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खत्म होती तालाब संस्कृति

भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा में जल का संरक्षण करना हर व्यक्ति का परम कर्तव्य है। जब तक यह परंपरा चलती रही, तब तक देश में पानी की कोई किल्लत नहीं थी। राज घरानों, ताल्लुकेदारों और सेठ सरीखे व्यक्तियों के स्वभाव में जल संरक्षण था।

चित्र: नरेंद्रपाल सिंह

कृषि संस्कृति का अभिन्न हिस्सा माने जाने वाले तालाब कभी ग्रामीण संस्कृति के ही नहीं, कस्बों और शहरों की भी पहचान हुआ करते थे। भारत का कोई ऐसा गांव, कस्बा और शहर नहीं, जहां बड़ी तादाद में तालाब न रहे हों। खासकर रजवाड़ों के वक्त, तालाब राज्य की खेती-किसानी के ही नहीं, प्यास बुझाने के सबसे बेहतर जलस्रोत के रूप में मौजूद थे। मगर आजादी के बाद नए विकास के मॉडल अपनाए जाने के बाद तो तालाबों के प्रति लोगों में उनके इस्तेमाल और संरक्षण की परंपरा समाप्त होने लगी। पिछले सत्तर सालों में देश के लाखों तालाब सूख गए या उन पर अतिक्रमण करके उनका नामोनिशान मिटा दिया गया। जो तालाब कृषि-बागवानी जीवन-संस्कारों और पर्यावरण को महफूज रखने के आधार बने हुए थे, उनके प्रति लोगों में उपेक्षा की ऐसी नकारात्मक प्रवृत्ति पैदा हुई कि देखते-देखते अपना अस्तित्व ही खो बैठे। न तो जनता ने इनके संरक्षण के लिए अपनी परंपरा निभाई, न राज्य सरकारों ने और न ही केंद्र सरकार ने।

ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने राजस्व बढ़ाने की मंशा से तालाबों के प्रति एक अलग ही ढंग अपनाया। उन्होंने गांवों से अधिक राजस्व इकट्ठा करने की मंशा से तालाबों को अपने हाथ में ले लिया। इससे गांवों, कस्बों और शहरों में तालाब संस्कृति को संरक्षित करने की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। इसका असर दूरगामी हुआ। अंग्रेजों के जाने के बाद लोगों में तालाबों की देखरेख करने का कर्तव्यबोध खत्म हो गया। यही वजह है कि आजादी के बाद तालाबों के प्रति लोगों में उपेक्षा और नकारात्मक भावना दिखाई देने लगी, जो आज भी दिखती है। भारत में दो-चार शताब्दी पहले ग्रामीण इलाकों में तालाब विकास और रोजमर्रा की जरूरतों के अहम हिस्सा हुआ करते थे। गांव, कस्बे का हर आदमी तालाब के सहारे अपनी पानी संबंधी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी कर लेता था। मगर वक्त के साथ विकास के नए मॉडल में तालाब अपना अस्तित्व खोते चले गए। आंकड़ों के मुताबिक 1947 में देश में कुल चौबीस लाख तालाब थे। तब देश की आबादी मौजूदा आबादी की एक चौथाई थी। अब 2017-18 में तालाबों की संख्या घट कर तकरीबन पांच लाख रह गई है। इसमें बीस फीसद बेकार पड़े हैं, लेकिन चार लाख अस्सी हजार जलाशयों का इस्तेमाल किसी न किसी रूप में हो रहा है। जिन राज्यों में पानी की किल्लत सबसे ज्यादा है, उनमें तालाब बड़ी तादाद में पाए जाते थे। आजादी के बाद जनसामान्य में तालाबों के संरक्षण और सुरक्षा की परंपरा समाप्त होती गई। तालाबों को भर कर उनका घर बनाने या खेती-बागवानी के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। अब हालत यह हो गई है कि राजधानी दिल्ली सहित देश के ज्यादातर राज्यों में पानी की किल्लत बारहों महीने बनी रहती है। इसका कारण जल की बर्बादी, जल का बहुत अधिक दोहन और संरक्षण न होना है।

आजादी के तीन साल पहले 1944 में देश में अकाल की जांच करने के लिए अकाल जांच आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रपट में कहा था कि अगर जल समस्या का कोई कारगर समाधान न खोजा गया, तो आगामी वर्षों में जल को लेकर बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है। आयोग ने सबसे कारगर समाधान के रूप में तालाबों का निर्माण और इनके संरक्षण पर जोर दिया था। लेकिन आजादी के बाद विकास के मॉडल में तालाबों को पानी उपलब्ध कराने का सबसे कारगर स्रोत नहीं माना गया। इसका परिणाम यह हुआ कि तालाब कहीं कब्जे, तो कहीं अतिक्रमण, कहीं गंदगी तो कहीं तकनीकी ज्ञान के अभाव में सूखते चले गए। आज भी इनके रखरखाव के प्रति कोई जवाबदेह नहीं है। पुराने तालाब, जो मनरेगा के तहत पानीदार बनाए गए हैं या जिनकी गाद निकाल कर उपयोगी बनाया गया है, उन तालाबों के रख-रखाव की जिम्मेदारी किसी जिम्मेदार महकमे को नहीं दी गई है। इसलिए तालाबों का संरक्षण गांव या कस्बे के स्तर पर अभी तक सुनिश्चित नहीं किया जा सका है।

