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ये दोनों प्रेम के पुजारी हैं, कोई बताएगा इन्हें

उस दिन ठिठुरती दोपहर थी। बादलों में लुकाछिपी करता सूरज अपनी रश्मियों से प्रेम की कोपलें सहला रहा था। रेस्तरां में कॉफी पीते हुए अपराजिता की निगाह एकटक इंस्टाग्राम पर थी...

प्रतीकात्मक फोटो

उस दिन ठिठुरती दोपहर थी। बादलों में लुकाछिपी करता सूरज अपनी रश्मियों से प्रेम की कोपलें सहला रहा था। रेस्तरां में कॉफी पीते हुए अपराजिता की निगाह एकटक इंस्टाग्राम पर थी। उसे यूं अनवरत खोए देख नीलाभ ने पूछ ही लिया, ‘क्या देख रही हो?’ ‘…….कुछ नहीं, बस ये तस्वीर। जो इन दिनों वायरल हो गई है। और आप चैनल पर भी तो दिखा चुके हैं। देखिए न साक्षी को। धोनी उनकी हाई हील की सैंडिल के फीते को कितने जतन से बांध रहे हैं। और ये कैप्शन पढ़िए जरा-दिलवाया है तुमने, तो बांधो भी तुम। गजब।’ उसने कॉफी की घूंट लेते हुए धीरे से कहा।

नीलाभ अपराजिता के चेहरे के भावों को पढ़ते हुए बोला, ‘कितनी कोमल भावना है साक्षी की। मगर ट्रोल करने वाले लोग कहां समझ पाए इसे। यह एक नारी का अभिमान नहीं बल्कि उसकी असीम भावना है प्रेम की।’ अपरा ने कहा, ‘सचमुच। धोनी का झुक कर सैंडिल पहनाना यह साबित करता है कि वे अपनी संगिनी से कितना प्यार करते हैं। साक्षी में भी जीनवसाथी को अपने कदमों में झुकाने का नहीं, उनका नारी सुलभ गरिमामय भाव हैं। वह प्रेम में इतरा रही है। यह भावना हर नारी में होती है। ऐसे साथी को पाकर क्यों न वह इतराए?’

……..वह एकटक तस्वीर देखती रही। फिर कॉफी का आखिरी लंबा घूंट भरते हुए उसने कहा, ‘याद है न आपको। यहीं कनाट प्लेस में मंदिर की सीढ़ियों से फिसल गई थी। तब आप वहीं बैठ कर मेरे घुटने को देर तक सहलाते रहे। कितनी झेंप रही थी मैं। आते-जाते सब हमें ही देख रहे थे। और उन सब से बेफिक्र आप सिर्फ मेरी फिक्र कर रहे थे। एक स्त्री के प्रति पुरुष की यह चिंता जताती है कि वह उसका कितना खयाल रखता है। उनमें कोई संबंध हो, यह जरूरी तो नहीं। वह किसी न किसी रूप में जता ही देता है कि वह उसके साथ है। यही स्त्री भी करती है। आज साक्षी की तस्वीर देखते हुए उस दिन की बात याद आ गई नीलाभ सर……।’

…….फिर अपराजिता अपनी मनोहारी मुस्कान बिखेरते हुए बोली, ‘उस पल यही लगा था कि एक सच्चा मित्र या जीवनसाथी आप जैसा ही होना चाहिए जो झुक कर सारा बोझ अपने सिर पर उठा ले। हर पल फिक्र करे। दो कदम साथ चले। किसी भी दुख या संघर्ष में अपना हाथ आगे बढ़ा दे।’ यह कहते हुए उसने नीलाभ का ठंडा हाथ थाम लिया। उसकी गरम गोरी हथेलियों में वह भीतर तक पिघल गया।

