लाली मोहल्ले भर में बड़ी होनहार लड़की थी। लाल कपड़े पहनना उसे बहुत पसंद था, इसलिए सब उसे लाली कहते थे। उसके आस-पड़ोस में मंजीत, रौनक, छुटकी और जयदीप भी रहते थे। उम्र में ये सब उससे थोड़े ही छोटे थे, लेकिन खेलते हमेशा साथ-साथ। एक दिन वह हिंदी का पाठ पढ़ रही थी।
पाठ का नाम था, ‘हमारे परंपरागत खेल’। पाठ पढ़ते समय लाली के मन में विचार आया कि बच्चे अपने देश के प्राचीन और उपयोगी खेलों को भूलते जा रहे हैं। वह मन ही मन बुदबुदाई, ‘अब मैं अपने देश के पुराने खेल भी खेला करूंगी।’
शाम को जब उसके साथी घर आए तो उसने कहा, ‘देखो भई! अब हम क्रिकेट, फुटबाल और टेनिस जैसे खेल, खेलना छोड़ देते हैं।’ ये क्या कह रही है लाली, खेलना कोई भला छोड़ता है क्या?’ मंजीत ने आश्चर्य से पूछा।
‘अरे बुद्धू! खेल बंद करने के लिए कौन पागल कह रहा है। मैं तो सिर्फ देसी खेल की बात कर रही हूं।’ लाली ने कहा। इस पर छुटकी बोली, ‘दीदी, ये खेल तो सब लोग खेलते हैं। टीवी पर मैंने देखा भी है, लेकिन तुम कौन सा खेल खेलना पसंद करोगी?’
‘छुटकी जो खेल हमारे बुजुर्ग खेलते थे जैसे खो-खो, कबड्डी, गिल्ली-डंडा, आइस-पाइस और लट्टू खेलना।’ लाली ने बताया।
‘अरे हां, मेरी दादी बताती हैं। चलो आज ही कुछ खेलते हैं।’ रौनक ने उछलते हुए कहा। अचानक जयदीप बोला, ‘गिल्ली-डंडा बड़ा मस्त खेल है। मैंने एक कहानी में पढ़ा था।’ लाली उन सब को साथ लेकर लकड़ी के सामान की दुकान पर गई। ‘अरे लाली, तुम यहां?’ दुकानदार ने लाली से पूछा।
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‘चाचाजी आप मेरे लिए एक चीज बना देंगे?’ लाली ने पूछा। दरअसल पिछले दिनों लाली के मकान में यही चाचाजी फर्नीचर का काम करके गए थे। ‘बोलो बेटी।’ उन्होंने पूछा। ‘आप मेरे लिए गिल्ली-डंडा बना दो।’ लाली ने तपाक से कहा। ‘तुम तो कह रही थी कि एक चीज बना देना…और अब कह रही हो दो चीजें बना देना।’ चाचाजी ने मुस्कुराते हुए कहा। वह शर्माते हुए बोली, ‘एक ही तो है।’ ‘गिल्ली एक और डंडा दूजी…हुईं न दो चीजें।’ चाचाजी खिलखिलाकर हंस पड़े।
फिर चाचाजी ने तुरंत एक जोड़ी गिल्ली-डंडा तैयार कर दिए। ‘लो लाली बिटिया।’ चाचाजी ने उसके हाथों में थमाते हुए कहा। ‘कितने पैसे हुए?’ लाली ने अपनी जेब से दस का नोट निकालते हुए पूछा। चाचाजी ने उससे लाड़ लड़ाते हुए कहा, ‘मैं अपने दोस्त की प्यारी बिटिया से भला पैसे कैसे लूंगा। जाओ खेलो।’ ‘हुर्रे…चलो खेलते हैं।’ जयदीप ने कूदते हुए कहा।
लाली ने अपने दोस्तों के साथ मोहल्ले से कुछ दूर खुली जगह में गिल्ली-डंडा खेलना शुरू किया। खेलने के साथ-साथ वह सबको गिल्ली-डंडा के नियम और कायदे भी बता रही थी। उसने सबको सामने खड़ा किया और गिल्ली की तीखी नोक पर जोरदार डंडा मारा। गिल्ली उछल कर इतनी दूर गई कि किसी को दिखाई नहीं पड़ी। सब ढूंढ़ने में लग गए।
रौनक गिल्ली को ढूंढ़ने के लिए एक टेकरी के पीछे चला गया। उस टेकरी के पीछे एक आदमी जमीन में कुछ छुपा रहा था। रौनक पहले तो गौर से सब कुछ छुपकर देखता रहा। फिर चुपचाप आ गया। ‘गिल्ली मिली क्या रौनक?’ छुटकी ने पूछा। ‘गिल्ली तो नहीं मिली, लेकिन जासूस बनने का मौका जरूर मिल गया।’ रौनक ने गंभीरता से कहा। ‘जासूस बनने का। मैं कुछ समझी नहीं।’ लाली ने कहा। रौनक ने उस संदिग्ध व्यक्ति के बारे में अपने दोस्तों को बता दिया।
लाली बोली, ‘चलो अपने मोहल्ले वालों को बताते हैं।’ ‘मोहल्ले वालों को नहीं। सीधे पुलिस स्टेशन चलते हैं।’ रौनक ने तुरंत कहा। ‘वहां हम बच्चों की बात कौन सुनेगा?’ जयदीप ने पूछा। ‘सुनेंगे मेरे दोस्त। वहां मेरे दूर के रिश्ते के चाचा हैं। वो भी थानेदार।’ रौनक ने कहा। ‘थानेदार यानी इंस्पेक्टर।’ छुटकी बोली।
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वे सब पुलिस स्टेशन पहुंच गए। रौनक के इंस्पेक्टर चाचा मिल गए। उसने उन्हें अपने आने का कारण खुलकर बता दिया। इंस्पेक्टर चाचा अपनी टीम के साथ जीप में बच्चों को बैठाकर उस टेकरी की ओर रवाना हो गए। रौनक ने टेकरी पर वह जगह बताई, जहां वह आदमी कुछ छुपा रहा था। पुलिस ने वहां एक गड्ढा होने की आशंका जताई। फिर वहां खुदाई की गई। गढ्डे के अंदर से जो निकला, उसे देखकर सबके पैरों तले जमीन खिसक गई।
पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा, ‘रौनक बेटा, वह व्यक्ति कोई और नहीं आतंकवादी था। उसने बम बनाने की सामग्री यहां छुपाई है। तुमलोगों की समझदारी के कारण यह जखीरा पकड़ा गया है। हम जल्द ही उस आतंकवादी और उसके पीछे और भी आतंकियों को ढूंढ़ निकालेंगे। अभी हम तुमलोगों को घर छोड़ देते हैं। और हां बच्चो, तुमलोग अपने अन्य दोस्तों को इसके बारे में कुछ मत बताना। अभी हमें बहुत कुछ करना है।’ ‘ठीक है चाचा…।’ रौनक, लाली, छुटकी और जयदीप ने एक स्वर में कहा। छुटकी बोली, ‘हमारी गिल्ली तो मिली भी नहीं।’ ‘मैं लाऊंगा तुम सबके लिए नया गिल्ली-डंडा।’ इंस्पेक्टर चाचा ने छुटकी को जीप में बैठाते हुए कहा। सब बच्चे हंसने लगे।
