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कविताः स्मृतियों की जल समाधि पर सिंडेरिया का पूछना – ‘लिखो न एक कविता मेरे लिए’

तुमने कहा था/ मुझे लिखनी चाहिए कविता/ लिखता था कभी/ अब साथ नहीं देती कलम।
लिखो न एक कविता मेरे लिए

1. लिखो न एक कविता मेरे लिए

तुमने कहा था-
मुझे लिखनी चाहिए कविता।
लिखता था कभी,
अब साथ नहीं देती कलम।
पहले कागज पर उतर
आता था वसंत और
सुगंध बिखेरने चली
आती थी डहेलिया।
अब कंप्यूटर की किट-पिट
में गुम हो गई है खिलखिलाहट,
न रही वैसी हंसी और
न लगते हैं ठहाके।
अब कविता लिखते हुए
कांप जाते हैं मेरे हाथ।
कागज पर उतर जाती है
एक खामोश नदी,
जहां मेरी स्मृतियों की
जल समाधि पर
कभी-कभी आ जाती है
कोई प्यारी सी सिंडेरिया
और झकझोरते हुए पूछती है-
कब जागोगे तुम?
लिखो न एक कविता मेरे लिए।

* (सिंडेरिया की याद में, जो बरसों पहले पंडारा रोड स्थित अपने फ्लैट से निकलते समय मुझे इंडिया गेट के लॉन में मिल गई थी और फिर फिर न जाने कहां गुम हुई। अब बरसों बाद भी उसे उन सभी दोस्तों के दिलों में ढूंढता हूं, जो मुझे प्यार करते हैं या रत्ती भर सम्मान देते हैं)

 

2.तुम्हारी हथेलियों में गुलाब

मैं नहीं हूं सपनों का सौदागर,
मेरे पास है केवल
स्वप्न बीज,
जिसे तुम्हारी कोमल हथेलियों पर
रख देना चाहता हूं
ताकि तुम खिला सको
अपनी उम्मीदों का गुलाब।
हां-
मैं स्वप्न बीज हूं।
तुम
अपने मन के आंगन में
सींच दो मुझे,
तुम्हारे सपनों का गुलाब
बन कर खिलूंगा मैं।
तपती दुपहरी में जब
मुरझाने लगूं,
तब तुम अपने होठों का
मृदुल स्पर्श देना
और
सांझ ढलने पर
मेरी पंखुड़ियां
जब बिखरने लगे,
तो अपनी हथेलियों में
समेट लेना मुझे
हमेशा के लिए।

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