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वानर विकासः जो अड़े रहे शाखों पर वो, वानर थे, सदियों तक वानर बने रहे

नीरज द्विवेदी की कविता

वानर थे, सदियों तक वानर ही बने रहे

वानर विकास

जब, वानर से मानव बनने की
शाश्वत विकास प्रक्रिया चल रही थी…
तब, कुछ वानर,
अपनी पहचान बचाने को लेकर लड़े रहे..
जो जिद्दी थे, कट्टर थे,
वो पेड़ो पर ही चढ़े रहे..
जो भावुक थे, जड़ थे,
वो मानव बनने से डरे रहे..

पर,
जो प्रेम में थे, जो परिवर्तनशील थे,
जो कूदना नहीं चलना चाहते थे,
जो उतरना चाहते थे शाखों से नीचे..
और जाना चाहते थे आसमानों से ऊपर
वो बढ़े,
वो आगे बढ़े, और आगे चल मानव बने..

जो,
अड़े रहे बातों पर
और डटे रहे शाखों पर..
वो,
मानव बनने से डरे रहे
वानर थे, सदियों तक वानर ही बने रहे !!

(५)

पिछले दिनों मै चुप रहा था,
और सबको लगा,
मै ‘चुक’ रहा था….

मै, चुप रहा..

चलती-फिरती मृत आकृतियों,
और, बोझिल घटनाओं के बीच भी..
मै, चुप रहा ।

ठंडी पड़ चुकी कविताओं,
और, जड़ हो चुकी संवेदनाओं के बीच भी…
मै, चुप रहा ।

राजा की निर्लज्ज अट्ठाहस,
और, दरबारी तालियों की गड़गडाहट के बीच भी…
मै, चुप रहा ।

दरअसल,
जब जब मै चुप रहा था,
नमक जैसा, तुममे घुल रहा था..
और सबको लगा..

मै ‘चुक’ रहा था !!

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