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कविताः सदियों का सिलसिला है डूबने से पहले तुम्हारे माथे पर लाल बिंदिया बनकर सज जाना

संजय स्वतंत्र की कविता

चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है (फोटो सोर्सः freepik.com)

तुम्हारे माथे की बिंदिया हूं

मैं हर सुबह
पहाड़ के पीछे से
सूरज बन कर निकलता हूं
और हर शाम
डूबने से पहले
लाल बिंदिया बन
तुम्हारे ललाट पर
सज जाता हूं
क्योंकि-
सदियों से है यह सिलसिला।
तुम्हारी हर मुस्कान में
मैं ही झिलमिलाता हूं
चंचल किरणों के साथ।
क्योंकि यकीन है तुम्हें
इस सूरज पर
कि घने बादलों से
घिरा होने पर भी
निश्चय ही उगेगा
संग चलेगा गोधूलि तक,
माथे पर लाल बिंदिया बन
अनंत काल तक सजेगा,
चाहे कितना हो अंधकार,
सुबह का उजाला
लेकर ही आएगा
क्योंकि-
सदियों से है यह सिलसिला।
दोपहर का सूरज हूं मैं,
तुम्हारी देह को देता हूं
आवरण गरिमा का,
तुम्हारी लज्जा को
अनावृत्त होने से रोका है
तुम्हें तेजस्विनी बना कर।
तुम्हारे अखंड सौंदर्य पर
मैं ही अटल हूं,
विराजमान हूं तुम्हारे
पीले परिधान में।
मेरा हर स्पर्श है पावन,
जिसे महसूसती रही हो तुम,
क्योंकि-
सदियों से है यह सिलसिला।
तुम पीली साड़ी में
बहती हुई नदी हो,
तुम्हारे लाल आंचल में
डूबता हुआ सूरज हूं,
गोधूलि के साथ
तुम्हारी केशराशि के
बीचों-बीच लाल रेखा बन
कर उतर आता हूं
लिपट जाता हूं तुमसे।
मैं तुम से अलग नहीं हूं,
मैं उम्मीदों में भरा पुंज हूं,
कालरात्रि में भी
चलता हूं तुम्हारे साथ,
तुम्हारी धमनियों में
बहता हूं अनवरत
चंदन बन कर,
बिखेरता हूं खुशबू,
चमकता हूं ललाट पर
सिंदूर बन कर,
हर सुबह-हर शााम
क्योंकि –
सदियों से है यह सिलसिला।

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