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कविताः चांद आकाश का सबसे सभ्य किंतु भयभीत पुरुष है

राघवेंद्र शुक्ल की कविता

पितृसत्ता

आकाश होता है,
धरती होती है..
धरती पर बारिश होती है..
आकाश पर धरती कुछ नहीं बरसाती।

बादल गरजता है,
बिजली चमकती है
धरती सहम जाती है।
मिलते हैं धरती आकाश
क्षितिज बनता है।
आसमान में रहते हैं केवल देवता,
धरती ढोती है शेष असंख्य सजीवों का भार
पालती-पोसती है उन्हें मां की तरह।

दिन भर आग बरसाता है आकाश का भाई
धरती जलती है।
पृथ्वी के जले पर मरहम लगाने
कभी-कभी रात में आती है चांदनी।
ब्रह्माण्ड की पितृसत्तात्मक सभ्यता में
चांद आकाश का सबसे सभ्य किंतु भयभीत पुरुष है।