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कविता: ‘स्वप्नों की कुटिया में झींगुर लगे आजकल आने-जाने’

राघवेंद्र शुक्ल की कविताएं

गीतः जब-जब रात लगी गहराने

गीत

जब-जब रात लगी गहराने।

ग्रह-नक्षत्र छिपे बादल में,
ज्योति रही ना दीपांचल में,
सूरज से जुगनू तक शामिल
रहे रात के छल-बल-दल में।

स्वप्नों की कुटिया में झींगुर लगे आजकल आने-जाने।

साए तक तो साथ नहीं हैं।
साथी से क्या हों आशाएं।
अंतर्मन तक बोल रहा है
‘लौट चलें’ वाली भाषाएं।

दुष्कर है, इस अंधकार में सही राह कैसे पहचानें?

गहरी रातों से दुविधा है,
पर इनसे कुछ काम सधा है।
इनकी तीखी भाषा में कुछ
पेंच नहीं है सब अभिधा है।

रातों की छलनी से छनकर खरे हो रहे अंदरखाने।

कठिन परीक्षा है इस रण में।
ताकत भरो और निज प्रण में।
रात न ठहरेगी, जाएगी,
सुबह लौटकर ही आएगी।

रुकी धरा पर नहीं सूर्य आता है कभी भास पहुंचाने।

कविता

अनिच्छित प्रश्न जीवन के
निरन्तर टालते रहना,
मेरी इच्छा-अनिच्छा के विरुध्द
सांसों का यातायात।

अँधेरे में सड़क पर टोहते चलना,
न जाने किस दिशा में
किसी की बात में आना, बने रहना
अनन्तर, भाग जाना, झेलकर संघात।

विविध कुरुक्षेत्र की रणभूमि में
शय्या बना, करना शयन
अपनी ही प्रतिज्ञा के करों से घात।

जग-तरु पर उगे, उगकर
हरे होकर-लहरकर वायु के संग, नृत्यकर
गिरना, ज्यों पीले पात।

उमड़ता सिंधु-सा जीवन,
उतरती-चढ़ती लहरों की अभीप्साएँ,
शून्य-सी नीरवता मृतप्राय,
कभी विध्वंसक झंझावात।।

और क्या होता जीवनजात?

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