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कविता: सपनों का गुलमोहर

पढ़ें डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता 'सपनों का गुलमोहर'

प्रतीकात्मक फोटो

सपनों का गुलमोहर

उम्र के साथ
खुरदरी हो गई हैं
मेरी वो पलकें
जहां तुम कभी टांक देते थे
दूधिया बिखेरता चांद।
अब मैं कहीं नहीं हूं,
फिर भी मेरी आंखों में
आज भी उतार देते हो
नीला-सा समंदर,
जिसकी लहरों पर
मन की नौका लेकर
निकल जाती हूं मैं
अनंत छोर तक।
ढूंढती हूं तुम्हें वहां
पर तुम कहीं दिखते नहीं।
जानती हूं-
देख रहे हो मुझे प्रतिपल,
तुम जहां कहीं भी हो।
फिर मैं पलकों की कोर पर
जला देती हूं एक दीप
और देखती रहती हूं
झिलमिलाते उन सपनों को
जिन्हें साकार करने में
खुद भी जुटे रहे तुम।
देखो न-
मेरी पलकों पर
उग आईहैं सीढ़ियां,
जब इससे गुजर कर
नील-गगन तक आओगे,
तुम सुनोगे शब्दों का नाद
और मेरे मन का मृदंग
जो करेंगे तुम्हारा अभिनंदन।
तुम पाओगे यहां सन्नाटा
जो तुम्हें बेहद पसंद है,
उसी से रचा है मैंने
राजनिवास तुम्हारे लिए।
बादलों को गूंथ कर
बनाया है नरम बिछौना
और ठंडी हवाओं से बुनी है
एक सफेद चादर भी।
तुम आना तो करना विश्राम,
मैं बैठंूगी तुम्हारे सिरहाने।
भद्रलोक के देवता आएंगे
ेतुम्हारी कविताओं का
आस्वादन करने के लिए
जिन्हें तुम सुनाते रहे
उन मनुष्यों को
जो नहीं समझते थे प्रेम
और समरसता का मर्म।
मैं खोलूंगी युगों का पिटारा
करना मुझसे प्रेम-संवाद
ठीक वैसे ही जैसे
तुम किया करते थे कभी
मेरी धमनियों में उतर कर।
जानती हूं मैं-
थक गए हो तुम
शब्दों को साधते हुए
जिनसे तुम हमेशा मुझे
उदासियों से उबारते रहे,
राहों से चुनते रहे कांटे,
बेवजह अमर बनाते रहे
उस नायिका को
जिसे एक दिन चले जाना था।
मैं अब कर रही हूं इंतजार
उस दिव्य पेय के साथ
जिसे पिला कर तुम्हें
कर देना चाहती हूं शाश्वत
ताकि शब्दों के ब्रह्मांड में
कभी भी न बिछड़ो,
चलते रहो तुम साथ
और मैं सजाती रहूं
सपनों का गुलमोहर।

– डॉ. सांत्वना श्रीकांत

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