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कविताः जैसै मृत्यु को मोक्ष से है प्रेम, वैसा ही प्रेम तुमसे है

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता

मैं प्रेम की खोज में हूं/ जैसे गोधूलि बेला को/ अपने सूरज से है..

डॉ. सांत्वना श्रीकांत

जैसे गोधूलि को है सूरज से प्रेम

मैंने प्रेम लिखा,
तुम झांकने लगे
उसके भीतर से,
एक चित्र उकेरा,
तो तुम्हारी तेजस आंखें
ताकती रहीं मुझे,
मेरे नवांकुर कदमों को
वटवृक्ष बनते देख रही थीं,
मानो कह रहीं हो कि
तुम बना लोगे बसेरा
यहीं पर मेरी किसी डाली पर
लौट कर तो न जाओगे,
मेरी पत्तियों और फूलों में
हमेशा के लिए
रच-बस जाओगे।
सुनो न-
अकसर मेरे ललाट पर
उगा रहता है सूरज,
जो आखिरी बार तुमने
मेरे माथे को चूम कर उगाया था।
मेरे अंदर सन्नाटा पसरा है,
जिसे तोड़ देना चाहती हूं,
उलझनें तो शाश्वत हैं,
उसे सुलझाते हुए मैं
आगे बढ़ जाना चाहती हूं।
रक्त कणिकाएं बन तैर रहे हो
तुम मुझमें आदि से अंत तक।
मैं किसी मोह में नहीं हूं,
मैं प्रेम की खोज में हूं,
जैसे गोधूलि बेला को
अपने सूरज से है।
मृत्यु को मोक्ष से है प्रेम,
वैसा ही प्रेम तुमसे है।

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