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कविताः उठो, कि सुबह हो गई है

संजय स्वतंत्र की कविता

उठो कि सुबह हो गई

घुमड़ते घने बादलों से
लड़ कर जब तुम
थक जाओगी और
नई सुबह के इंतजार में
लोगी एक भरी-पूरी नींद,
तब मैं तुम्हारे सपनों में
उतर कर आऊंगा
सफेद खरगोश की तरह,
गुदगुदाऊंगा मैं तुम्हारी
मधुमालती-सी बांहों को
जो मेरे मन की
मुंडेर से लिपट गई है।
रिमझिम फुहार बन कर
सहलाऊंगा तुम्हारे ललाट को,
जहां हर दिन सूरज उगने पर
चलता है एक घमासान।
सुलझाऊंगा सूखी लटों को
जिन्हें तुम्हारी परेशानियों ने
बना लिया है घोंसला
और जो उलझ गए हैं
जीवन के महासंग्राम में।
बूंद-बूंद भरूंगा शीतलता
तुम्हारे अंतर्मन में,
जिसकी थाह मैं कभी
ले ही नहीं पाया
तुम्हारे साथ चलते हुए।
शब्दों से ही उकेरता रहा
जिंदगी का रोडमैप,
जिसमें तुम अकसर
करती रही संशोधन,
मेरी कविताओं को पढ़
मुस्कुराती रही हरदम,
सहेजती रही शब्दों को
जैसे हों पारिजात के पुष्प।
कॉफी के प्याले में
उफनते हुए दर्द को
समेटती रही चुस्कियों में,
उस दर्द को भी जिसे तुम
कभी कर लेती थी साझा।
हालांकि-
खुद में खुद से लड़ती रही
हमेशा योद्धा बन कर।
तुम्हारे लिए चांद से
मांगी थीं जो दुआएं,
वह अब दिख रही हैं
तुम्हारी बंद पलकों पर,
वह सुख भरी नींद का
लेती रहीं मीठा स्वाद
और-
मैं करता रहा इंतजार
काली रात गुजर जाने का।
तो सुनो मित्र-
बीत गई है दुख भरी रात,
मेरे अनुनय पर
चांद ने जो सुनाई थी
तुम्हें मीठी लोरियां,
चंद्र किरणों ने जो
झुलाया था तुम्हें झूला,
उन सबका समवेत स्वर है-
उठो न, देखो……..
धरती ने भी खोल ली आंखें,
फैलने लगी है
हर ओर हरियाली,
तुम्हारे बालों में अब
गुम होने लगी है
मटमैली उदास रात।
उठो कि सुबह हो गई है,
जीवन का नया संदेश
लेकर फिर चली आई
सुनहरे पंखों वाली चिड़िया,
कर रही है प्रार्थना,
उस अपराजिता के लिए
जो मीलों चलती रही अथक।
मेरी भी यही शुभकामना
कि-
मिल जाए तुम्हें
थोड़ी सी जमीन और
बाहें पसारे नीला आसमान।