आज सुबह चाय पीते हुए नीलाभ ने कैलेंडर की ओर देखा। 2019 का यह पहला रविवार है। …….तभी कमरे के सन्नाटे को अपराजिता की कॉल ने तोड़ा-‘गुड मॉर्निंग सर। सुनिए आज छुट्टी है। क्यों न आज दोपहर में लंच किया जाए। ड्राइवर को छुट्टी दे दीजिए। उसे हरदम दौड़ाए रहते हैं। वह भी आज आराम कर लेगा। मैं राजीव चौक स्टेशन के बाहर मिलूंगी। फिर वहीं से हम साथ चलेंगे।’ नीलाभ ने कहा, ‘जो हुकुम हुजूर साहिबा का। न्यूज बुलेटिन चेक कर तैयार होता हूं। और सुनो हल्दीराम से लड्डू लेती आना। आज खाने का मन हो रहा है।’ अपराजिता ने झल्लाने का भाव जताते हुए कहा, ‘आपको तो जब देखो लड्डू ही चाहिए। अच्छा बाबा ले आऊंगी। मगर सारा आप को ही खाना पड़ेगा। न मैं खाऊंगी और न आफिस ले जाने दूंगी।’ उसकी मीठी झिड़की सुन कर नीलाभ ने हंसते हुए कहा, ‘अच्छा ठीक है। लेकर तो आओ। ज्यादा नहीं बस दो-चार ही।’

दोपहर एक बजे वह तैयार हुआ। ड्राइवर को उसने कह दिया कि शाम को अक्षरधाम स्टेशन के बाहर मिलना। वहीं से आफिस जाऊंगा। अपरजिता से मुलाकात के दौरान उसे अकसर आधे दिन की छुट्टी दे देता। …….मॉडल टाउन की सीढ़ियों से चढ़ते हुए उसने कॉल किया, ‘सुनो 1.50 तक मिलते हैं। निकल गया हूं। तो मिलते हैं फिर।’ ‘पक्का। मैं भी निकल रही हूं।’ अपराजिता ने जवाब दिया।

नीलाभ प्लेटफार्म पर पहुंच गया है। युवाओं का एक समूह पहले से ही मौजूद है। अंतिम छोर पर खड़े इन युवाओं की चुहलबाजियां और मस्तियां बरबस ध्यान खींच रही हैं। चार लड़के और चार लड़कियां। जवानी की ओर बढ़ते गर्मजोशी से भरे कदम। ये पास ही स्टेडियम से खेल कर लौट रहे हैं। एक दूसरे को धौल जमाते हुए। उन्मुक्त हंसी हंसते हुए। दोस्ती में साथ चलने का जज्बा और साथ बढ़ने का संकल्प लिए। न कोई नकारत्मकता और न कोई संकोच। आज के युवाओं में रिश्तों के प्रति सहजता स्त्री-पुरुष के सह-अस्तित्व और एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना को ही अभिव्यक्त करती है। जो अमूमन पिछले कुछ दशकों में पुरुषवादी सोच में गुम हो गई है।

……हुडा सिटी सेंटर की मेट्रो आने की उद्घोषणा हो रही है। प्लेटफार्म की ओर आ रही मेट्रो को देख कर इन लड़के-लड़कियों में खाली सीट पर बैठने की होड़-सी मच गई है। वैसे लास्ट कोच में ज्यादातर सीटें खाली ही होती हैं। फिर भी इतना उतावलापन क्यों। कोच के दरवाजे खुलते ही सभी एक दूसरे को धकियाते हुए आगे बढ़े। इस भागमभाग में एक युवती की पांव में मोच आ गई है। वह दर्द से कराह उठी है-आह…..ओ मां…..आह। साथियों ने उसे सीट पर बैठा दिया है। उसकी एक सहेली उसे पानी पिला रही है। युवती को पीड़ा से बेहाल देख एक दोस्त सहसा उसके सामने फर्श पर बैठ गया है। उसने मोच वाले पांव से स्पोर्ट्स शू को आहिस्ते से निकाल दिया है। अब उसकी जुराबें भी उतार रहा है। वह बहुत संभाल कर टखने के आसपास की नसों को सहला रहा है।

युवती की बड़ी-बड़ी आंखों से नदी बह चली है। मोच कुछ ज्यादा ही आई है। ‘….नहीं रोते नहीं हैं, तुम तो छोटी सी बच्ची की तरह रोने लगी हो यार। देखो कैसे मैं दूर करता हूं तुम्हारा दर्द।’ उसके दोस्त ने कहा। सचमुच वह दर्द को दूर करना जानता है। उसकी मित्र उसे सबके सामने छूने दे रही है। यकीनन खास दोस्त है उसका। सुख-दुख में साथ निभाने से रिश्ते इसी तरह मजबूत बनते हैं। अगर नहीं होते हैं, तो यकीन मानिए वहां कोई रिश्ता ही नहीं।

