ताओ ने आज चीख-चीखकर पूरे घर का माहौल खराब कर दिया था। लकड़ी के बने उनके घर में उसकी आवाज गूंज रही थी, जिसकी दीवारों पर लाल सजावटी कागज की कलाकारी टंगी थी। उसने अपनी बहन नोवा को जोर से थप्पड़ मारा और उसके बाल भी खींच दिए। उससे दो साल बड़ी बहन नोवा यह सब देखकर सिर्फ आंखों में आंसू लिए खड़ी रह गई। ताओ ने उसके लिपबाम से कागज पर चित्र बना दिए थे, जिससे वह पूरी तरह खराब हो गया। यह देखकर नोवा को बहुत गुस्सा आया। उसने वह चीज उसके हाथ से छीन ली और उसे डांटना शुरू कर दिया।
इस पर ताओ और गुस्से में आ गया और मारपीट पर उतर आया। नोवा की शर्ट की झालर तक निकल गई। मेई रोज-रोज के इन झगड़ों से परेशान हो गई थी, लेकिन नोवा को हमेशा लगता कि ताओ की कितनी भी बड़ी गलती हो, उनकी मां मेई हमेशा उसी का पक्ष लेती हैं और उसे ही समझौता करना पड़ता है। आज की घटना से नोवा बहुत आहत हो गई। वह अपने कमरे में गई और जोर से दरवाजा बंद कर लिया। शाम हो गई, लेकिन नोवा कमरे से बाहर नहीं निकली। आंगन में टंगे छोटे-छोटे लाल लालटेन जल उठे थे और हल्की हवा में हिल रहे थे।
मेई को चिंता होने लगी। वह बार-बार दरवाजा खटखटाती रही। जब बहुत बुलाने पर भी वह बाहर नहीं आई, तो मेई ने धीमी आवाज में कहा, ‘तू तो समझदार है, मैं तुझसे ही उम्मीद कर सकती हूं। कृपया बाहर आ जा।’ मां की भरी हुई आवाज सुनकर नोवा ने दरवाजा खोल दिया। रोने से उसकी आंखें सूजी हुई थीं।
मेई ने उसे पास बुलाया, उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘तू तो उसकी आदतें जानती है, गुस्सा छोड़ दे।’ नोवा ने कहा, ‘मां, अब वह जरूरत से ज्यादा परेशान करने लगा है। आप उसे कुछ कहती क्यों नहीं? उसे सजा दीजिए, वह खुद ही ठीक हो जाएगा।’
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नोवा और ताओ सगे भाई-बहन नहीं थे। नोवा, मेई की बहन की बेटी थी। उनका परिवार चीन के एक शांत छोटे शहर में रहता था, जहां लोग रिश्तों और परंपराओं को बहुत महत्त्व देते थे। उसके माता-पिता एक हादसे में चल बसे थे। उस समय वह सिर्फ एक साल की थी। तब से वह मेई के पास ही है। मेई ने उसे गोद ले लिया था। अब वह उनकी अपनी ही बेटी है। मेई ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘अब तुम समझदार हो गई हो, इसलिए ताओ के बारे में सब कुछ बता सकती हूं ताकि तुम समझ सको कि मैं उसे ज्यादा क्यों नहीं डांटती।’
‘तुम्हारे आने के दो साल बाद मुझे मां बनने का सुख मिला। हमारी शादी को छह साल हो चुके थे, लेकिन हमारी कोई संतान नहीं थी। तुम्हारे आने के बाद जब मुझे यह सुख मिला, तो मैंने तुम्हें अपनी किस्मत मान लिया। लेकिन पांचवें महीने की सोनोग्राफी में पता चला कि बच्चे का विकास बहुत कम है। मेरी सेहत भी कमजोर थी। डाक्टर ने कहा कि बच्चे को बचाना मुश्किल हो सकता है। उसके दिमाग तक आक्सीजन भी ठीक से नहीं पहुंच रही थी। डाक्टर की सलाह पर उसे बाकी समय के लिए ‘इनक्यूबेटर’ में रखा गया।
आखिरी चार महीने वह उसी में रहा। उसकी देखभाल बहुत ज्यादा करनी पड़ी। मैं उसे अपना दूध भी ठीक से नहीं पिला पाती थी, इसलिए उसे पाउडर दूध दिया गया। जब भी मैं उसे गोद में लेती, वह रोने लगता। शायद उसे मशीनों के बीच रहने की आदत हो गई थी। मैं उसे कांच के अंदर ही बड़ा होते देखती रही।
