साहित्य के पन्नों पर पोलियाना नाम की बच्ची सौ साल से ज्यादा की हो चुकी है। आज एक सदी बाद भी वह अपने पाठकों को जिंदगी की मुश्किलों के बीच खुशी खोजना सिखाती है। अमेरिकी लेखिका एलेनोर एच पोर्टर का उपन्यास ‘पोलियाना’ 1913 में प्रकाशित हुआ था। पोर्टर का मानना है कि खुशी व्यक्तिगत आदत ही नहीं सामाजिक संबंध भी है।
आज के दौर में हम किसी सोशल मीडिया पोस्ट पर चमकीली प्रेरक पंक्तियां पढ़ कर उत्साहित हो जाते हैं। लेकिन दूसरी पोस्ट आते ही जीवन पहले जितना ही कठिन लगने लगता है।
कई साहित्यकारों ने बच्चों के संघर्ष को इस तरह से दर्ज किया है, जहां वयस्क भी जीवन के बड़े सबक सीख सकते हैं। ज्यों-ज्यों कहानी आगे बढ़ती है किरदार जिंदगी की पाठशाला की तरह खुलते हैं।
पोलियाना अपने पिता की मौत के बाद मौसी पाली के घर रहने आती है। मौसी के यहां रह रही पोलियाना की जिंदगी में प्यार नहीं, कठोर अनुशासन है। इसके साथ ही मिस्टर पेंडलटन और मिसेज स्नो जैसे इंसानों में वह अकेलापन, शिकायत, कठोरता और निराशा देखती है। लेकिन वह इस स्थिति से घबराती नहीं है।
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वह इनसे संवाद करती है, और सकारात्मक नजरिया हासिल करती है। गुड़िया से खेलने की उम्र में वह विकलांग हो जाती है। अब उसे चलने के लिए बैसाखी का सहारा लेना पड़ता है। विकलांगता से जूझ रही पोलियाना को अहसास होता है कि हर चीज में ऐसी कोई बात होती है जिसके लिए खुश हुआ जा सकता है।
उसके पास ऐसी क्षमता है कि वह सामने वाले का नजरिया बदल सकती है। विकलांगता की पीड़ा में भी वह उम्मीद की रोशनी से नहाई हुई लगती है।
सवाल यह भी है कि उस उम्मीद की सीमा क्या है? अन्याय या हिंसा के किसी पीड़ित या बीमार व्यक्ति को हम सकारात्मक रहने का कितना उपदेश दे सकते हैं? आज के पाठक यहीं पर पोलियाना से सवाल पूछ सकते हैं कि क्या हर पीड़ा को मुस्कान में बदल देना पीड़ित व्यक्ति की वास्तविकता को नकारना नहीं है?
यहां पर पोलियाना का जवाब हो सकता है कि मेरी जिंदगी का मकसद हमेशा खुश रहना नहीं है। मेरा मकसद उम्मीद को बचाए रखना है। वास्तविकता कहती है कि बहुत कुछ अच्छा नहीं है। वहीं पर उम्मीद कहती है कि इनके बीच भी कुछ अच्छा बनाया जा सकता है, चलो कोशिश करके देखते हैं।
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बच्चों की दुनिया बड़ों से अलग होती है। उनके पास अनुभव कम और उम्मीद ज्यादा होती है। शायद इसलिए बाल किरदारों के इस उम्मीद वाले पक्ष को सबसे ज्यादा उभारा जा सकता है।
जब बच्चे इसे पढ़ते हैं तो उन्हें लगता है कि पोलियाना कर सकती है तो हम क्यों नहीं कर सकते हैं? वहीं बड़ों को लगता है कि यह बच्ची होकर इतनी हिम्मत से जिंदगी जी रही है तो हम क्यों अपनी लड़ाई हार जाएं! पोलियाना उम्मीद की अभिव्यक्ति है।
