प्रयागराज की एक पुरानी इमारत के एक छोटे से कमरे में एक दिन बहस चल रही थी, वह देखने में बहुत छोटी लगती थी, लेकिन उसमें पूरा माहौल उलझा हुआ था। बात किसी बड़े सिद्धांत या राजनीति की नहीं थी। मुद्दा बस एक शब्द था – ‘किताब’ या ‘पुस्तक’। हिंदुस्तानी अकादमी नाम से मशहूर इस इमारत में यही वह कमरा था जहां अक्सर ऐसी बैठकों में भाषा पर चर्चा होती थी। बाहर से यह सब सामान्य दफ्तर जैसा लगता था, लेकिन अंदर कई बार शब्द ही बहस का मैदान बन जाते थे।

उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। एक तरफ मेज के पास बैठे एक लेखक ने कहा, “देखिए, बच्चों के लिए हम जो लिखते हैं उसमें ‘किताब’ शब्द ज्यादा आसान है। यह उनके घर की भाषा जैसा है।” उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सामने बैठे एक बुजुर्ग विद्वान ने हल्के से सिर हिलाकर कहा, “लेकिन अगर हर जगह ‘किताब’ ही लिखेंगे तो फिर ‘पुस्तक’ जैसे शब्द कहां रहेंगे? भाषा की गंभीरता भी तो कुछ होती है।”

कमरे में हल्की हलचल हुई। तभी एक युवा लेखक, जो थोड़ी देर से चुप बैठा था, मुस्कुराया और बोला, “सर, लेकिन अगर भाषा बहुत भारी हो जाएगी तो बच्चे किताब ही नहीं उठाएंगे। फिर ‘पुस्तक’ तो रहेगी, लेकिन पढ़ने वाला ही नहीं रहेगा।” इस पर कुछ लोग हंस पड़े। कोई नाराज नहीं हुआ, क्योंकि यहां बहस का मतलब जीतना नहीं था, समझना था।

यही हिंदुस्तानी अकादमी की असली पहचान थी। यह सिर्फ किताबें छापने वाली जगह नहीं थी। यह वह जगह थी जहां यह तय करने की कोशिश होती थी कि भाषा लोगों तक कैसे पहुंचेगी। शब्द सिर्फ शब्द नहीं थे, वे लोगों की समझ, उनकी आदत और उनके जीवन से जुड़े हुए थे।

हिंदुस्तानी अकादमी की शुरुआत 1927 में प्रयागराज में हुई थी। उस समय देश में आजादी की लहर धीरे-धीरे तेज हो रही थी। समाज में नई सोच बन रही थी, लोग अपने विचार खुलकर रखने लगे थे। इसी बीच भाषा को लेकर भी बहस तेज हो गई थी। एक तरफ हिंदी को आगे बढ़ाने की बात हो रही थी, दूसरी तरफ उर्दू की परंपरा और उसका असर भी मजबूत था। बहुत लोगों के लिए यह सिर्फ भाषा का सवाल नहीं था, यह पहचान का सवाल भी बन चुका था।

हिंदुस्तानी नाम रखने के पीछे भी बड़ी वजह है

ऐसे समय में सरकार ने एक संस्था बनाई, जिसका नाम रखा गया – हिंदुस्तानी अकादमी। नाम ही अपने आप में एक संदेश था। “हिंदुस्तानी” यानी ऐसी भाषा जो सिर्फ एक तरफ न झुके, बल्कि दोनों तरफ की समझ को साथ लेकर चले। लेकिन नाम रखना आसान था, उसे निभाना मुश्किल था। अकादमी के शुरुआती दिनों में ही यह साफ हो गया कि यहां हर चीज पर चर्चा होगी। कभी शब्दों पर, कभी वाक्यों पर, कभी किताबों के नाम पर।

और सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात पर होती थी कि आम लोग क्या समझते हैं। कमरे में होने वाली बैठकों में अक्सर एक बात दोहराई जाती थी – भाषा का असली काम लोगों तक पहुंचना है, न कि सिर्फ किताबों में सुंदर दिखना। कई बार ऐसा होता था कि एक ही शब्द पर घंटों बहस चलती थी। जैसे ‘आजादी’ कहें या ‘स्वतंत्रता’, ‘कहानी’ कहें या ‘अफसाना’, ‘किताब’ कहें या ‘पुस्तक’।