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कई बार मन करता कि उसे अपने पास ले लूं, लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए खुद को रोकना पड़ता था। जब बच्चे का विकास मां की कोख की स्वाभाविक गर्माहट के बजाय मशीनों के सहारे होता है, तो उसके भीतर भावनात्मक जुड़ाव की कमी रह सकती है। मां के स्पर्श, धड़कन और स्नेह से जो रिश्ता बनता है, वह पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता।
ऐसे बच्चों के व्यवहार में अक्सर असुरक्षा, चिड़चिड़ापन और आक्रामकता दिखाई दे सकते हैं। उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है-समझ, धैर्य और बिना शर्त प्रेम की। मैं उससे जुड़ गई, लेकिन वह मुझसे उतना नहीं जुड़ पाया। इसी वजह से उसका स्वभाव गुस्सैल और कठोर हो गया। वह सबके साथ ऐसा ही व्यवहार करता है। उसे प्यार की भाषा समझाने में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।’
समय बीतता गया। ताओ सोलह साल का हो गया और नोवा अठारह की। अच्छे नंबरों से पास होने पर पापा ने नोवा को स्कूटर दिला दी। ताओ नाराज हो गया कि उसे भी स्कूटर चाहिए। मेई और पापा ने कहा कि अभी तुम छोटे हो, पढ़ाई पूरी होने पर दिलवा देंगे। एक दिन दोपहर में, जब सब आराम कर रहे थे, घर के बाहर की संकरी सड़क पर साइकिलें और छोटी गाड़ियां गुजर रही थीं, ताओ चुपके से स्कूटर की चाबी लेकर निकल गया।
सड़क पर वह तेजी से स्कूटर चला रहा था। तभी एक तेज कार से उसका संतुलन बिगड़ गया और वह टक्कर खाकर गिर पड़ा। होश आने पर उसने खुद को अस्पताल में पाया। पूरा परिवार उसके पास खड़ा था। मेई और नोवा रो रही थीं। उन्हें देखकर पहली बार उसके दिल में कुछ बदला। मेई ने उसके सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘भगवान का शुक्र है, तू बच गया’। नोआ उसका हाथ पकड़ कर सिसकने लगी। उसके इस स्पर्श से ताओ को सुकून मिला। उसे पहली बार लगा कि वह अकेला नहीं है, पूरा परिवार उसके साथ है। तभी उसके पेट में तेज दर्द हुआ। जांच में पता चला कि दवाइयों का दुष्प्रभाव पड़ा है।
डाक्टर ने कहा कि जरूरत पड़ी तो किडनी प्रत्यारोपण करना पड़ सकता है। मेई घबराकर बोली, ‘मेरी जांच कर लीजिए। मैं मां हूं। मेरी किडनी ले लीजिए।’ नोवा ने ताओ की तरफ देखा। कमरे की खामोशी में जैसे सिर्फ उनकी सांसों की आवाज रह गई थी। उसकी आंखों में पछतावा और डर साफ दिखाई दे रहा था। वह आगे बढ़ी और भीगे लेकिन दृढ़ स्वर में बोली, ‘नहीं मां, यह अधिकार सबसे पहले मेरा है। जिस भाई से मैं रोज लड़ती रही, आज उसी के लिए मैं पीछे कैसे हट जाऊं? अगर उसके जीवन में मेरी कोई जगह है, तो उसे बचाने का हक भी मेरा ही है।’
यह सुनकर ताओ अंदर से हिल गया। उसे अपनी हर गलती याद आने लगी। उसका गुस्सा, उसकी जिद, उसका बुरा व्यवहार और वही नोवा आज उसके लिए खड़ी थी। वह खुद से पूछ रहा था कि क्या वह इस प्यार के लायक है? पहली बार उसे अपने व्यवहार पर सच में पछतावा हुआ। उसने मन ही मन कहा कि भगवान, मुझे एक मौका दे दो, मैं बदल जाऊंगा। तभी डाक्टर अंदर आए। उनके चेहरे पर गहरी शांति थी। उन्होंने कहा, ‘बधाई हो! ताओ की हालत तेजी से सुधर रही है। शायद आपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।’ अब खिड़की के बाहर हल्की ठंडी हवा बह रही थी और दूर कहीं मंदिर की घंटियों की धीमी ध्वनि सुनाई दे रही थी।
