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कविताः भीतर से असफल होता है आदमी जब नहीं होते पीठ थपथपाने वाले हाथ

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता।

दरअसल पिता को ही/ ढूंढ़ता रहता है वह/ जब छुड़ा कर/ चले जाते हैं हाथ.

न होना पिता का

पिता का न होना
एकाकी होना है,
उन अंधे मोड़ पर
चलने की तरह है,
जिन्हें उजाले में
इशारे से दिखाया था कभी।
दर्द की सारी गठरियां
जो वो ढो रहे थे बरसों
यकायक दिख जाती हैं,
जब नहीं होते पिता।
तब न वक्त ठहरता है
और न ही यह जिंदगी।
फिर शुरुआत होती है
हर किसी में थोड़ा सा
अपना पिता ढूंढ़ लेने की।
सारी सफलताएं पाकर भी
असफल होता है
भीतर से आदमी,
जब पीठ थपथपाने वाले
नहीं होते वो हाथ।
दरअसल पिता को ही
ढूंढ़ता रहता है वह,
जब छुड़ा कर
चले जाते हैं हाथ।

मेरे ईश

अगर बहाना होता मेरे पास
तुमसे अपनी अर्जियां
मनवाने का तो
क्यों मैं गिड़गिड़ाती,
लगाती क्यों गुहार तुमसे,
क्यों भेंट करती तुम्हें
अपने शब्दों के फूल।
अगर बहाना होता मेरे पास,
क्यों टेह लगाती
तुम्हारी भंवों के बीच।
करती मौन प्रार्थना
क्यों-
मौन ही
कुछ भी कर
समझा देना चाहती अपनी पीड़ा।
क्यों तुम्हें स्वार्थी
संबोधित करती।
तुम सुनते नहीं,
इसलिए शिकायत है
तुमसे मेरे ईश।

डॉ सांत्वना श्रीकांत

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