बाहर से देखने वाले लोग सोचते थे कि यह समय की बर्बादी है। लेकिन अंदर बैठे लोग जानते थे कि यही असली काम है। क्योंकि अगर शब्द ही लोगों से दूर हो गए तो भाषा भी दूर हो जाएगी। उस समय प्रयागराज सिर्फ एक शहर नहीं था। वह एक बड़ा बौद्धिक केंद्र था। वहां विश्वविद्यालय था, अखबार थे, लेखक थे और लगातार चलने वाली चर्चाएं थीं। ऐसे माहौल में हिंदुस्तानी अकादमी का होना एक स्वाभाविक बात थी।

यहां सिर्फ बैठकों में बहस नहीं होती थी, बल्कि सोचने का तरीका भी बदलता था। कई पुराने कर्मचारी बताते थे कि अकादमी में एक अजीब सी आदत थी। यहां किसी बात का तुरंत अंतिम फैसला नहीं होता था। बात घूमती रहती थी, लोग अपनी राय बदलते रहते थे, और कई बार कोई बीच का रास्ता निकल आता था।

भाषा के मामले में यह तरीका बहुत जरूरी था, क्योंकि यहां सही और गलत का फर्क हमेशा साफ नहीं होता था। यहां सवाल यह होता था कि कौन सा शब्द ज्यादा लोगों तक पहुंच पाएगा।

मुंशी प्रेमचंद का नाम भी इस माहौल में बहुत बार लिया जाता है। उन्होंने उर्दू और हिंदी दोनों में लिखा था। उनका लेखन इस बात का उदाहरण था कि भाषा कोई दीवार नहीं है, बल्कि एक रास्ता भी हो सकती है। वे पहले उर्दू में लिखते थे और बाद में हिंदी में भी उतनी ही सहजता से लिखने लगे। उनका लेखन दोनों ही भाषाओं में पढ़ा गया और पसंद किया गया।

मुंशी प्रेमचंद भी एक उदाहरण की तरह देखे जाते थे

अकादमी के लोग उन्हें एक उदाहरण की तरह देखते थे, भले ही वे संस्था के सीधे सदस्य न रहे हों। लेकिन उनकी सोच उस विचार से मेल खाती थी, जिसे अकादमी आगे बढ़ाना चाहती थी। हिंदुस्तानी अकादमी का एक और काम था किताबों का प्रकाशन। उस समय किताबें हर किसी के लिए आसान नहीं थीं। वे महंगी भी होती थीं और हर जगह उपलब्ध भी नहीं थीं। इसलिए अकादमी ने कोशिश की कि अच्छी साहित्यिक किताबें ज्यादा लोगों तक पहुंच सकें।

इसका असर यह हुआ कि हिंदी और उर्दू का साहित्य सिर्फ कुछ खास वर्ग तक सीमित नहीं रहा। धीरे-धीरे वह आम पाठकों तक पहुंचने लगा। अकादमी ने अनुवाद पर भी काम किया। लेकिन यहां अनुवाद का मतलब सिर्फ शब्द बदलना नहीं था। कोशिश यह थी कि एक भाषा का विचार दूसरी भाषा में भी वैसे ही समझा जा सके। यह काम आसान नहीं था, क्योंकि हर भाषा का अपना ढंग होता है। लेकिन धीरे-धीरे इस काम से दोनों भाषाओं के बीच दूरी कम होने लगी।

अकादमी के कमरे में होने वाली चर्चाएं सिर्फ भाषा तक सीमित नहीं रहती थीं। वहाँ समाज की बातें भी होती थीं, साहित्य की बातें भी होती थीं, और कभी-कभी जीवन के अनुभव भी साझा किए जाते थे। कई बार कोई नया लेखक आता था। वह चुपचाप बैठा रहता था। फिर कोई पुराना लेखक उससे पूछता था, “तुम लिखते क्यों हो?”

इस सवाल का जवाब हर किसी के पास नहीं होता था। लेकिन यही सवाल कई लोगों के लेखन की दिशा बदल देता था। क्योंकि यहां यह समझाया नहीं जाता था कि क्या लिखना है, बल्कि यह सोचने पर मजबूर किया जाता था कि क्यों लिखना है। समय के साथ अकादमी का स्वरूप बदलता गया, लेकिन उसकी बहस करने की आदत नहीं बदली।

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आज भी अगर पुराने लोग याद करते हैं तो वे यही कहते हैं कि वहाँ सबसे बड़ी सीख यह थी कि हर बात से सहमत होना जरूरी नहीं है, लेकिन हर बात को समझना जरूरी है। अगर इस पूरी कहानी को एक सीधी बात में समझा जाए तो वह यह है कि हिंदुस्तानी अकादमी सिर्फ एक संस्था नहीं थी। वह एक ऐसी जगह थी जहां भाषा को लोगों के करीब लाने की कोशिश होती थी।

