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कविताएंः ‘नारी के तीन चित्र’ और ‘प्रेयसी का मैला आंचल’

संजय स्वतंत्र की कविताएं

क्या बच्चे जनने की मशीन हो?

नारी : तीन चित्र

शुष्क अधरों की थरथराहट
ये गीले नयन
मैली उलझी लटें
सिर पर घूंघट का बोझ
और-
बच्चों का मेला
क्या बच्चे जनने की मशीन हो?

2. पैबंद लगी साड़ी
आबरू को ढाकती,
हल्दी लगे हाथ
बर्तन को मांजती,
नई दुनिया से अपरिचित
तुम क्या कैदी हो?

3. लाल रंग पुते अधर
नयन या कि तीर-कमान,
चाल में रवानी
तेज चलते हाथ,
यह तुनक मिजाज
और-
दो बच्चों की किलकार
तुम धन्य हो!

प्रेयसी का मैला आंचल

(एक)

अरे आकाश!
देखो तो अपनी प्रेयसी को,
जिसके हरियाले
आंचल को
नादान बच्चों ने
कितना मैला कर दिया है।

(दो)
बादलों के बीच
झांकता गगन
अपनी धरा को
ऐसे
जैसे मैली साड़ी में
विकृत रूप वाली
बुढ़िया को देख
कोई
मुंह फेर लेता हो।

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