Hindi poem dark in light - कविताएं: रोशनी में अंधेरा - Jansatta
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कविताएं: रोशनी में अंधेरा

मिथिलेश श्रीवास्तव की कविता

Author August 5, 2018 5:14 AM
इस रोशनी में इतना अंधेरा क्यों है

मिथिलेश श्रीवास्तव

इस रोशनी में इतना अंधेरा क्यों है
एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हुए
चौकठ से टकरा जाता हूं
लोकतंत्र है पर दम घुटता क्यों है
दोस्ती है पर खंजर क्यों दिखते हैं
गोदाम भरे पड़े हैं अनाज से पर इतनी भूख क्यों है
शरीर मजबूत है पर आत्मा इतनी दुर्बल क्यों है
घर है पर घर के लुट जाने का भय क्यों है
रोशनी है पर इस रोशनी में इतना अंधेरा क्यों है
तीन दिन हो गए मुझे गुस्से से लाल हुए
तीन दिन हो गए मुझे गुस्से से लाल हुए
गुस्सा करना और गुस्से में रहना काफी पीड़ादायक होता है
मस्तिष्क की शिराएं लचीलेपन की अपनी सीमाएं पार कर चुकी हैं
खून का सामान्य रक्तचाप विचलन पर है
सर को माथे में दबा गुस्से के तनाव को काबू में करने की
कोशिश करता हूं लेकिन बेअसर
चारों तरफ गुस्से से लाल हुए लोग नजर आने लगे हैं
कोई बात है कि मेरी तरह ही लोग हाथों में सिर को पकड़े
किसी बात को बर्दास्त करने की कोशिश में हैं
निर्भय लोग घूम रहे हैं लेकिन सिर में खून गरम है
खुलेआम अपने सिर को दबाए कोई वाजिब दर्द छिपा रहे हैं
अभी अभी किसी एक ने कहा है कि वह दुनिया को सुंदर
बनाने आया है
दुनिया वह जितना सुंदर बनाता जा रहा है
मेरे दिमाग की शिराएं उतनी ही तनती जा रही हैं
लेकिन जीते रहे
मरो जैसे मरता है एक साधारण आदमी
मारकीन के टुकड़े में लिपटा हुआ
बिना किसी मुनादी और नगाड़े-बाजे के
लेकिन लावारिस मत मरो
मरो कि चार लोग चार दिन उदास रहें तुम्हारे बिना
मरो लेकिन मरने के बाद रोए नहीं कोई विधवा
कोई बच्चा अनाथ न हो जाए
मरो कि किसी के माथे पर बल न पड़े
मरो जैसे पानी में मरती हैं मछलियां
मरो जैसे मरती हैं कतारों में चीटियां
अमर होने के लिए मत मरो
उस कंधे पर मरो जिस पर भरोसा है तुम्हे
उस गोदी में सर रखकर मरो
जिसके लिए तड़पते रहे जीवन भर
नींद में मत मरना
सपना देखते समय मत मरना
इच्छा तब करे मर जाना
डर के मत मरना
रोज-रोज मत मरना चोरी करके मत मरना
उधार लेके मत मरना
जीने की इच्छा खत्म हो जाए
तो मत मरना
निराशा में मत मरना
असफलता में मरना मत
मरने की कोशिश हमने बार-बार किया
लेकिन हम जीते रहे
पिता मरे लेकिन हम जीते रहे
घर से दूर हुए लेकिन हम जीते रहे
धोखा खाए लेकिन जीते रहे
अपमान हर दिन सहे थोड़ी देर आहत रहे
लेकिन जीते रहे

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