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कविताः मेरे राजहंस हो तुम

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता।

चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

डॉ सांत्वना श्रीकांत

मेरी झील सी आंखों में
उतर आते हो तुम,
चुगते हो शब्दों के मोती,
रचते हो कोई प्रेम-गीत,
तुम मेरे राजहंस हो।
मेरी संगमरमरी बांहों में
अकसर उतर आते हो
हरी-भरी वादियों की तरह,
खुद में भर लेते हो
मेरा असीमित आवेग,
मेरे अनन्य विश्वास का
तुम नीला चट्टान हो।
मेरे अजन्मे शब्दों के
नवांकुर हो तुम,
फूटते हो मेरे गर्भ में,
मैं निहारती रहती हूं
तुम्हारे शिशु रूप को
उस असीम गहराई में,
जहां तुम सोते हो
सतरंगी सपनों के साथ।
मैं चातक की तरह
कर रही हूं तुम्हारा इंतजार,
स्वाति नक्षत्र बन कर
चले आना इस बार।
बारिश की पहली बूंद के साथ
पी लूंगी मैं तुम्हें
हमेशा के लिए,
जी लूंगी सदियां तुम्हारे साथ,
क्योंकि-
तुम ही हो मेरे राजहंस।
मैं तुम्हें देख कर
बुझा लूंगी कोई आग
अपने धधकते हृदय की।
मैं तुम्हारी आंखों में
ढूंढ लूंगी खुद को,
बिखेर दूंगी जग में मिठास।
समय के गर्भ में पलते
अनंत काल से सोए
हुए पावन-प्रणय को
इस बार दूंगी मैं जन्म
अपने ही शब्दों से,
अपने भावों से
सहलाऊंगी आकाश-कुसुम,
जिसे खिलना होगा मेरे लिए।
बोलो न राजहंस,
क्या ढूंढते हो तुम
सजल आंखों से मुझमें?
तुम्हारे अश्रु-बिंदुओं को
लोक लूंगी मैं
अपनी हथेलियों में,
ले जाऊंगी तुम्हें
बहुत दूर-
सभी सरहदों के पार,
चलोगे न मेरे साथ?
तुम अपने कागजों पर
उतार लेना मुझे,
मैं नदी बन कर बहूंगी,
मैं समाहित हो जाऊंगी तुम में।
मेरी सूनी आंखों में
भर देना कोई सपना,
जब तुम जन्म लेना,
मैं कर रही हूं
तुम्हारा इंतजार
ओ…. मेरे राजहंस।

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