इस क्रम में कुछ स्टेशन निकल गए हैं। उद्घोषणा हो रही है-अगला स्टेशन कश्मीरी गेट है। मोच से बेहाल हुई जा रही युवती का दर्द अब कम हो गया है। वह सहज हो रही है। दोस्त से नजरें मिलते ही वह मुस्कुरा उठी है। इस पर युवक ने उसकीएड़ियों में गुदगुदी की, तो वह खिलखिला पड़ी। उसके होठों से सफेद दंतपंक्तियां चमक उठी हैं। ‘यूं क्या देख रहे हो मुझे’, उसने कहा तो युवक ने कहा, ‘तुम्हारी शर्ट का बटन टूट गया है।’ ‘ …….हे भगवान। तुमने पहले क्यों नहीं बताया। पीटूंगी तुम्हें।’ उस पर युवक ने कहा, ‘अरे अभी ध्यान गया। तुम भी न….। अच्छा ये लो।’ यह कहते हुए उसने अपना मफलर उसके गले से लपेटते हुए उसकी शर्ट को ढक दिया। लाज से गड़ी जा रही युवती गरिमा से भर उठी है। …….हम ऐसे पावन प्रेम को नकारात्मकता से क्यों देखते हैं। नीलाभ ने पल भर के लिए सोचा। किसी भी स्त्री-पुरुष के रिश्ते पहले दिल से बनते हैं। वहां सबसे पहले सम्मान की भावना बहुत जरूरी है। इस रिश्ते को जतन और भरोसे के साथ संभालना होता है।

अगला स्टेशन चांदनी चौक है। दरवाजे दायीं ओर खुलेंगे। वह युवती सीट से खड़ी होने लगी तो दोस्त ने टोका, ‘नहीं। अभी बैठो। दर्द पूरी तरह खत्म हो जाने दो।’ इस पर उसने कहा, ‘नहीं। अब काफी कम हो गया है। मैं देखना चाहती हूं कि ठीक से चल सकती हूं कि नहीं।’ दुबले-पतले युवक ने कहा, ‘अगर नहीं चल पाई तो गोद में उठा कर तुम्हें ले जाऊंगा। चिंता मत करो।’ उसकी बात अनसुनी कर वह खड़ी होते हुए वह बोली, ‘मेरा वजन ज्यादा है तुमसे। उठा नहीं पाओगे। गिरा दोगे। और मुझे फिर मोच आ जाएगी।’ ‘……. तो क्या हुआ? मैं फिर तुम्हें इसी तरह ठीक कर दूंगा।’ दोस्त ने कहा, तो वह शर्माते हुए धीरे से बोली, ‘मुझे यूं सबके सामने न छुआ करो। आज का तो माफ किया। तुम्हें पता नहीं। ये सब चिढ़ाते हैं मुझे। हम बच्चे नहीं रहे अब। हमारे बीच पाकपन को हम ही समझ सकते हैं। दूसरों को क्या पता।’

दो कोच के बीच जंक्शन पर किनारे दोस्तों से दूर खड़े इस युगल को देख कर नीलाभ को अपराजिता की याद आई, वह अकसर इसी तरह सहजता से हाथ थाम लेती है। उस स्पर्श में हमेशा एक गर्मजोशी भरे रिश्ते की गरमाहट ही महसूस हुई। यह युवती नीली जींस-सफेद स्वेटशर्ट में खूब फब रही है। दोस्त के नीले मफलर में वह परी लग रही है। खुले बालों के बीच चांद सा चेहरा और होठों पर जैसे गुलाब खिला है। लंबी कद-काठी की भरे बदन वाली इस युवती के कंधे पर उसके दोस्त ने हाथ धरते हुए पूछा, ‘अब तो दर्द नहीं है न।’ युवती ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘जरा सा भी नहीं। तुमने जो ठीक कर दिया। तुम्हारे स्पर्श में जादू है।’

अपनी प्रशंसा से अघाए युवक ने उसके दोनों कंधे पर अपने हाथ धर दिए हैं। फिर हौले से उसकी पीठ थपथपाई, तो युवती ने अपना सिर दोस्त के कंधे पर टिका दिया। वह धीमे-धीमे उससे बात कर रही है। वह उससे सट कर खड़ी हो गई है। दिल की लगन सुलग उठी है। इन दोनों के दोस्त सीट पर बैठे किताबों के पन्ने पलट रहे हैं। मगर इधर प्रेमग्रंथ खुलने लगा है। ……. इस किताब के पन्ने मैं कभी पलट ही नहीं पाया। जिंदगी कितनी पीछे छूट गई। प्रेम की कोपलें सूख चलीं। नीलाभ सोचने लगा। मेट्रो तेज रफ्तार से अपनी मंजिल की ओर भाग रही है। ….समय के कालचक्र को पार कर मिली अपराजिता ने एक ऐसे रिश्ते को जन्म दिया, जो मेरे दिल में शिशु की तरह धड़कता है। करवटें बदलता है। शून्य में ताकते हुए विराट को रचता है। सचमुच कुछ रिश्ते रक्त के नहीं, मन के होते हैं। वे शाश्वत होते हैं। अपनी पावनता के साथ स्पंदित होते रहते हैं।

