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कविताः ‘मैं उजाला बन कर बिखरता रहूंगा, शुभकामनाओं के साथ बार-बार’

तुम्हारी पलकों के नीचे/ जहां रोज बैठ कर/ संवाद करता हूं/ वहां भर उठी है/ एक खारी नदी

संजय स्वतंत्र की कविताएं

1. तुम्हारी पलकों के नीचे

यूं ही तुम
हंसते हुए जब
मुंह फेर लेती हो मुझसे,
मैं समझ जाता हूं
कि-
तुम्हारी पलकों के नीचे
जहां रोज बैठ कर
संवाद करता हूं,
वहां भर उठी है
एक खारी नदी
तुम्हारी सारी पीड़ा और
आशंकाएं लेकर।
इन्हीं पलकों के नीचे
उस टेबल के सामने
तुम्हारे साथ अक्सर
कॉफी पीते हुए
अखंड वातार्लाप में
ढूंढता रहा हूं मैं
अपनी जिंदगी की लय।
संवारता रहा हूं
तुम्हारे सपनों को भी,
जिन्हें बहा कर
ले जाना चाहती है
यह खारी नदी,
जिसे तुम छुपाए
फिरती हो मुझसे।
जब-जब डूबती हो तुम
इसके सैलाब में,
गुम हो जाती है
मेरी वह टेबल,
जहां पीता रहा हूं मैं
समय का गरल।
डूब जाते हैं मेरे
इंद्रधनुषी स्वप्न भी,
जिन्हें बुनता रहा हूं
रोज डूबते सूरज को
अलविदा कहते हुए।
लेकिन सुनो मित्र,
इन पलकों के नीचे
बहती खारी नदी को
सोख लेना चाहता हूं
पी लेना चाहता हूं मैं
सभी विष-
पीड़ा और अवसाद के।
बन जाना चाहता हूं नीलकंठ
ताकि पार कर सको
इस कालखंड को भी,
जो शाश्वत नहीं है।
यहां से आगे बहुत दूर
जाना हैं तुम्हें मुस्कुराते हुए
इन्हीं पलकों में समेटे
अनगिनत सपने लेकर।
सुन रही हो न तुम?
तुम्हारी इन्हीं पलकों के नीचे
उगेंगे लाल गुलमोहर,
जिनकी छांव में
बैठी तुम भरी दोपहरी
याद करोगी जब मुझे,
जहां भी रहूंगा मैं
चार्ली की तरह
छड़ी से अपनी टोपी को
गोल-गोल घुमाते हुए
चल पड़ूंगा उस राह,
जो तुम्हारी गुलाबी पलकों
तक चली जाती है।
जहां कच्ची-पक्की नींदों में
या सुबह की उम्मीदों भरी
लाली में तुम
कर रही होगी इंतजार
नदी के किनारे
डाकबंगले की लॉन में,
हमारी उसी टेबल पर
मेरी पसंद की कॉफी
या फिर जैसमिन टी बनाते हुए,
जिसकी एक घूंट में,
सदियों के फासले को
पार कर जाऊंगा
चंद लम्हों में।
और-
अपनी पलकों के
झपकने से पहले,
बाजी बेशक हार जाऊं
जीवन की, मगर
जीत लूंगा तुम्हारी मुस्कान।

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2. शुभकामनाओं के साथ

साल भर की उम्मीदों का
सफर यों पूरा हुआ
तुमसे मिल कर।
एक-एक पग आगे बढ़ती हुई
विश्वास के बीज रोप कर
उगाने चली हो तुम
अपने संकल्प का वटवृक्ष।
यह नन्हा पौधा होगा जब बड़ा,
खिलेंगे इस पर तुम्हारे
स्नेह के श्वेत पुष्प
भर देंगे ये तुम्हारी आंखों में
खुशबू नवजीवन के,
भर देंगे नई चमक भी,
उनमें लहराएगा
तुम्हारी उम्मीदों का
नीला समंदर।
इसके क्षितिज से रोज उगते हुए सूरज
को सजा लेना अपने माथे पर
हमेशा के लिए,
मैं उजाला बन कर
बिखरता रहूंगा
शुभकामनाओं के साथ
बार-बार।

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