hindi poem khud ko padhna kabhie - कविताः शायद खुद में तुमको लिख दिया है अबकी बार - Jansatta
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कविताः शायद खुद में तुमको लिख दिया है अबकी बार

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता

कविताः कोई भाव नहीं मिला मुझे

खुद को पढ़ना कभी

कोई भाव नहीं मिला मुझे,
कोई कविता नहीं मिली,
तुम भी नहीं मिले,
एकांत मिला
घने जंगलों में।
झरने के शोर में,
नदी के आखिरी छोर पर,
दूर तक फैले पठारों में
तुम खोए थे कहीं
अपनी ही खोज में
या फिर मुझे ही ढूंढ़ रहे थे?
तुम्हें लिखना चाहती थी
पहाड़ी से बीच जाते रास्ते में,
ताड़ की पत्तियों पर और
रश्मियों पर
जो झांक रही थीं अरण्य में।
ठूंठे पेड़ पर,
बंजर पर
तुम्हें उगा देना चाहती हूं,
हर जगह सिर्फ तुम्हें
ही उकेर देना चाहती हूं।
मगर मैं नहीं लिख पाई,
शायद खुद में
तुमको लिख दिया है
अबकी बार।
अवाच हो तुम स्वयं को
पढ़ना कभी
मेरे अधपके ख्वाबों को,
मेरी प्रार्थना को,
मेरे ललाट के तेज को।
आंखें बंद कर
बुदबुदाती हूं जब
यह सोच कर कि
तुम्हारा न होना ही
सबसे बड़ी चिंता है।
अगर यह जान लो,
फिर समझ पाओगे
खुद को तुम।

डॉ. सांत्वना श्रीकांत

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