ताज़ा खबर
 

कविताः ‘सुनो मित्र! तुम्हारे विजय रथ का सारथी हूं मैं’

संजय स्वतंत्र की कविता

संजय स्वतंत्र की कविता

रणभूमि में तुम्हारे साथ

रणभूमि में लक्ष्यों का
संधान करते हुए
तुमने पूछा था एक दिन कि,
शस्त्रों को छोड़ कर
क्यों चुन लेते हैं शास्त्र,
अंजुरी में पुष्प भर कर
क्यों चल देते हैं निहत्थे।
अपने रक्तिम चेहरे से
लटों को हटाते हुए
तुमने ही पूछा था-
इतनी देर कहां थे आप?
सुनो मित्र,
तुम्हारे विजय रथ का
सारथी हूं मैं,
कहां जा सकता हूं
छोड़ कर तुम्हें।
अभी इस रणभूमि पर
उड़ती सफेद चिड़िया के
को पंखों को गिन रहा हूं।
दूर नहीं हूं तुम से
उस चिड़िया की
चहचहाहट में हूं,
तुम्हारे कानों में गूंज रहा हूं।
तमाम चुनौतियों में से
किसी एक को अभी
चित करते हुए
तुम्हारी नीली आंखों में
ये जो आई है न चमक,
मैं वहीं तो हूं मित्र।
निशस्त्र होकर भी
तुम्हारी ढाल में हूं,
इस रणभूमि में हूं
तुम्हारा कवच।
तुम्हारे विजय रथ
के पहिए में भी मैं ही हूं,
घूम रहा हूं निरंतर
हर क्षण तुम्हारे साथ।
रात्रि में जब बनाती हो
युद्ध की योजनाएं,
उसकी रूपरेखा में मैं हूं।
तुम्हारे चक्रव्यूह के भीतर हूं,
कभी ओझल हुआ नहीं
तुम्हारे मन की आंखों से।
तलवार पर चमकते लहू पर
उगता हूं पुष्प बन कर,
इसकी सुगंध में भी मैं हूं।
काल के हर खंड में
घटित हूं और अघटित भी,
युद्धभूमि में उठती
धूल के हर कण में हूं।
विजयरथ पर सवार
मेरे पीछे खड़ी हो तुम,
कैसे कहूं मैं निहत्था हूं?
तुम्हारे धनुष की प्रत्यंचा
पर मैं ही तो बैठा हूं,
तीर की नोक को
दे रहा हूं तीक्ष्णता।
मैं कहीं भी नहीं हूं
फिर भी यहीं हूं,
तुम्हारी विजयगाथा को
कर रहा हूं लिपिबद्ध।
आगे बढ़ो….आगे बढ़ो,
अपने शत्रुओं के वार को
कर दो विफल।
तुम्हारे हर घात में मैं हूं।
युद्धरत हो तुम,
तो मैं भी हूं उन्मत्त
इसी रणभूमि में।
दूर नहीं हूं तुमसे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App