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कविताः तो लौट जाऊंगा सिद्धार्थ बनकर अपनी यशोधरा के पास, हमेशा के लिए

पढ़िए संजय स्वतंत्र की कविता - 'अगर पढ़ सको मेरी अर्जियां'

‘अगर पढ़ सको मेरी अर्जियां’

प्रस्तुत कविता में सिद्धार्थ और यशोधरा की कथा का आश्रय कवि की अभिव्यक्ति को सरल बना देता है। कविता अक्सर बातों के उस रिक्त स्थान की पूर्ति होती है जो कई वजहों से होठों पर आने से रह जाती है। उसे तमाम बिंबों का सहारा लेकर कविता के डाकिए से सही पते पर पहुंचाना थोड़ा आसान होता है। ‘पढ़ सको मेरी अर्जियां’ कवि का वही पत्र लगता है, जिसमें कवि अपनी यशोधरा से कहना चाहता है कि अगर तुम मेरी समाधि तोड़ सको तो मैं सिद्धार्थ बनकर तुम्हारे साथ लौट सकता हूं। पढ़िए संजय स्वतंत्र की कविता

अगर पढ़ सको मेरी अर्जियां

तुम्हारी मुस्कान में है
सदियों का आत्मविश्वास
जैसे हजारों बरस पुराना
कोई महाबोधि वृक्ष,
जिसकी छांव में
आज भी बैठा हूं
समाधिस्थ।
तुम्हारी स्मृतियों से जब
टूटती है मेरी समाधि,
तब उस नदी के
आखिरी छोर से
घुटने भर पानी में
निकल जाता हूं दूर..
वहीं ढूंढ़ता हूं तुम्हें,
जहां चली आई थीं सीता
और नाराज होकर
दे दिया था
इस नदी को श्राप।
क्या पता कभी आए हों
सिद्धार्थ भी यशोधरा को मनाने,
जैसे मैं चला आया यहां।
तुमसे मिल कर
मिटा देना चाहता हूं श्राप,
मंथर बहती हुई
इस नदी का।
लिख कर बहा देना
चाहता हूं कई अर्जियां
तुम्हारे नाम..
अगर पढ़ सको तुम।
जलधारा के बीचों-बीच
उकेरता हूं तुम्हें,
पुकारता हूं सिद्धार्थ की तरह
कि-
नहीं छोड़ कर जाऊंगा
इस बार तुम्हें कभी,
किसी सुनसान अंधेरी रात में,
बताऊंगा तुम्हें कि
मोह-माया से परे भी
होता है एक संबंध
दो रुहों के बीच
अलिखित लेकिन वचनबद्ध।
सदियों से जमी स्मृतियां
टूट कर बनती हैं
जब समय की लहरें
तो वह मिटा देती है
तुम्हारा नाम,
लील जाता है सन्नाटा भी
मेरी पुकार।
एक से दूसरी समाधि तक
की यह यात्रा
कब होगी खत्म
मालूम नहीं।
चाहता हूं तुम्हारी
अविरल मुस्कान से टूट जाए
इस नदी को दिया गया
बरसों पुराना वह श्राप।
मिल जाए मुझे भी मुक्ति।
अगर मिल सको तुम,
पढ़ सको मेरी अर्जियां,
तोड़ सको मेरी समाधि,
ले जा सको मुझे
यहां से..
तो लौट जाऊंगा सिद्धार्थ
बन कर हमेशा के लिए
अपनी यशोधरा के पास।

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