अगला स्टेशन राजीव चौक है। दरवाजे दायीं ओर खुलेंगे। उद्घोषणा सुन कर युवती ने कहा, चलो न आज कॉपी पीते हैं। मुझे ठंड लग रही है। युवक ने उसके कंधे को थपथपाते हुए कहा, हां, एक कप कॉफी तो बनती है। थोड़ा आराम मिल जाएगा तुम्हें। थोड़ी देर और बात कर लेंगे। वैसे भी तुम्हारी बातों का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। ……..सच कहा उसके दोस्त ने। बातें कभी खत्म नहीं होनी चाहिए। एक अच्छा रिश्ता बेहतर संवाद से ही बनता है। जहां संवादहीनता हो, वहां रिश्ते गुम होने लगते हैं।

कोच के दरवाजे खुल गए हैं। उनके दोस्तों ने युगल को देख कर मुस्कुराहटों के फूल उछाल दिए हैं। वे दोनों सबको बॉय बोलते हुए प्लेटफार्म पर आ गए हैं। नीलाभ भी राजीव चौक उतर गया है। उनके पीछे चल पड़ा है। वे सीढ़ियों से होकर प्लेटफार्म नंबर तीन के पास कॉपी शॉप की ओर बढ़ रहे हैं। तभी पास से गुजर रहे एक युवा यात्री के मोबाइल की कॉलर ट्यून बज उठी है- तुम भी चलो, हम भी चलें/ चलती रहे जिंदगी…./न जमीं मंजिल, आसमां/जिंदगी है जिंदगी……।

…….तो जिंदगी बहती हुई जा रही है। हमें इसे समेट लेना चाहिए। इसमें सभी राग-द्वेष और गुस्से को बहा देना चाहिए। जी लेना चाहिए हर पल को। क्योंकि जीवन की धारा में एक दिन हम सबको विलीन हो जाना है। …….सीढ़ियां चढ़ चुके युगल को देखते हुए नीलाभ ने सोचा। वे कॉपी शॉप में जा रहे हैं। नीलाभ ठीक बगल के गेट से बाहर निकल रहा है। उसने सोच लिया है कि आज वह खुद आगे बढ़ कर अपराजिता का दामन थाम लेगा।

अपराजिता आ रही है। आज उसने चटख परिधान पहना है। हमेशा की तरह चुस्त और खिली-खिली सी लग रही है। दूर से उसे देख कर मुस्कुरा उठी है। पास आते ही नीलाभ ने उसकी ओर अपना दायां हाथ बढ़ा दिया है। अपराजिता ने तुरंत अपनी हथेलियों में उसे समेट लिया है। वह रुई के फाहे सा उसमें घुलने लगा है। …..आज क्या बात है? उसने मुस्कान बिखेरते हुए पूछा। यूं तपाक से मिलेंगे। आज सोचा न था। सब ठीक है न? क्या दिल उदास है? मैं आ तो गई। चलिए चलते हैं लंच के लिए। उसने कहा। वे सड़क किनारे चलने लगे हैं। आगे फुटपाथ पर मजदूर युवा दंपति चादर बिछा कर बैठा है। वे एक थाली में साथ खा रहे हैं। वहीं ट्रांजिस्टर पर यह गीत बज रहा है-
अब न टूटे ये प्यार के रिश्ते
अब ये रिश्ते संभालने होंगे,
मेरी राहों से तुझको
दुख के कांटे निकालने होंगे।

अपराजिता ने नीलाभ का हाथ कस कर पकड़ लिया है। रेस्तरां की ओर उनके कदम बढ़ रहे हैं। ये दोनों प्रेम के पुजारी हैं। कोई बताएगा इन्हें?
(संजय स्वतंत्र द्वारा लिखी जा रही लास्ट कोच शृंखला की एक कड़ी।)

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