ताज़ा खबर
 

कविता: कैसे जन्म दूं कविता?

पढ़ें डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता 'कैसे जन्म दूं कविता?'

Author February 11, 2019 12:36 AM
प्रतीकात्मक फोटो

कैसे जन्म दूं कविता?

तुम्हें कैसे जन्म दूं कविता,
पहले उस प्रसव पीड़ा से
मुझे गुजरने तो दो,
जिससे जन्मती है कविता।
कुम्हार की चाक पर
मिट्टी सा मुझे गढ़ने दो
फिर आग में झोंक कर
कुछ दिन पकने तो दो,
फिर रचूंगी कोई कविता।
ब्रह्मांड की परिक्रमा कर
मुझे आने दो अभी,
तारों और पृथ्वी का तालमेल
तो समझने दो।
प्रेमिकाओं का विरह जीने दो,
प्रेम में लालायित होने दो,
प्रेमी के प्रथम स्पर्श का
अहसास तो होने दो,
फिर रचूंगी कविता।
बच्चों को पहला कदम रखते हुए
मुझे निहारने दो,
आत्मा को मोक्ष प्राप्ति तक के
क्षण को महसूस करने दो,
अभी तो असफलता की
पगडंडियों पर सजगता से
चल रही हूं मैं,
जरा ठोकर खाकर
मुझे गिरने तो दो,
फिर रचूंगी कोई कविता।
सबकी मनमानियों से
लड़ लेने दो मुझे
थोड़ा रो लेने दो,
चाटुकारिता करके
सफल हो गए
औसत दर्जे के लोग,
अपने भाग्य पर मुझे
सुबक लेने दो।
एकाकी हो जाने पर
दम घुटने से पहले,
तकिए के नीचे से निकालूंगी
कई सफेद पर्चियां,
उन पर जन्म दूंगी तुम्हें
ठहरो जरा
इंतजार तो कर लेने दो।

ठहर जाना बादलों की तरह

मैं समंदर का
सारा नीला रंग
समेट कर
मल दूंगी
तुम्हारे माथे पर,
सूर्य की स्वर्णिम किरणों की
आभा दर्ज कर दूंगी
तुम्हारे चेहरे पर।
चांदनी रात की झिलमिलाहट,
तुम्हारी आंखों में झांकेगी
मेरा प्रेम बन कर
और तुम
ठहर जाना मुझमें,
बादलों की तरह
जैसे ठहरता है अंतरिक्ष में
बिना आकर्षण के कोई।

-डॉ. सांत्वना श्रीकांत

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App