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कविताः ‘नाउम्मीदी की गठरी को तुम मेरे पास ही छोड़ कर चली जाना’

संजय स्वतंत्र की कविता

एक पोटली मेरा प्यार/ बांध कर ले जाना/ जब तुम लौटना/ किसी ढलती सांझ।

जब तुम लौटोगी

एक पोटली मेरा प्यार
बांध कर ले जाना
जब तुम लौटना
किसी ढलती सांझ।
मेरी आंखों में उग आए
शहतूत के पेड़ों से
चुन कर ले जाना
खट्टी-मीठी कोई सौगात,
तब तुम लौटना
स्मृतियों के नीलकमल के साथ।
नाउम्मीदी की गठरी को
तुम मेरे पास ही
छोड़ कर चली जाना,
तब तुम लौटना
बांध कर उम्मीदों के गुब्बारे,
उन्हें उड़ा देना आकाश।
अंकित कर देना चुंबन
मेरी प्रेम कविताओं पर
ले जाना नेह की बरसात,
तब तुम लौटना
सपनों के इंद्रधनुष के साथ।
मिलना जब आखिरी बार
हृदय से लगा लेना,
छोड़ कर चली जाना
अपना हृदय मेरे पास,
तब तुम लौटना।
सफेद कागज की सलवटों पर
बिखरे हुए मेरे शब्दों को
जरा तह लगा कर जाना
तब तुम लौटना
अपनी खुशियों के साथ।
संभाल कर रख लेना
अपने चमकीले पंखों को,
तितली बन उड़ जाना,
उड़ना नित नई उड़ान
काले बादलों के उस पार।
मन-किसलय में रखा है
मैंने प्रेम-पराग,
ले जाना अपने संग,
भर देना प्रकृति में
कुछ अपने नए रंग,
जग में फैला देना मिठास।
जब तुम लौटना,
मेरी हथेलियों पर
धर जाना कोई पौधा
अपने संकल्प का,
उसके वटवृक्ष बनने का
करना थोड़ा इंतजार,
तब तुम लौटना
नदी किनारे अपने गांव।
सुनो न-
एक दीप जला कर जाना
ताकि यूं चलती रहे
जीवन की ये नाव,
मैं पहुंच जाऊं कभी
पाहुन बन कर
तुम्हारे मन की पर्णकुटी में,
तब तुम लौटना
सिर पर धरे ताज।

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