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कविताः मैं देख सकती हूं तुम्हें

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता

मैं देख सकती हूं तुम्हें

मर रही थी मुझमें
कविता धीरे-धीरे,
जैसे दरक गई थी
मासूमियत तुम्हारी,
तभी-
जीवन की भूलभुलैया में
भटके हुए हंस की तरह
तुमने शब्द रूपी मोती
बिखेर दिए मेरी कविताओं में,
वहां उदासी की जगह
खिलखिला उठी जिंदगी।
अपने निश्छल शब्दों से
तुम चले आए मेरे हृदय की
असंख्य धमनियों तक,
मेरे लहू में उतर गए
श्वेत कणिकाओं की तरह।
मैं बिखरती हूं जब,
तो बन कर रफूगर तुम
जोड़ने निकल पड़ते हो,
मेरी नसों में दौड़ते हो
सफेद घोड़े पर होकर सवार,
मेरी रगों में फूंकते हो
युद्ध और प्रेम का संगीत।
मेरे भीतर चल रहे घमासान में
भी हो जाते हो युद्धरत,
मैं देख सकती हूं तुम्हें,
दवा और दुआ लेकर
तुम खड़े हो मेरे ही पीछे।
कभी-कभी तो तुम
मेरे कुम्हलाए चेहरे पर
आकर चांद बन जाते हो,
मैं देख सकती हूं तुम्हें,
मेरी रूह का तो लिबास
बन ही चुके हो तुम,
सुनो न-
मैं जीना चाहती हूं
अपनी कविताओं में
ताकि देख पाऊं तुमको
प्रेमी-प्रेमिकाओं के संवाद में।
गुण-अवगुण के बीच
ढूंढ लूं तुम्हें रश्मियों में,
सच कहूं तो मैं
जी रही हूं अपने अंदर कविता
ताकि बता सकूं सभी को
कि आखिर क्या है
निश्छल प्रेम की परिभाषा,
गिलहरियों के उकड़ू
बैठने की मासूमियत,
हरी दूब पर ओस की पवित्रता
और झरने के शोर का इश्किया।
हां तुम–
श्वेत कणिकाओं की तरह
डिफेंस सिस्टम हो,
तुम मेरी रगों में
बहते हो अविरल
और हमेशा बहते रहना…..।

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