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कविताः मैं वहीं बैठा मिलूंगा उम्मीदों की नाव पर

संजय स्वतंत्र की कविता

कविता

सब ठीक है न मित्र? 

सब ठीक?
यह पूछते हुए तुम
जब मेरे मन को
सहला देती हो हौले से,
तो लगता है यही कि
इन दो शब्दों में
कितनी शुभेच्छा है,
कुछ न कह कर भी
बहुत कुछ कह देने की।
समझ जाता हूं
तुम्हारी चिंता और
तनिक परवाह भी।
तुम्हारे इन दो शब्दों का
देने के लिए जवाब,
अक्सर उतर आता हूं
तुम्हारी आंखों की स्याही में,
चल पड़ता हूं लेकर
अपने मन की नाव।
यहां मंथर लहरें
आश्वस्त करती हैं मुझे
कि-
तुम्हारे आत्मविश्वास का
नीला चट्टान टूटा नहीं है।
यहां मन की नौका
बांध ली है मैंने
हमेशा के लिए।
तुमसे पूछ रहा हूं
तुम्हारा ही सवाल-
सब ठीक है न?
जवाब में मिली ‘स्माइली’
बयां कर देती है
तुम्हारा मासूम झूठ।
पलट कर फिर पूछता हूं
सब ठीक कहां है मित्र?
तुम्हारे होंठों पर तो
धंसी है फीकी-सी हंसी।
चलो आज यहां जमी
उदासी की इन परतों को
कर लूं ताउम्र कैद
अपनी मुट्ठी में।
चलो मैं रच दूं
तुम्हारे चेहरे पर
कोमल-चंचल मुस्कान,
जिस पर हमेशा
यही लिखा हो-
सब ठीक है।
चलो बांध दूं
उठती उन लहरों को
जिसे अकसर संभालने की
जद्दोदहद में तुम
निकल जाती हो
खुद से बहुत दूर।
यह देखने के लिए
कि-
डूब न जाए कहीं
उम्मीदों का ‘टाइटेनिक’।
निराशा की उन सफेद चट्टानों से
तुम न टकराओ कभी,
इसलिए उन पर
लिख देना चाहता हूं-
संभल कर बढ़ना मित्र,
आगे मेरी नाव है।
सुनो न,
मौन की भी होती है
एक गूढ़ परिभाषा,
जिसे बंधे-बंधाए
दो शब्दों में खोल सकती हो,
मैं इसे समझ जाऊंगा और
ओढ़ कर तुम्हारी उदासियां
निकल जाउंगा दूर,
फिर एक दिन मिलूंगा
उसी शिखर पर,
जहां पहुंचना है तुम्हें,
वहां सहेज लेना
अपने सभी सपने,
साकार कर लेना सभी को,
आकार मुझे भी दे देना।
मैं वहीं बैठा मिलूंगा,
अपनी उम्मीदों की नाव पर।

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