सुबह से मोबाइल की घंटी बज रही थी। साइलेंट मोड पर होने के कारण मेरा ध्यान नहीं गया। ऐसे भी मुझे आठ बजे तक सोने की आदत है। देर रात को बेड़ पर सोने जाओ तो
भला ब्रह्म मुहूर्त में कौन उठना चाहता है! उधर बड़े भाई साहब के दो दर्जन से अधिक मिस्ड कॉल थे।
“प्रणाम!. अभी जगा हूं… कोई खास बात है..?” मोबाइल का कॉल चेक करते मैं घबरा गया । कोई अनहोनी का अंदेशा मेरी आंखें के सामने तैरने लगा था। “खुश रहो… बुरी खबर ही समझो….. लेकिन..” और उन्होंने कुछ पल का ठहराव ले लिया बातचीत में।
“पापा ठीक है न….. तबीयत ठीक है न उनकी… बीपी और डायबिटीज कंट्रोल में है। न….??” भईया के मुंह से निकले आखिरी शब्द लेकिन ने मेरे दिल की धड़कन बढ़ा दी थी।
“पापा तो स्वस्थ हैं पर बिट्टू घर पर भारी मुसीबत बरस पड़ी है।.. कल दोपहर को घर के मुंडेर पर एक गिद्ध बैठा दिखा सबको. फिर…”
“तो फिर क्या?.. क्या अभी तक वह वहीं बैठा है… उड़ाया नहीं आप लोगों ने?..”
“पत्थर मार दो तीन मिनट के अंदर ही उड़ा दिए थे हम लोग लेकिन बिट्टू”
“खुलकर बताते क्यों नहीं… ये गांव में रहने वाले लोगों की जबान आधी ही क्यों खुलती है… मेरा मतलब वे कोई बात स्पष्ट क्यों नहीं बताते हैं.. और मुझे आप बिट्टू मत कहा करिए। अब मैं पैंतीस का हो गया हूं। बड़े शहर के नामी कॉलेज में प्रोफेसर हूं। आठ दस साल का लौंडा थोड़ी ही हूं?.
“अच्छा तो हमारे जैसे गांव वालों को गंवार समझते हो। गोद में खेलाया है तुम्हें। पेसाब पैखाना किए हो गोद में ही। आज शहर में रहने लगे तो हम जाहिल दिखने लगे तुम्हें। इसी गांव की मिट्टी में नंगे खेले हो। आज भी सब बिट्टू के नाम से ही पहचानते हैं तुम्हें।… प्रोफेसर ललित प्रसाद बोलूं तो पड़ोसी समझेंगे कि मैं किसी अनजान व्यक्ति से बतिया रहा हं।. और मैं भी यहां घर पर बैठकर सिर्फ भगवान की माला नहीं जपता हूं.. कोई अनपढ़ नहीं हूं। प्राइमरी स्कूल में शिक्षक हूं। उसमें भी मैथ्स पढ़ाता हूं बच्चों को। तुम्हारी तरह क्लास रूम में जाकर मौखिक भाषण देकर और देश दुनिया की राजनीति की बात बतियाकर घर लौट नहीं आता हूं। छोटे बच्चों को जोड़ घटाव सिखाना आसान बात नहीं है। यहां गांधी-बुद्ध के विचार नहीं समझाया जाता है। छोटा बनकर उनके साथ खुद ही गिनती और ककहरा सीखना पड़ता है।..और साथ ही साथ मां बाप की सेवा भी करता हूं।…पांच लोग मुझे रोज नमस्कार बोलते हैं रास्ते में । दस बच्चे पैर छूते हैं मेरे।..”
“आप तो सीरियस ले बैठे मेरी बातों को.. मैं तो बस यह कह रहा हूं कि गिद्ध कुछ पल के लिए बैठ ही गया घर पर तो कौन सी जमीन जोत ली हमारी। एक बाल्टी पानी से धो दीजिए उस स्थान को। धोने से मन हल्का न हो तो एक दो अगरबती जला दीजिए। इतना परेशान होने की जरूरत ही क्या है?..”
“तो दिखा दी न अपनी प्रोफेसरगिरी… ठीक कहते हैं कि मोटी-मोटी किताबें पढ़कर तुम लोग सैद्धांतिक विचार तो उगल दिया करते हो लेकिन सामाजिक सच्चाई और प्रैक्टिकल नॉलेज को नहीं पकड़ पाते हो।… धरातल पर सरसों न बोकर सीधे आसमान से तेल बरसा लेना चाहते हो!” ..
