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महोत्सव में विदेशी कलाकारों की रामधुनी

समारोह की अगली संध्या कंबोडिया, मॉरीशस और त्रिनिदाद व टोबैगो के कलाकारों के नाम रही। कंबोडिया के कलाकार मंडली ने लवकुश जन्म और अश्वमेध यज्ञ के प्रसंगों को दर्शाया।

Author Published on: September 27, 2019 6:02 AM
महोत्सव की पहली संध्या को श्रीलंका के कलाकारों ने प्रस्तुुति दी।

शशिप्रभा तिवारी

पांच साल से भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) राजधानी दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय रामायण महोत्सव करा रही है। इस वर्ष यह महोत्सव तीन दिन मनाया गया। कामिनी सभागार में महोत्सव का आरंभ थाईलैंड के बनडीपातानशिल्पा संस्थान के कलाकारों की प्रस्तुति से हुआ। वहीं आनंद आश्रम नृत्य मंडली, इंडोनेशिया के कलाकारों ने राम के आख्यान को पेश किया। महोत्सव की पहली संध्या को श्रीलंका के कलाकारों ने प्रस्तुुति दी। चंदना विक्रमसिंघे और नृत्य गिल्ड के कलाकारों ने नृत्य प्रस्तुति से समारोह को रोशन किया।

समारोह की अगली संध्या कंबोडिया, मॉरीशस और त्रिनिदाद व टोबैगो के कलाकारों के नाम रही। कंबोडिया के कलाकार मंडली ने लवकुश जन्म और अश्वमेध यज्ञ के प्रसंगों को दर्शाया। एक ओर इस प्रस्तुति में नृत्यांगनाओं ने जिन हस्तकों का प्रयोग किया, वह भरतनाट्यम के अभय, वरद, अल्पद्म, पताका, सूची हस्तमुद्राओं से बहुत साम्यता रखते नजर आए। वहीं दूसरी ओर मणिपुरी रास, थैयम और छऊ नृत्य शैलियों की छाया भी दिखी।

दूसरी संध्या नोट्रे डेम काली मंदिर एसोसिएशन, मॉरीशस के कलाकारों के नाम रही। इन कलाकारों ने गायन शैली में सुन लो, पावन राम की कहानी पेश की। रामचरितमानस के कुछ दोहों और गीत ‘चरणामृत पीए परिवारू’, ‘अवध बजेला बधाई’ जैसे गीतों को सुरों में पिरोया। इस दल में राम बुधराम, वनिशा, भुवेंद्र नारायण, शैलेश, रणवीर व संजीव शामिल थे। रामचरितमानस के कुछ दोहे और समकालीन गीतों के आधार पर सूर्पणखा, मारीच वध, सीता हरण व रावण-जटायु द्वंद्व का चित्रण बेहद मार्मिक था। कलाकारों के कुछ संवाद अंग्रेजी में थे तो कुछ हिंदी में। कलाकारों ने भैया, बहन, सीते शब्दों का प्रयोग किया।

महोत्सव की तीसरी संध्या में बांग्लादेश के कलाकारों ने रामायण गान यानि कुशानगान पेश किया। यह पेशकश कृपासिंधु कुशानगान समूह के कलाकारों की वाल्मीकि रामायण की रचनाओं पर आधारित था। कृपासिंधु ने उत्तरकांड के प्रसंगों को बहुत मार्मिक अंदाज में गाया। उन्होंने ब्रम्ह हत्या से दुखी राम के मानस का चित्रण संवाद के जरिए किया। वहीं कुलगुरु वशिष्ठ और राम का संवाद भी बेहद मार्मिक था। इस प्रस्तुति में नाच शैली का प्रयोग पारंपरिक रंग लिए हुए था, जो कथा के विस्तार को प्रवाह देने का काम कर रहा था। समारोह का समापन फिजी के कलाकारों की पेशकश से हुआ। श्रीसत्संग रामायण मंडली की पेशकश में सीता स्वयंवर, राम वन गमन, सीता हरण और शबरी प्रसंग को शामिल किया गया। प्रस्तुति का समापन राम के द्वारा शबरी को नवधा भक्ति के संदेश से हुआ। रामचरितमानस के दोहों और चौपाइयों के सुरीले गायन से समापन भक्ति रस से सराबोर हो गया।

यह आयोजन दर्शकों को साक्षी बनाता है कि भारतीय संस्कृति में संबंधों के निर्वाह का लंबा सिलसिला है। भारतीय संस्कृति उदारता और आत्मीयता को स्वीकारती है जो उसके विस्तार के झरोखों को और खोल देता है। शायद यही कारण है कि थाईलैंड, इंडोनेशिया, कंबोडिया जैसे दक्षिण पूर्ण एशियाई देशों तक सीता-राम जैसे नाम यात्रा करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।

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