तालाबों पर अतिक्रमण आम बात है। इसे संज्ञान में लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में एक मामले में व्यवस्था देते हुए कहा था कि गुणवत्तापरक जीवन हर नागरिक का मूल अधिकार है और इसको सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार का प्राकृतिक जल निकायों की सुरक्षा करना कर्तव्य है। गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गुणवत्तापरक जीवन के दायरे में जल के अधिकार की गारंटी भी शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को उसके कर्तव्य का याद दिलाना यह बताता है कि केंद्र सरकार जल जैसे जीवन का पर्याय माने जाने वाले संसाधन को, हर नागरिक को, उसकी जरूरत के मुताबिक मुहैया कराना उसकी जिम्मेदारी है। भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा में जल का संरक्षण करना हर व्यक्ति का परम कर्तव्य है। जब तक यह परंपरा चलती रही, तब तक देश में पानी की कोई किल्लत नहीं थी। राज घरानों, ताल्लुकेदारों और सेठ सरीखे व्यक्तियों के स्वभाव में जल संरक्षण था। जल संरक्षण की ऐसी अनेक घटनाएं, कथाएं और किस्से आज भी पढ़ने-सुनने को मिल जाते हैं। जनपद अयोध्या के बीकापुर तहसील में भिक्षु बाबा का कुंआ और तालाब खुदवाने का संकल्प हो या तमिलनाडु के थिरुवल्लूर जनपद के कड़पक्कम गांव के निवासियों का गांव में पानी के लिए तालाब बनाने का संकल्प, तालाब संस्कृति के संरक्षण की कहानी बयान करते हैं।

मध्यप्रदेश के देवास जनपद में लोगों के संकल्प और पुरुषार्थ से एक हजार सड़सठ तालाब बनाए गए। पर्याप्त संख्या में तालाब न होने से मध्यप्रदेश में पानी की किल्लत बनी रहती है, लेकिन देवास में पानी की किल्लत खत्म हो गई है। ऐसा ही संकल्प अगर देश के हर गांव और कस्बे में रहने वालों में हो जाए तो पानी को लेकर हाहाकार की स्थिति किसी गांव में नहीं होगी। परंपरागत तालाब संस्कृति को पुनर्जीवित किए बिना हर गांव में तालाब संस्कृति का पुनर्वास नहीं हो सकता। आज देश के दो सौ चौवन जिलों में पानी की भारी किल्लत है। इससे तैंतीस करोड़ आबादी को उसकी जरूरत के मुताबिक पानी नहीं मिल पा रहा है। देश की बाकी आबादी को भी शुद्ध पीने योग्य पानी नहीं मिल पाता है। पानी का अत्यधिक दोहन और पानी की खपत बढ़ने के कारण पिछले तीस-चालीस वर्षों में पानी की समस्या तेजी से बढ़ी है। अभी पानी की मांग प्रति व्यक्ति सौ से एक सौ दस लीटर के बीच है, जो 2025 तक बढ़ कर सवा सौ लीटर या इससे अधिक हो सकती है। उस वक्त भारत की आबादी बढ़ कर एक अरब अड़तीस करोड़ हो जाएगी। उस समय पानी की मांग करीब आठ हजार करोड़ लीटर हो जाएगी, लेकिन उपलब्धता इसकी आधी होगी। केंद्रीय मौसम विज्ञान के मुताबिक देश भर में कुल वार्षिक बारिश 1,170 मिमी होती है, और वह भी महज तीन महीने में। लेकिन इस अकूत पानी का इस्तेमाल हम महज बीस प्रतिशत ही कर पाते हैं यानी अस्सी प्रतिशत पानी को हम बगैर इस्तेमाल किए यों ही बह जाने देते हैं। अगर बरसात के पानी को संरक्षित करने की योजना पर अमल करें, तो पानी की किल्लत से ही निजात नहीं मिलेगी, बल्कि पानी को लेकर होने वाली राजनीति से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा। जिन इलाकों में बरसात बहुत कम होती है, वहां तो पाताल का पानी ही एकमात्र स्रोत होता है, वहां कैसे पानी की किल्लत से उबरा जाए, इस पर गौर करने की जरूरत है।

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