श्रद्धा (बदला हुआ नाम) एक डिजिटल संस्थान की सक्रिय पत्रकार है। श्रद्धा को पत्रकारिता में आए महज दो साल हुए हैं और उसने अपनी पुख्ता पहचान बना ली है। सोशल मीडिया पर उसकी रिपोर्टिंग अक्सर वायरल हो जाती है। श्रद्धा जिस डिजिटल संस्थान में काम करती है, उसने समाज के वंचित तबकों पर साल भर चलने वाला एक स्तंभ शुरू किया।
श्रद्धा को इस स्तंभ के लिए एक ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता से बात करनी थी जो खुद वंचित तबके से आती हैं। श्रद्धा ने रात ग्यारह बजे उन्हें वाट्सएप पर संदेश भेजा कि क्या आप अपने अनुभव हमें बता सकती हैं कि आपको किस तरह का भेदभाव झेलना पड़ा, कितनी तकलीफें सहनी पड़ीं। श्रद्धा को अपने संदेश का कोई जवाब नहीं मिला।
दूसरे दिन दफ्तर पहुंचते ही श्रद्धा को उसके संपादक ने मिलने के लिए बुलाया। संपादक ने श्रद्धा को कहा कि एक सामाजिक कार्यकर्ता ने आपकी लिखित शिकायत भेजी है कि आपने उनके प्रति अति असंवेदनशील रवैया अपनाया। श्रद्धा को अपनी गलती समझ नहीं आई और गुस्से में उसने सोशल मीडिया पर उस सामाजिक कार्यकर्ता को अहंकारी बताते हुए उसके खिलाफ मुहिम छेड़ दी।
श्रद्धा के इस रवैए के बाद संपादक ने उसे बुलाया और समझाया कि सामाजिक कार्यकर्ता की शिकायत को किसी भी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता है। जब हमें वंचित तबकों पर बात करनी है तो हमें खुद उस समाज में जाकर समझना होगा, देखना होगा, महसूस करना होगा। आम तौर पर ऐसा देखा जाता है कि हम ऐसे अवसरों पर किसी खास के संघर्षों को उनकी जुबानी लिखने तक सीमित हो जाते हैं। अगर किसी को अपने संघर्ष को बार-बार खुद ही बताना पड़े तो मतलब यह है कि समाज एक ही जगह ठिठका खड़ा है।
संपादक ने आगे कहा, तुम एक पत्रकार हो और तुम्हारे लिए सामान्य बात है कि ग्यारह बजे रात तक सक्रिय रहती हो। लेकिन किसी संवेदनशील विषय पर बातचीत करने के लिए औपचारिक निवेदन इतनी रात में करना भी एक गलती है। तुम्हें लग रहा है कि तुम उनके संघर्षों के बारे में छाप कर उन पर अहसान कर रही हो, और उन्हें तुम्हारे सवालों के जवाब देने के लिए किसी समय भी उपलब्ध हो जाना चाहिए।
आज जब पूरी दुनिया में अलग-अलग पहचानों का संघर्ष चल रहा है तो हमें अपनी अभिव्यक्ति के तरीकों को परिमार्जित करने की कोशिश करनी चाहिए। बीसवीं सदी में जिन शब्दों के इस्तेमाल से किसी को आपत्ति नहीं होती थी, इक्कीसवीं सदी में वैसे बहुत से शब्द भेदभाव के सूचक हो गए हैं और प्रगतिशील तबकों से उन्हें छोड़ने की उम्मीद की जाती है।
मुश्किल यह है कि जब हमसे कोई प्रगतिशील होने की उम्मीद करता है तो हम खौफजदा हो जाते हैं। हमें लगता है कि हमने गलती कर दी तो हमें सजा दी जाएगी। समय सिर्फ तकनीक और अन्य चीजों से नहीं बदलता। समय शब्दों और उसकी संवेदनशीलता से भी बदलता है। शब्द और संवेदनशीलता भी पुराने होते हैं। पुराने शब्दों से मोह छोड़ देना ही श्रेयस्कर है।
