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कविता: जिसकी आंखों में है चांद

यहां पढ़ें संजय स्वतंत्र की नई कविता।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

सो जाती हैं
उसकी युद्धरत कामनाएं
तब शुरू होती है मेरी यात्रा
उसकी सीपियों सी
पलकों के बीच,
जहां स्याही में डूबी
दोनों पुतलियां-
एक चांद तो दूजी
धरती जैसी हैं।

वास्को डी गामा ने
बताया था योरप को
भारत जाने का समुद्री मार्ग
वैसे ही बताना चाहता हूं
इस दुनिया को कि
ब्रह्मांड की जन्मदात्री
की आंखों में सिमटी है
धरती और चांद की दूरी
जिसे पल भर में
कर लेती है वह पार।

मैं कोलंबस नहीं
जो भटक जाऊंगा,
ढूंढ ही लूंगा
खुद की मुक्ति का मार्ग
मुक्ति उसकी आंखों में है-
जो रचती है
आंखों में हरा समंदर,
दिल में नीले चट्टान
और अपनी छाती में
प्रेम की अविरल नदी…,
इन सब को मैं
पार करूंगा अविचल।

कामना में डूबी उस स्त्री
की पलकों के नीचे
बैठा फीनिक्स कभी
बुझने ही नहीं देता
उम्मीदों की लौ,
मैं देख सकता हूं
उसकी आंखों में मरते
सपनों का पुनर्जन्म।

जानता हूं-
चुनौतियों को
लांघ लेगी वह
क्योंकि उसकी आंखों में
एक चांद भी है-
जिसे छूने की ललक
बाकी है अभी।

उस स्त्री की पसीजती
हथेलियों को थाम कर
पार करता हूं भंवर
जो अकसर दिखती है
उसकी अधूरी पुतलियों में
जिसने मेरे ललाट पर
डूबते हुए सूरज को
हर शाम चूमा है…।

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