“इतना क्यों घुमा रहे हैं बातों को? आप और पिताजी दोनों काम की बात करेंगे दो पल और दो घंटे बेकार की नैतिकता की बात… नहीं सुनना सुबह-सुबह गीता रामायण का श्लोक! .. कालेज के लिए लेट हो रहा हूं। सीधे काम की बात करिए।” “तो सीधे और साफ तौर पर ही सुन लो प्रोफेसर ललित प्रसाद! हमें अब दूसरा घर बनाना पड़ेगा। इस घर को छोड़ देना होगा। जिस घर पर गिद्ध बैठ गया उसमें रहना मतलब अपशकुन, बीमारी और अकाल मृत्यु को प्रत्यक्ष दावत देना है!.. समझे बिट्टू…. प्रोफेसर ललित प्रसाद..”
भईया ने गुस्से में फोन काट दिया। मैं हतप्रभ था कि पिताजी के रिटायरमेंट के पैसा से दो साल पहले ही गांव में बड़ा सा घर बनाया है। मैंने भी लाखों रुपए घर में खर्च किए हैं। विदेशी टाइल्स एवं अन्य चीजें लगवाई है। इसके लिए पत्नी से सैकड़ों बार ताने सुने हैं। दर्जनों बार बकझक हुई हैं। लाखों की सैलरी पाकर भी अभी शहर में किराए के मकान में रह रहा हूं, लेकिन गांव के घर को मॉडर्न लुक देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।… और अब घर छोड़ना पड़ेगा… सिर्फ एक गिद्ध…. एक पक्षी के कुछ पल बैठ जाने से.. धत् री दुनिया…! आज कॉलेज तो गया लेकिन मेरा मन गांव के घर पर ही अटका रहा। उधर पत्नी समझ रही थी कि शायद मेरे घर से पैसे की डिमांड आई होगी, क्योंकि कल ही सैलरी आई थी। वह बार बार फोन कर पूछ रही थी। और मैं हर बार उसे समझाने का असफल प्रयास कर रहा था। आखिरकार मैंने भाई साहब की बातें बता ही दी और जल्दी ही गांव चलने की बात भी रख दी।
दूसरे दिन ही हम गांव आ गए। इधर घर वाले पड़ोसी के घर में शिफ्ट हो गए थे। दिन में वे जरूर आते थे घर में। लेकिन किचन में खान नहीं बनाते। रात को सोते भी नहीं थे। पूरे मुहल्ले में बस चर्चा के केंद्र में मेरा घर ही था। कुछ दिनों से लोगों की जबान से सिर्फ गिद्ध की कहानियां ही सुनी जा रही थी। हर कोई ज्योतिष बन नए-नए उपाय बता रहा था। मां पिताजी और भईया भाभी न जाने कितनी सलाह और टिप्स के तले लद गए थे, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो।
“अब बिट्टू को समझ में आ गया होगा कि हमें अब दूसरा घर क्यों बनाना चाहिए।.. हर आदमी गलत तो नहीं हो सकता है। ये शास्त्र पुराण, पंडित ज्योतिष सब गलत तो नहीं हो सकते हैं.. और मैं भी कोई अनपढ़ थोड़े ही हूं.. शिक्षक से रिटायर हूं। साठ से ज्यादा बसंत और बरसात दोनों देखें हैं।” पिताजी मुझे समझा रहे थे कि अब इस घर में रहकर कोई अदृश्य जोखिम उठाने की गलती नहीं कर सकते हैं।
“अब ये पिता और बड़े भाई से भी बड़े हो गए हैं क्योंकि राजधानी में रह रहे हैं। बड़े शहर की हवा पी रहे हैं। बड़े-बड़े कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं , इसलिए इन्हें समझाना आसान नहीं है।… और हां इन्हें आप बिट्टू कह कर इनकी बेइजती मत कीजिए। आदर से प्रोफेसर ललित प्रसाद कहकर पूकारिए।.” अभी मैं पापा का रिप्लाई करता उसके पहले ही बड़े भाई साहब टपक पड़े थे।
“यह सब ढकोसला है पापा! गिद्ध भी तो एक पक्षी ही है जैसे मोर, कौवा, तोता है। यह बस झूठी कहानी गढ़ दी गई है कि घर पर गिद्ध बैठ जाए तो उसे छोड़ देना चाहिए।.. सोचिए यदि यूं ही सबके घरों पर गिद्ध बैठ जाए तो गांव वाले कहां रहेंगे।.. एक पढ़े लिखे और सभ्य समाज में ऐसी अवैज्ञानिक बातें करना तो अपराध है।… है न पापा!…” “बाप ने बेटा से ज्यादा दुनिया देखी है । इसलिए मुझे मत पढ़ाओ सही क्या है गलत क्या है?.. तुम्हारे मौसा जी भी तुम्हारे ही तरह सोच रहे थे बीस साल पहले। आज पैरालिसिस के मरीज हैं। अपने हाथ से पानी भी नहीं पी सकते हैं। अपने पैर पर खड़ा भी नहीं हो सकते हैं। एक बेटा असफल प्रेम में फांसी की फंदा लगा मर गया। दूसरा पीएचडी की भारी डिग्री लेकर जनरल स्टोर की दुकान चला रहा है। उसे एक छोटी सी सरकारी नौकरी तक नहीं मिली। शरीर से भारी भरकम तुम्हारी मौसी न जाने कितनी बीमारियों के साथ घर में जिंदा लाश बनी बैठी है।… उनके घर पर भी एक गिद्ध बैठ गया था। सबने सलाह दी थी कि घर छोड़ दो, पर तुम्हारी वाली जिद्द थी उनकी। अरे मैं दुश्मन निकल सकता था उनका, तुम्हारी मौसी गलत सलाह दे सकती थी। लेकिन पूरा समाज, पंडित, ज्योतिष, शुभचिंतक, धार्मिक किताबें सब के सब गलत तो नहीं हो सकते हैं ?… पर
होनी को कुछ और ही मंजूर था। खुद को साइंक्टीफिक सोच का मसीहा समझ बैठे थे तुम्हारे मौसा जी! और देखते-देखते कुछ ही साल में विपत्तियों का पहाड़ परिवार पर टूटा। फिर भी मंदबुद्धि इंसान उसी घर में जी रहा है।.. पागल….. मुरख..” पापा ने मौसा के जीवन की सारी कहानी बता डाली।
“पड़ोस में ही तो गुप्ता अंकल हैं। इनके घर पर तो कभी कोई गिद्ध नहीं बैठा है। ऊपर से बहुत पूजा पाठ और धार्मिक कार्यों में लिप्त रहते हैं। गांव में बने एक मात्र मंदिर में सबसे ज्यादा उन्हीं ने दान दिया है। कभी किसी के साथ उन्होंने कोई नाइंसाफी नहीं की। फिर भी उनके परिवार में दुखों की बाढ़ आई हुई है।… एक बेटा कार एक्सीडेंट में मर चुका है। पत्नी कैंसर से पीड़ित है। एक जवान बेटी को महीनों से पुलिस ढूंढ नहीं पा रही है कि मार्केट से अचानक वह कहां गायब हो गई। बड़े बेटे और बह के बीच तलाक का मामला कोर्ट में लंबित है। खुद गुप्ता अंकल चिंता और बीमारी से जुझ रहे हैं।..मैंने गहरी सांस ली और आसमान की तरह देखने लगा।
“गलती तुम्हारी नहीं है, बल्कि मेरी है कि तुम्हें बड़े शहर में रखकर पढ़ाया और ज्यादा पढ़ा दिया। ऊपर से तुम शहर में ही नौकरी पा गए। सिर्फ ब्द्धि और तर्क से परिवार समाज के कायदे कानून नहीं सुलझाए जाते हैं। पूर्वजों के बरसों के जीवन के संघर्ष तजुर्बा से रिश्ता, परिवार और समाज को संस्कारित किया जाता है। एक सुत्र में पिरोया जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियां सही मुल्यों को ग्रहण कर पारिवारिक और सामाजिक दायित्व को निभा सके।”…
पापा और भईया कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। हर कोई उन्हें दूसरा घर बनाने की सलाह दे रहा था। चारों तरफ डर और नकारात्मक कहानी सुनाई जा रही थी। उधर मम्मी का रो रो कर ब्रा हाल था। इधर मेरी पत्नी के मन में भी गिदध बैठने से हई अनहोनी की कई कहानियां तैर राही थी। वह भी उस घर में रहने के खिलाफ थी। लेकीन उसे एक चीज का घनघोर अंदेशा था कि यदि नया घर बनेगा तो मेरे अकाउंट से लाखों रुपए खर्चे होगे। फिर कई सालों से शहर में मकान खरीटदने का सपना धुंधला हो जायंगा। यह सोच सोच कर वह भी बीमार पड़ गई थी।
एके दिन में एक दुर के पंडित जी को घर लाया। उनके बारे में एक दोस्त ने बताया था। संस्कृत, अंग्रेजी और हिंदी में से एम ए थे। उनका क्वालिफिकेशन मुझे खींच गया। मिलने पर संच में मैं उनके पांडित्य से प्रभावित हुआ। उनको मैंने सारी कहानी सुनाई। बहुत हद तक उन्हें अपने तक्ों प्रभावित किया। मैं उनके जरिए चाहता था कि पूजा पाठ और कुछ कर्मकांड के जरिए लोगों के मन से मनोवैज्ञानिक तनाव का निदान हो जाए। दिर सबेर हमारा परिवार अपने घर में रहने लगे।
घर के कोने कोने का अवलोकन करने के बाद और पापा और भईया को विश्वाश में लेने के बाद पंड़ित जी ने पूजा का एक दिन तय किया।
उस दिन दूर दूर से पण्डित और साधु संत बुलाए गए।पूजा की सामग्रियां जुटाई गई। सुबह से ही भजन कीर्तन शुरू हो गया। हवनकुंड में धूप और घी की आहति दी जा रही थी। घर को फूलों से दुल्हन की तरह सजाया गया। अगरबती की खुशबू से घरआंगन महक रहे थे। परिवार, समाज और रिश्तेदारों के मुंख से सिर्फ यही प्रार्थना की जा रही थी कि की कभी भी इस घर पर कोई संकट न आए। कोई अनहोनी न हो। शाम में पुजा खत्म हई। सबने प्रसाद ग्रहण किया और अपने घर को विदा हुए।
जिस दिन गिदध बैठा था, उसके लगभग एक महीना बाद आज पूरा परिवार पहली बार फिर से घर में सो रहा था। मैं भी अपने शयनकक्ष में लेटा कुछ सोच रहा था । मुझे भी नींद नहीं आ रही थी। बस आज इस बात की तसल्ली जरूर थी की पण्डित जी के जरिए मैंने पापा भईया को वापिस घर में रहने को तैयार कर लिया था। इधर पत्नी और बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे। तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। मैंने दीवार घड़ी पर ताका तो दो बज रहे थे। दरवाजा खोला तो भईया खड़े थे। बहुत घबराए हुए।
“आप इतने परेशान क्यों हैं?.. कुछ बात तो नहीं हुई?”…
“मां..मां के सीने में भयंकर दर्द उठ रहा है। वह बार बार कह रही है कि मेरे सपने में गिदध आया था और उसने यह धमकी दी है कि इस घर को नहीं छोड़ा तो वह सबको बारी बारी से मार डालेगा। मौसा जी के घर से भी बूरी हालात पैदा कर देगा।…इस घर के अन्न जल को जहर बना देगा। .. घर में चुईल और गंदी आत्माओं का बसेरा बना
देगा।.”भईया की आंखों से आसं छलक रहे थे मैं दाई कर मां के कमरे में गया। मां अवचेतन अवस्था में थी। बिना देरी किए कार स्टाटे की और मां को हॉस्पिटल ले गया। लेकिन देर हो गई थी। डॉक्टर्स ने मां को मृत घोषित कर दिया। चारों तरफ चीत्कार की आवाज सुनाई देने लगी। मैं चाहकर भी रो नहीं पा रहा था। उस पल भईया पिताजी को रोता देख लगने लगा था कि मम्मी की मौत का जिम्मेदार मैं ही हं। अचानक आंखें खुली होते भी मुझे वह गिद्ध दिखाई दे रहा था। मानो कह रहा हो कि काश मैंने सबकी बातें मानकर वापिस इस घर में शिफ्ट करने की हिम्मत नहीं की होती तो आज मां दुनिया से विदा नहीं होती। यह भी लग रहा था मानो वह धमका रहा हो कि आगे भी समस्या आ सकती है। पर जल्द ही मैंने खद को संभाला और भईया पापा को ढांढस बांधने का प्रयास करने लगा।
इस घटना के दूसरे दिन ही हम सब फिर से पड़ोसी के घर में रहने लगे थे। मां की मौत के बाद अब तो यह तय हो चुका था कि इस घर को सौ फीसद छोड़ देना है। मैंने भी कसम खा ली थी कि जो भईया पापा कहेंगे, वैसा ही होगा। अब मैंने तर्क वितर्क करना छोड़ दिया था। अब कोई भी व्यक्ति आकर जो भी कहानी सुनाता, उसके समर्थन में मैं अपना सिर हिला दिया करता।
मां की तेरहवी के बाद मैं शहर लौटने की तैयारी कर रहा था। पत्नी संग अपने कपड और सामान पैक कर रहा था। तभी पापा की आवाज सुनाई देी।
“बिट्टू… अरे वो बिट्ट्…2”
पपा आपने मुझे बुलाया क्या? पापा के कमरे में दाखिल होते हुए मैंने कहा। “हमने तय कर लिया है कि गप्ता जी के घर के बगल में जो आपनी जमीन है, उसी में घर बनाएंगे। दीवाली के दो दिन बाद ही घर का नींव भी पड़ जायेगा।… ज्योतिष ने मिट्टी सूंघकर ही बता दिया है कि यहां घर बनाना बड़ा शुभ रहेगा!”…
“ठक है पापा…. मैं कल सुबह ही शहर चला जाऊंगा। अब ज्यादा दिन की छुट्टी भी नहीं ले सकता।”… मैं और पापा बतिया रहे थे तभी भैया वहां पहुंच गए। “बिट्टू…. अरे गलती हो गई…प्रोफेसर ललित प्रसाद जी, हमने तय किया है कि चाहे जितना खर्चा हो, उसी तरह बढ़िया और बड़ा घर बनाएंगे ताकि लोर्गों को यह लगे की बना बनाया घर त्यागने के बाद भी हमारी स्तिथिति कमजोर नहीं हई है।… दरवाजे पर मां की संगमरमर की मूर्ति भी बिठाएंगे।.. घर बनते ही बड़ा यज्ञ भी करेगें।…”
अब मैं उनकी बातें सुनकर कोई प्रतिवाद खड़ा नहीं करना चाहता था। छोटा घर बना उसमें रहने और पै्सों को बचाने की बात कहने की मेरी हिम्मत नहीं थी। दस साल और किराए के मकान में रहने के लिए मन को समझाने का प्रयास कर रहा था। सुबह सुबह तैयार होकर पापा के पैर छूए। भईया अपनी कार से हमें स्टेशन छोड़ने आए।
“मैं एक शिक्षिक हूं, पढ़ा लिखा हं। तम्हारे तर्क गलत नहीं थे प्रोफेसर ललित प्रसाद, लकान कुछ चीजे त्क और विचार से परे हैं। सामहिक जीवन में रहने पर कुछ बातों पर आंख मूदकर मैरोसा करना पड़ता है। आस्था, विश्वास और पारंपरिक मूल्यों को ढोना पड़ता है, नहीं तो आदमी का समाज से जड़ाव ढीला पड़ने लगता है। फिर एकांगी जीने की मजबूर होना पड़ता है।”….
आज पहली बार भईया की इस तरह की बातें सनकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। बल्कि इस बात की मीठा एहसास हुआ कि भईया के दिल में मेरे विचार एवं मेरे तर्कों का सम्मान जरूर है। मन किया उनके गले से लिपट खुब रोऊं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया।
विदा होते समय मैंने भईया का पैर छुए।
“खुश रहिए प्रोफेसर ललित प्रसाद!.. अपना ख्याल रखिएगा और पहुंच कर फोन करिएगा!”..
“भैया आज से वादा करिए कि आप मुझे बिट्टू कहकर ही बुलाएंगे..”.. यह सुनते ही भईया की आंखें डब-डबा गई। वे मेरे गले से लिपट गए थे।
(सुधी पाठक हर बुधवार को ‘पढ़ो कहानी’ श्रृंखला की कहानियां जनसत्ता ऑनलाइन पर पढ़ सकते हैं।)
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बड़ी मुश्किल से एक वक्त अपना पेट भर पाती हैं, जमुनी। पर हां. अपने तीन साल के बेटे रमुआ को तीन-चार बार जरूर खिलाती है। मर्द को गुजरे हुए दो साल हो चुके हैं। प्रशासन की तरफ से खाद्य सामग्री बांटते समय जरूर याद करती है अपने मर्द को। वे थे कि भीड में भी हो-हल्ला मचाकर, छीना-झपटी करके… अगे की कहानी यहां पढ़ें
