मल-मूत्र बहाने लगे। टेम्स नदी नाला बन गई। तब लंदन महानगर बोर्ड के चीफ इंजीनियर जोसेफ बैजलगेट ने टेम्स के समांंतर एक नहर बना कर उसमें सीवर का पानी छोड़ा। इससे राहत मिली और लंदन को हैजे से बचाया जा सका।

डाक्टर साहब बता रहे हैं, …..मानव मल-मूत्र के महत्त्व को 1867 में दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने समझा। वे लंदन के सोहा में रहते थे। वही सोहा जहां 1854 में एक हैंडपंप से भयानक हैजा फैला था। उसी हैजे से उनकी बेटी फ्रांसिका की मौत हो गई थी। तब वे नहीं जानते थे कि हैजा दूषित पानी से फैलता है। लेकिन मार्क्स को लंदन की सीवर में खोट दिखा। और उन्होंने माना कि सीवर ही हैजे की वजह है। ……. तब तो डाक्टर साहब पूरी दुनिया में सीवर न केवल स्वच्छ पानी की बर्बादी बल्कि नदियों के गंदा होने की वजह है। मैंने कहा। डाक्टर साहब बोले, सही कहा आपने। अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने 1910 में व्यापारियों के समूह से कहा था कि-सभ्य लोगों को अपने मैले पानी के निस्तार का कोई बेहतर तरीका आना चाहिए। बजाय इसके कि उसे पानी में डालने के। मगर तब इसे किसी ने नहीं समझा। अलबत्ता, महात्मा गांधी 1934-38 के दौरान गांवों में घूमते रहे। 1940 में उम्होंने गांवों की सफाई के लिए सूखा शौचालय बनाने की बात कही। और उसे प्रचारित करने लगे।

डाक्टर साहब से बात करते हुए कई स्टेशन निकल चुके हैं। मेट्रो इंद्रप्रस्थ से आगे निकल रही है। वह धीरे-धीरे यमुना की ओर बढ़ रही है। सिग्नल न मिलने से यह पुल के बीचों-बीच खड़ी हो गई है। देख रहा हूं यमुना कितनी मैली हो चुकी है। आसमान से उतर कर अपना चेहरा निहारता बादल कितना उदास है। जो यमुना कभी अठखेलियां करती कलकल बहती थी। यूपी से बहती चली आई यमुना आज कितनी उदास और कितनी अकेली है। दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता इस नदी के दोनों किनारे। अलबत्ता नदी के बीच पानी कम होने से उठ गए रेत के ढूह पर बगुले जरूर दिखाई पड़ रहे हैं। चार-पांच भैंसों का झुंड भी विराजमान है। इनका मालिक इन्हें छोड़ कर चला गया है।

उफ। हमने युमना को किस हाल में छोड़ दिया है। बरसों से दिल्ली की गंदगी को ढोती इस यमुना के किनारे सचिवालय में बैठे अधिकारी इसे टेम्स का सपना देखते हुए रिटायर हो गए। दिल्ली पर न जाने कितने शासकों ने राज किया। न जाने कितने फैसले हुए। मगर जिस पानी से इस शहर की जिंदगी बचेगी, उसे बचाने का संकल्प साकार होते कभी नहीं दिखा। ……. मेट्रो धीरे धीरे यमुना बैंक स्टेशन की ओर बढ़ चली है। क्या सोच रहे हैं आप? मेरी चुप्पी पर डाक्टर साहब ने टोका। कुछ नहीं सर। बस यमुना की दुर्दशा देख कर आंखों में पानी आ गया, मैंने भावुक होते हुए कहा। अरे……अरे इस पानी को बचाइए आप। आंखों का पानी बचेगा तो इंसानियत ही नहीं इस धरती को भी हम लोग बचा लेंगे, डॉक्टर साहब ने समझाया। वे कह रहे हैं, इसीलिए मैं कहता हूं कि सीवर सिस्टम को खत्म करना होगा। गांधी जी ने मानव मल-मूत्र को स्वर्ण खाद कहा था। 1956 में सेवाग्राम में आश्रम में कई सामूहिक शौचालय बनाए गए। ये शौचालय कम पानी इस्तेमाल करने वाले लगभग सूखा शौचालय थे। गांधी जी के इस प्रयोग का प्रमाण आज भी देखा जा सकता है। एक फ्लश टैंक से कोई आठ से दस लीटर पानी बर्बाद होता है। तो इस प्रयोग से हम करोड़ों लीटर पीने का पानी बचा सकते हैं। और अपनी नदियों को मैली होने से बचा सकते हैं।

उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन यमुना बैक है। दरवाजे दायीं ओर खुलेंगे। डाक्टर साहब कह रहे हैं, किसी दिन चाय पर मिलते हैं। विस्तार से बात होगी। ……मैंने उनसे मिलने का वादा करते हुए मोबाइल जेब में रख लिया है। यमुना की तलहटी पर बसे इसे मेट्रो स्टेशन के आसपास हरियाली मुग्ध कर रही है। गरमी के दिनों में भी यहां शीतलता का बोध होता है। उधर, कजरारी यमुना अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाती चली जा रही है। मगर हमारे आंसू सूख चुके हैं। मैंने आंखें बंद कर ली हैं। मेट्रो चल पड़ी है।

