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कविताः ‘स्त्रियों के होठों पर नहीं, उसकी पलकों के नीचे होता है प्रेम’

पढ़ें सांत्वना श्रीकांत की कविता

चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

सुनो, मैं लिख रही हूं

डॉ. सांत्वना श्रीकांत

क्या लिखूं अब?
वह पेन लाल स्याही की
देखो न सूख गई है,
जिसमें डुबो देती थी
कभी अपना हाल-ए-दिल।
सुनो-
वह कलम नीली स्याही
की भी सूख गई है,
जिससे कागजों पर
उतार लेती थी मैं
अपने लिए नीली नदी
जिसके किनारे उड़ाती थी
रंग-बिरंगी तितलियां,
बैठ कर वहीं लिखती थी
रिश्तों को संजोती कविताएं
और फिर बहा देती थी
कागज की नाव बना कर।
मैं फिर से कुछ
लिखना चाहती हूं,
ढूंढ रही हूं वो पेन
हरी स्याही वाली
जिससे उतार सकूं प्रकृति,
जहां मिले हम-तुम
आदम-हव्वा की तरह
रचें सहृदय मानवों की
अब अलग दुनिया,
जहां स्त्रियां हों सुरक्षित,
बच्चियों से न हो बलात्कार।
उस नए समाज में हो
सद्भाव और समरसता
मनुष्य फिर से रचे
मनुष्येतर का इतिहास।
मैं लिखना चाहती हूं
स्त्री-पुरुष संबंधों की
एक नई व्याख्या,
जिसमें रोटी जितना ही
जरूरी हो प्रेम,
प्रेमिका की आंखों की
मौन परिभाषा को भी
देना चाहती हूं विस्तार।
सुनो वो कलम
गुलाबी रंग वाली
मिल गई है मुझे,
जिसे मेरी मेज पर छोड़ कर
चले गए थे कभी तुम,
वह सूखी नहीं है
यानी बचा है प्रेम
कहीं किसी कोने में।

2.
मैं लिख रही हूं
एक नई कविता फिर से
उन युवाओं के लिए
जो देह में ढूंढते हैं प्रेम,
बताना चाहती हूं उन्हें
कि-
स्त्रियों के होठों पर नहीं
उसकी पलकों के नीचे
होता है प्रेम,
उनके वक्षस्थलों में नहीं
हृदय में होता है प्रेम,
समर्पित करतीं उसे
जो चुपके से
उम्मीदों का दीप
जला कर चला जाता है,
उस लौ में होता है प्रेम।
मैं लिख रही हूं कविता
उन स्त्रियों के लिए
जो पराधीन नहीं होतीं
किसी के प्रेम में।
उन्मुक्त रहती हैं बंधनों से,
वर्जनाओं को तोड़ कर
रचती हैं प्रेम का नया पाठ।
मैं लिख रही हूं
उन स्त्रियों के लिए
जो दुर्गम पथ पर चलते
हुए नहीं थकतीं कभी,
भूलतीं नहीं अपना लक्ष्य।
जो जागती हैं रात भर
दुनिया में मर रहे प्रेम को
बचाने के लिए,
सम्मान और गरिमा के लिए
लड़ती हैं उन पुरुषों से
जो स्त्रियों को देते हैं दंश।
उन स्त्रियों के लिए
लिख रही हूं कविता
यह सोच कर कि इसे
एक दिन तुम पढ़ोगे
कभी काव्य संग्रह में
या किसी अखबार में
या फिर ऑनलाइन ही,
तब तुम मुझे ढूंढ लोगे
जो अनथक चलती रही
लड़ती रही, लिखती रही
उस जल-जंगल के लिए
जिसे तुम बचाना चाहते हो
आने वाली पीढ़ी के लिए।
उस पहाड़ के लिए
मैं लिखती रही
जिसके शिखर पर
तुमने मिलने का
वादा किया था कभी।
हां मैं लिख रही हूं,
जब तक नहीं मिलोगे
मैं लिखती रहूंगी,
सुन रहे हो न तुम!

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