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कविताः आखिर हम कब तक अबला कहलाएंगे..

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविताएं

कविताः मासूम की आंखों में है दामिनी

-डॉ. सांत्वना श्रीकांत

मासूम की आंखों में है दामिनी

याद तो होगी यह तारीख,
नहीं तो छोड़िए,
तारीख तो सब को याद है।
स्याह कांच की बेबसी में
दफन होती मेरी चीख
और वह नीम सन्नाटा।
छह बाजुओं के चंगुल में फंसी
दामिनी की जान
याद है न आपको?
मैं मरी नहीं, जिंदा हूं,
हर एक नारी के सीने में।
अगर आप इसे जीना कहते हैं
तो धिक्कार है ऐसे जीने में।
बचपन से यह पाठ दोहराना
जब कभी हुआ बाहर जाना,
कोई देखे, भले छेड़े या छुए
बस घुटना और
घुट-घुट कर मर जाना।
ये कैंडल मार्च और अनशन,
कुछ काम न आएंगे
बस कोई बता दे,
आखिर हम कब तक
अबला कहलाएंगे।
निर्भया कहो या दामिनी
या कोई भी नाम दो मुझको।
जो मेरी देह और रूह के थे भक्षक,
अंजाम कोई उनको दे दो।
नारी की कोख का
कुछ तो मान करो।
वह एक हादसा था,
सब भूल जाएंगे एक दिन।
मगर कोई बता दे
कि-
और कितनी निर्भया को
शिकार बनाओगे?

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