अगला स्टेशन अक्षरधाम है। उद्घोषणा हो रही है। कुछ ही देर में दरवाजे खुल गए। …. आप जानते हैं कि यहां एक ओर घनी अबादी वाली बस्तियां हैं तो दूसरी ओर भव्य मंदिर के पीछे डीडीए के बहुमंजिला महंगे फ्लैट। ये सभी यमुना को लील रहे हैं। यह नदी सूख कर नाला बन गई है। किसी दिन हम बच्चों को कहेंगे, बेटा यहां कभी यमुना बहा करती थी। ……. मेट्रो फिर से चल पड़ी है। अगले दो स्टेशन मयूर विहार के हैं। मैं अपनी आंखें मूंदे रहना चाहता हूं। इन्हें सजल बनाए रखना चाहता हूं। कबीर कह गए हैं कि भाई बिना पानी सब सून है। इस समय पूरी दुनिया पानी को बचाने के लिए उठ खड़ी हुई है। लोगों को जल शरणार्थी होने से बचाना है। पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह बता रहे हैं कि भारत की आधी भूजल परतें सूख चुकी हैं। ऐसे में लोगों का पलायन देश के एक अन्य हिस्से से दूसरे हिस्से में या जल प्रचुरता वाले देशों की ओर हो सकता है। स्टॉकहोम में वे जब बता रहे थे तो उन्हें सुन कर मैं सकते में था। क्या हम अगली पीढ़ी को को प्यासा मरने देंगे।

अगला स्टेशन न्यू अशोक नगर है। उद्घोषणा हो रही है। मेरे चिंतन क्रम में विराम लग गया है। मैं सीट से उठ गया हूं। तभी मोबाइल की घंटी बज उठी है। अरे यह तो अपराजिता की कॉल है। अब क्या हुआ, मैंने पूछा तो उसने कहा, कुछ नहीं नहाने का जुगाड़ हो गया। एक महिला मेरे लिए कहीं से पानी ले आई है। देखिए अब जाकर चैन पड़ा है। बदन पर मॉइश्चराइजर लगा रही हूं। ….. हां तुम्हारी संदली देह की खुशबू यहां तक आ रही है। इश्श.. आप भी न। उसने फोन काट दिया है। मैं उसे कहना चाहता हूं, अपराजिता यह देह तो जल पर टिका है मगर अपनी आंखों में भी पानी बचा कर रखना। ….. मैं स्टेशन की सीढ़ियां उतर रहा हूं। बाहर निकलते ही रिक्शे वाले मुझे देख कर शोर मचाने लगे- बाबू जी, बाबू जी। ओ बाबू।

स्टेशन के बाहर उमस है। आसमान में बादल छाए हैं। पेड़ की छाया में बैठे रिक्शे वाले प्यासे दिख रहे हैं। मैंने एक रिक्शे पर बैठते हुए कहा, पानी पियोगे? उसने कहा, हां बाबू। इस पर मैंने रिक्शेवाले को दस रुपए का नोट देते हुए कहा, लो साथियों को भी पिला दो। वह मेरा मुंह देखने लगा है। स्टेशन के नीचे सामने वाटर क्योस्क पर दो रुपए गिलास पानी बिक रहा है। मेरा रिक्शा वाला चार साथियों के साथ पानी पी रहा है। उनके चेहरे पर तृप्ति का भाव है। पानी पीकर वे अपनी-अपनी सवारियां लेकर निकल पड़े हैं। मेरा रिक्शा वाला भी मुझे लेकर दफ्तर चल पड़ा है। थोड़ा आगे बढ़ते ही रिमझिम बारिश शुरू हो गई है। मैंने बांहें फैला कर अपनी हथेलियों में कुछ बूंदें समेट ली हैं। सोच रहा हूं कि काश लोगों को पानी बचाने की सद्बुद्धि मिले। ……. रिक्शा हवा के थपेड़ों और पानी का फुहारों के बीच बढ़ चला है। बाबू साहब ने पाकेट से अपना ट्रांजिस्टर निकाल कर मुझे पकड़ा दिया है। उसके कान क्या उमेठे, वह एक पुराना गीत गा उठा है-

पानी रे पानी, तेरा रंग कैसा,
जिसमें मिला दो उस जैसा………
वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए
जब तू फिरे उम्मीदों पर
तेरा रंग समझ ना आए
कभी खिले तो झट आ जाए
पतझड़ का पैगाम…
पानी रे पानी…..।

दफ्तर के सामने रिक्शे से उतरते ही बारिश के पानी को मैंने अपनी आंखों में सहेज लिया है। इनमें भावनाओं का समंदर हैं तो नदियों का आवेग भी। सबको अपने मन में एक बांध बनाना होगा, यह सोच कर कि हम पानी को बर्बाद नहीं होने देंगे। तो लीजिए आप भी संकल्प।

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