और उस छोटे से कमरे की वह बहस – “किताब” या “पुस्तक” असल में बहुत बड़ी बात कह रही थी। वह यह कि शब्द चाहे जैसे भी हों, उनका असली मतलब तभी पूरा होता है जब वे किसी इंसान तक पहुंचें। बाहर से यह बहस बहुत छोटी लगती थी, लेकिन अंदर से यह पूरी भाषा की दिशा तय करने की कोशिश थी। और शायद इसी वजह से हिंदुस्तानी अकादमी के कमरे में चलने वाली ये बातें आज भी याद की जाती हैं। क्योंकि वहां कोई अंतिम जीत नहीं होती थी।

वहां सिर्फ एक कोशिश होती थी कि भाषा भारी न हो, दूर न हो, और लोगों की अपनी लगे। और इसी कोशिश में ‘किताब’ और ‘पुस्तक’ के बीच घंटों चलने वाली बहस भी किसी नतीजे से ज्यादा एक समझ बनकर रह जाती थी। समझ यही कि भाषा का काम लोगों को जोड़ना है, उनसे दूर जाना नहीं।

प्रयागराज में अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं, लेकिन राज्य सरकार के भाषा विभाग के अंतर्गत संचालित हिंदुस्तानी अकादमी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रही है, जिससे हिंदी भाषा विश्व की प्रमुख भाषाओं के साथ समान रूप से आगे बढ़ सके। यह संस्था दुर्लभ और प्राचीन पुस्तकों का प्रकाशन करके हमारी साहित्यिक विरासत को सुरक्षित रखने का कार्य करती है ताकि यह धरोहर वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुंच सके।

साथ ही यह अकादमी विदेशी भाषाओं की साहित्यिक कृतियों का हिंदी में अनुवाद भी करती है और लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार अन्य भाषाओं के साहित्य को भी हिंदी में रूपांतरित करती है। कुछ साल पहले थियोसॉफिकल सोसायटी की अंग्रेजी पुस्तक सनातन धर्म का हिंदी अनुवाद किया गया है।

साहित्यकारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से यह संस्था विभिन्न पुरस्कार भी प्रदान करती है, जिनमें तीन राष्ट्रीय और लगभग दस प्रादेशिक स्तर के सम्मान शामिल हैं, जैसे गुरु गोरखनाथ शिखर सम्मान, गोस्वामी तुलसीदास सम्मान और संत कबीर दास सम्मान। इसके अतिरिक्त, अकादमी समय-समय पर संगोष्ठियों और व्याख्यानों का आयोजन करती है, जिससे साहित्यकार अपने विचार और रचनाएं समाज तक पहुंचा सकें और लोग उनसे प्रेरणा प्राप्त कर सकें।

यहां एक समृद्ध पुस्तकालय भी है, जिसमें लगभग 25,000 पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिनमें 17,000 हिंदी की पुस्तकें तथा लगभग 300 पांडुलिपियां शामिल हैं, जिनका डिजिटलाइजेशन भी किया जा रहा है, और आम लोग भी यहां आकर इन पुस्तकों का अध्ययन कर सकते हैं।

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सन 1960 के दशक में इलाहाबाद (जिसे अब प्रयागराज कहते हैं) की सुबह किसी आम शहर की सुबह नहीं होती थी। अखबार की सुर्खियां दिन की शुरुआत तय नहीं करती थीं, वे सिर्फ एक बहाना होती थीं। असल शुरुआत तो उन सवालों से होती थी, जो छात्र रात से लेकर सुबह तक अपने साथ ढो रहे होते थे। ब्रेड पकौड़े की दुकानों पर भी चाय कम पी जाती थी, और वहां पर विचार ज्यादा उबलते थे। कोई रास्ते से गुजरता छात्र अगर किसी मोड़ पर रुक जाए, तो यह तय मान लिया जाता था कि वह किसी खबर को नहीं, किसी विचार को पढ़ रहा है। इस वातावरण में इलाहाबाद विश्वविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं रह गया था, वह एक ऐसा जीवंत मंच बन चुका था, जहां समाजवाद एक सिद्धांत नहीं, एक रोजमर्रा की बातचीत थी, और राजनीति कोई दूर की चीज नहीं बल्कि छात्रावास के कमरों में बैठी हुई रात की सबसे करीबी साथी थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक