सुबह के सत्र में शब्द तलवार बन जाते थे और रात के अंधेरे में वही शब्द पुल। हिंदी साहित्य सम्मेलन की यही सबसे अनोखी पहचान रही है – जहां भाषा पर तीखी बहसें भी हुईं और उसी भाषा ने दिलों को जोड़े रखने का काम भी किया। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों का वह समय था, जब भारत अंग्रेजी हुकूमत के अधीन था और भाषा का सवाल केवल अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि पहचान और प्रतिरोध का भी था।
अदालतों में फारसी-उर्दू, शासन में अंग्रेजी और जनमानस में बोलियों का संसार – ऐसे में हिंदी को एक साझा भाषा बनाने का विचार अपने आप में एक चुनौती था। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में वर्ष 1910 में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ की स्थापना हुई। संस्था की पहली बैठक काशी में हुई। अगले साल संस्था की वार्षिक बैठक प्रयागराज में हुई और संगम नगरी को इसका स्थायी मुख्यालय बनाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ।
इसका उद्देश्य हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि का प्रचार-प्रसार करना, उसे शिक्षा, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित करना तथा देशभर के साहित्यकारों और विद्वानों को एक मंच पर लाना था। इस संस्था के विकास में मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, मोहनदास गांधी जैसे प्रमुख व्यक्तित्वों का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रीय एकता के माध्यम के रूप में स्थापित करने पर बल दिया।
हिंदी के स्वरूप को लेकर तीखी बहस
‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के शुरुआती अधिवेशनों में हिंदी के स्वरूप को लेकर भी चर्चा होती थी। एक बार हिंदी के स्वरूप को लेकर चल रही बहस इतनी तीखी हो गई कि लगा कि उग्र टकराव हो सकता है। एक पक्ष संस्कृतनिष्ठ हिंदी का पक्षधर था जिसमें अरबी-फारसी से परहेज की नीयत थी। दूसरा पक्ष आम बोलचाल में शामिल हो चुके अरबी-फारसी शब्दों से समृद्ध हिंदी की वकालत कर रहा था। उस समय हिंदी बनाम उर्दू, देवनागरी बनाम फारसी लिपि का विवाद अपने चरम पर था। आवाजें ऊंची हुईं, तर्कों की धार तेज हुई और अंततः सत्र को कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा।
उसी शाम, जब औपचारिकता का आवरण हट गया, तो वही विद्वान एक साथ बैठे। किसी ने चाय की चुस्की ली, किसी ने हल्की मुस्कान के साथ दिन की बहस को याद किया। धीरे-धीरे बातचीत का स्वर बदल गया – वहां तर्क नहीं, संवाद था; मतभेद नहीं, साझा चिंता थी। यह दृश्य अपने आप में गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक था, जहां अलग-अलग धाराएं मिलकर एक नई धारा बनाती हैं। दिन में वैचारिक टकराव और रात में मानवीय मेल – यही उस दौर के सम्मेलन की असली पहचान थी। मतभेद थे, लेकिन मनभेद नहीं।
उत्सव सरीखे हिंदी सम्मेलन
उस दौर में हिंदी सम्मेलन के अधिवेशन किसी उत्सव से कम नहीं होते थे। दूर-दराज से लोग अपने खर्चे पर आते, तंबुओं में ठहरते और भाषा के भविष्य पर घंटों बहस करते। मंच पर कभी देवनागरी बनाम फारसी लिपि की चर्चा होती, तो कभी हिंदी-उर्दू संबंधों पर तीखी नोकझोंक। इन बहसों के बावजूद सम्मेलन ने हिंदी को जनभाषा बनाने के विचार को आगे बढ़ाया – एक ऐसी भाषा, जो देश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ सके।
यही सम्मेलन की असली ताकत थी। यहां यह तय नहीं किया गया कि हिंदी कैसी होगी, बल्कि यह खोजा गया कि वह कैसी बन सकती है। यह संस्था केवल “हिंदी बनाम उर्दू” की बहस का मंच नहीं रही, बल्कि भाषा के स्वरूप को लेकर एक खुला संवाद भी बनी। यही कारण है कि बाद में विकसित हुई हिंदी में इन बहसों और संवादों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
‘प्रथमा’, ‘मध्यमा’, ‘उत्तमा’ जैसी परीक्षाओं की शुरुआत
अंग्रेजी शासन के दौर में इस संस्था की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी – जुनून बहुत, संसाधन कम। सरकारी सहयोग लगभग न के बराबर था, लेकिन जनसमर्थन अपार था। यहीं से ‘प्रथमा’, ‘मध्यमा’, ‘उत्तमा’ जैसी परीक्षाओं की शुरुआत हुई, जिसने हिंदी शिक्षा को एक ढांचा दिया। सम्मेलन ने प्रकाशनों की परंपरा विकसित की, जिससे हिंदी साहित्य को नई समृद्धि मिली।
उस समय प्रयागराज का यह परिसर किसी संसद से कम नहीं था – जहां शब्दों के जरिए राष्ट्र की परिकल्पना गढ़ी जा रही थी। सम्मेलन के अधिवेशनों में देश के प्रमुख साहित्यकार, शिक्षाविद और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेता भाग लेते थे और भाषा की भूमिका पर गंभीर विमर्श करते थे।
स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो मिला, लेकिन अंग्रेजी का प्रभाव बना रहा। धीरे-धीरे सम्मेलन का आंदोलनकारी स्वर कुछ सीमित होता गया और यह एक पारंपरिक साहित्यिक संस्था के रूप में सिमटने लगा। फिर भी, इसका ऐतिहासिक महत्व कम नहीं हुआ।
आज जब हम इसके परिसर में प्रवेश करते हैं, तो वहां इतिहास की गूंज सुनाई देती है। पुरानी इमारतें, पुस्तकालय की अलमारियां और दस्तावेज उस दौर की गवाही देते हैं, जब भाषा के लिए लोग निजी जीवन से ऊपर उठ जाते थे। वर्तमान समय में इसकी भूमिका नए सवालों के सामने है। डिजिटल युग में भाषा का संघर्ष बदल चुका है – अब यह केवल लिपि या शब्दों का नहीं, बल्कि तकनीक, बाजार और वैश्विक प्रभाव का भी है। ऐसे में सम्मेलन के सामने चुनौती है कि वह अपनी विरासत को नए समय के अनुरूप कैसे ढाले।
फिर भी, उस पुराने किस्से की चमक आज भी कायम है – सुबह की तीखी बहस और रात का आत्मीय संवाद। यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस दौर की मानसिकता का प्रतीक है, जब असहमति के बीच भी संवाद जीवित था। और शायद यही वह सबसे बड़ा सबक है – भाषा केवल विचारों का टकराव नहीं, बल्कि दिलों का संगम भी होती है। यही संगम प्रयागराज की पहचान है और यही हिंदी साहित्य सम्मेलन की भी।
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