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कविताः ‘मैं खिलना चाहता हूं नीलकमल बन कर तुम्हारे चेहरे पर’

संजय स्वतंत्र की कविता

कनेर का फूल (फोटोः freepik.com)

कनेर का फूल हूं मैं

जब-जब देखता हूं
तुम्हारी फीकी-सी मुस्कान,
मैं उतर आता हूं
तुम्हारे हृदय में
कनेर के फूल की तरह,
इनसे भर देना चाहता हूं
तुम में गुलाबी भाव।
तुम्हारी हथेलियों पर
उलझी लकीरों के साथ
चलना चाहता हूं,
लिखना चाहता हूं
नया अध्याय जीवन का।
उदासियों की झील में
जब डूबी रहती हो तुम,
उतर आता हूं मैं भी
शहद की तरह
कुछ मीठा-कुछ गाढ़ा,
जिससे भर सकूं
अखंड और पावन मिठास
तुम्हारी हर अभिव्यक्ति में।
ये जो शब्द लिपटे हैं न
तुम्हारे इन होठों पर,
ये मैं ही हूं
जिसे सहेज रखा है
सदियों से तुमने
सफेद मोतियों की तरह।
नीले चादरों वाले बिस्तर पर
यूं ही लेटे हुए
अपनी छातियों के नीचे
तकिए को दबाए
कई-कई बार लिखा तुमने
हरी स्याही वाले पेन से,
तुम कागजों पर
मुझे उतारती रही।
जब घुमड़ते हैं बादल
तुम्हारी स्वप्निल आंखों में,
मैं वहीं आता हूं
स्नेहिल भावों के साथ
बरसता हूं बूंद-बंद।
अपनी पलकों से इन्हें
बह जाने से पहले
तुम लिख लेती हो मुझे
असंख्य शब्दों में।
सुनो मित्र-
अब उलझी हुई लकीरों पर
रेल की पटरियां बन जाऊंगा,
जिन पर आएगी
उम्मीदों की ट्रेन
और ले जाएगी तुम्हें
एक नए सफर पर।
तुम्हारे मन के आकाश में
चमकता ध्रुवतारा हूं मैं,
इसे देख कर तुम
तय कर सकती हो
अपने युद्ध की दिशा,
संधान कर सकती हो लक्ष्य।
मैं खिलना चाहता हूं
नीलकमल बन कर
तुम्हारे चेहरे पर।
मेघपुष्प बन जाना चाहता हूं
लक्ष्य को भेदती
तुम्हारी आंखों में,
शब्द बन कर
बह जाना चाहता हूं ताकि
तुम कर सको नव सृजन
इस समाज के लिए,
रच सको नवजीवन
खुद के लिए।

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