ओलू उल्लू जंगल का रास्ता भटक कर शहर की तरफ आ गया। घनी रोशनी में ओलू को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। वह एक फ्लैट के छज्जे पर चुपचाप बैठ गया। शहर के शोर-शराबे से वह डर गया था। शाम को जैसे-जैसे अंधेरा सा छाने लगा, ओलू को थोड़ा-थोड़ा दिखाई पड़ने लगा। वह थोड़ी हिम्मत करके फ्लैट की खुली खिड़की में जाकर बैठ गया। उस कमरे में अंधेरा था, इस कारण वह अच्छी तरह देख पा रहा था। उसने स्वयं को वहां सुरक्षित समझा और कमरे में दाखिल हो गया।
रात जब गहरी हुई तो ओलू कमरे में इधर-उधर उछलने लगा। उछलते-कूदते वह एक पियानो पर जा बैठा। उसके पंजे पड़ते ही पियानो में से सुर निकलने लगे। पियानो की आवाज सुन फ्लैट में रहने वाले लोग जाग गए। ‘ये पियानो की आवाज कैसे आई?’ रोहण ने अपनी पत्नी सोनिया से पूछा। सोनिया बोली, ‘ये आवाज तो बाबूजी के कमरे से आ रही है।’
रोहण ने अपनी दस साल की बेटी काव्या को सहलाते हुए धीरे से कहा, ‘सोनिया जरा धीरे बोलो। काव्या जग गई तो, वह डर जाएगी।’ ‘डर तो मैं भी रही हूं, आखिर बाबूजी के पियानो की आवाज कैसे आई?’ ओलू फिर पियानो के बटनों पर चलने लगा। कमरे में फिर आवाज गूंजने लगी। रोहण और सोनिया दोनों घबरा गए। वे कमरे की ओर बार-बार देखने लगे।
‘कहीं बाबूजी की आत्मा तो नहीं आ गई कमरे में। उन्हें पियानो बजाने का बड़ा शौक था।’ सोनिया ने चादर में लिपटते हुए कहा। रोहण ने तुनक कर कहा, ‘क्या कह रही हो तुम, होश में तो हो? मेरे बाबूजी की आत्मा क्यों भटकेगी? हमने सब कुछ तो किया था उनकी आत्मा की शांति के लिए। और, विज्ञान के युग में ये सब बेकार की बातें हैं।’
ओलू बीच-बीच में पियानो बजाता रहा। डरे-सहमे रोहण और सोनिया ने जैसे-तैसे रात काटी। पौ फटते ही वे दोनों कमरे के दरवाजे पर कान लगाकर कुछ सुनने का प्रयास करने लगे। उनको ऐसा करते देख उनकी बेटी काव्या ने पूछा, ‘आप दोनों कान लगाकर क्या सुन रहे हैं, दादाजी अंदर हैं क्या?’
काव्या के मुंह से ये सुनकर उनका चेहरा सफेद हो गया। रोहण ने खुद को संभालते हुए कहा, ‘कौन..दादा..जी..क्यों आएंगे बाबूजी। उनको गुजरे तो पूरे छह महीने हो गए बेटा।’ ‘बेटा तेरे पापा और मैं यूं ही दरवाजे के पास खड़े थे। दरअसल तेरे दादाजी की याद आ गई थी।’ सोनिया ने बात को संभालते हुए कहा।
लगभग साढ़े आठ बजे काव्या के पापा रोहण दफ्तर चले गए। उसकी मम्मी ने भी फटाफट काम निपटाया और पड़ोसन के घर चली गई। काव्या घर के बाहर खेल रही थी। कुछ देर बाद काव्या अकेली अपने घर में चली गई।
जैसे-जैसे सूरज डूबने लगा, वैसे-वैसे रोहण और सोनिया के चेहरे पर डर दिखाई देने लगा। उन्होंने ठीक ढंग से जब खाना नहीं खाया तो काव्या ने कहा, ‘पापा-मम्मी आप दोनों किस सोच में हो। खाना भी नहीं खा रहे।’ ‘कुछ नहीं बेटा सब ठीक है, तू जल्दी से खाना खा और सो जा। आज पढ़ाई-लिखाई करने की कोई जरूरत नहीं है।’ सोनिया ने कहा।
रात का अंधेरा जैसे ही बढ़ा, पियानो फिर बजने लगा। रोहण और सोनिया फिर घबरा गए। काव्या पियानो की आवाज सुन अपने पापा से बोली, ‘पापा देखो, दादाजी के कमरे में कोई उनका पियानो छेड़ रहा है। चलो देखते हैं, वो कौन है?’ ‘कोई नहीं है बेटा तुम सो जाओ।’ सोनिया ने कहा।
‘नहीं मम्मी मैं तो जरूर देखूंगी कि कौन है अंदर।’ काव्या ने दादाजी के कमरे की ओर बढ़ते हुए कहा। काव्या ने कमरे की कुंडी खोल दी और लाइट जला दी। उजाला होते ही ओलू तुरंत छुप गया। उसके पीछे-पीछे रोहण और सोनिया भी आ गए। उन्होंने देखा कि वहां एक बर्तन में पंछी के लिए दाने और एक कटोरी में पानी रखा हुआ था। ‘देखो इस कमरे में पहले से कोई है, जो पंछी भी रखता है।’ सोनिया ने रोहण का हाथ पकड़ कर कहा।
रोहण कुछ कहता उससे पहले ही काव्या बोल पड़ी, ‘यहां एक पंछी ही है, जो रात को पियानो बजाता है।’ उसके पापा ने पूछा, ‘तुम्हें यह सब कैसे पता?’ ‘पापा कल रात जब कमरे में से पियानो बजाने की आवाज आ रही थी, तब मैं सोई हुई नहीं थी। आपकी सारी बातें मैं सुन रही थी।’
‘ये पंछी का मामला क्या है?’ वह बोली, ‘पापा कल जब मैं घर में अकेली थी, तब मैंने दादाजी का कमरा खोल कर देखा।’ ‘क्या कह रही है तू, तुझे कुछ हो जाता तो।’ सोनिया ने चिंता जाहिर करते हुए कहा। वह जोर से हंसी और बोली, ‘मुझे कुछ नहीं होने वाला मम्मी। इस कमरे में एक उल्लू जंगल से भटक कर यहां आ गया। वही रात भर पियानो पर बैठ कर उछल-कूद करता रहा। बस उसके चलने के कारण पियानो बजने लगता।’
‘कहां है वो उल्लू का पट्ठा।’ रोहण ने पूछा। काव्या ने पियानो के नीचे बैठे ओलू को दिखाया और बोली, ‘कल इसको भूखा-प्यासा देखकर मैंने ही पानी और अनाज के दाने रख दिए थे। ये अब मेरा दोस्त है। इससे डरने की जरूरत नहीं है।’ काव्या ने उसे गोद में उठाया और मम्मी को दिखाया। ओलू की मासूमियत देखकर उसके मम्मी-पापा का डर दूर भाग गया। काव्या और उसके मम्मी-पापा ने उल्लू को जंगल में ले जाकर छोड़ दिया। ओलू को अपने घर का रास्ता मिल गया था। काव्या की बुद्धिमानी से पियानो का भूत भाग चुका था।
