मैं जिंदगी की तरफ मुड़कर देखती हूं तो सोचती हूं कि आखिर मैंने जिंदगी से चाहा क्या था और मुझे मिला क्या? मैंने कभी आसमान के तारे नहीं मांगे थे। बस इतना चाहा था कि हम एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करें। यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना था। मेरी उम्र अब पैंतालिस वर्ष से अधिक हो चुकी है। जब मैं इक्कीस साल की थी, तब मां ने एक दिन साफ शब्दों में कहा, “हम तेरी शादी के बारे में सोच रहे हैं।”

मैंने विरोध किया था। कहा था कि मुझे अभी शादी की कोई जल्दी नहीं है। मेरी उम्र ही क्या है? लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं सुनी। जवाब मिला, “लड़का अच्छा है। घर का अपना कारोबार है। परिवार भी अच्छा है।”

उस समय बेटियां जल्दी शादी के बोझ की तरह देखी जाती थीं। आज हालात बदल गए हैं। लड़कियां पढ़-लिख रही हैं, करियर बना रही हैं और पच्चीस साल के बाद शादी के बारे में सोचती हैं। मां-बाप भी अब उनकी राय पूछने लगे हैं। लेकिन क्या इतना बदल जाने के बाद भी औरत अपना स्वतंत्र अस्तित्व हासिल कर पाई है?

मेरे परिचय में कई अंतरजातीय विवाह हुए। शुरुआत में परिवारों ने विरोध किया, लेकिन बाद में वही रिश्ते स्वीकार कर लिए गए। मेरी भी अपनी पसंद थी। लेकिन मां जानती थीं कि पिता उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। मेरी पसंद पापा के दोस्त श्याम अंकल का बेटा निखिल था। श्याम अंकल बड़े व्यापारी थे। उनके यहां हर आयोजन बड़े ठाठ-बाट से होता था। वे बेटे की शादी भी किसी संपन्न परिवार में करना चाहते थे।

हमारे घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी। भाई इंजीनियरिंग पढ़ रहा था और छोटी बहन की पढ़ाई का खर्च भी था। पापा को डर था कि कहीं रिश्ते की बात से दोस्ती में दरार न आ जाए। निखिल भी कमजोर निकला। उसने अपने घर में अपनी पसंद का जिक्र तो किया, लेकिन कभी मजबूती से अपने प्रेम के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ। उसने मुझसे मिलकर सिर्फ अपनी मजबूरी बताई और फिर किसी दूसरी लड़की से शादी कर ली।

उस दौर में प्रेम-विवाह को स्वीकार करना आसान नहीं था। मेरी मोहब्बत वहीं दफन हो गई। मेरी शादी भी तय हो गई। शादी के बाद ही एक रात मेरे पति ने कहा, “तुम मेरी पसंद नहीं हो। तुम्हें मेरे पल्ले बांध दिया गया है।”

फटी रजाई के छेदों से झांकता चांद, जिसने अमीर आदमी को रुला दिया | पढ़िए सुधीर सोनी की भावुक कहानी

यह वाक्य मैंने जिंदगी में हजारों बार सुना। हर बार मेरे भीतर कुछ टूटता रहा। बाद में पता चला कि वह भी किसी दूसरी लड़की को चाहता था और आज तक उसे भुला नहीं पाया था। बीस साल का वैवाहिक जीवन इसी उपेक्षा और अपमान में गुजर गया। एक बार तलाक की नौबत भी आई, लेकिन समाज और माता-पिता के दबाव में मैं वापस समझौता कर बैठी।

फिर एक दिन मैंने फैसला किया कि कुछ समय अकेले रहूंगी। पति और बच्चों से दूर बिताए गए वे दिन मेरे लिए खुद से मिलने के दिन थे। मैं समझना चाहती थी कि क्या मैं अकेले अपने लिए जी सकती हूं। बीस वर्षों में मैंने कभी अपने बारे में सोचा ही नहीं था। जिम्मेदारियों ने मेरी जिंदगी मुझसे छीन ली थी। मुझे महसूस हुआ कि अगर मैं आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर होती तो शायद मेरी जिंदगी इतनी बदहाल नहीं होती।

पहले मायका ही लड़की का सबसे बड़ा सहारा माना जाता था। लेकिन जब मैं अपने माता-पिता के घर पहुंची तो वहां भी हालात बदल चुके थे। जिन्होंने हमेशा कहा था कि यह घर तुम्हारे लिए हमेशा खुला है, वही अब कहने लगे, “तुम परिवार की मर्जी से नहीं आई हो। तुम्हारे पति ने कहा है कि वह लेने नहीं आएगा। जैसे आई हो, वैसे ही लौट जाओ।”

मेरी दोनों बेटियां भी अपनी डिजिटल दुनिया में व्यस्त थीं। उनका कहना था कि अगर मां अलग रहना चाहती है तो यह उसकी इच्छा है। रोज-रोज के झगड़ों से बेहतर है कि दोनों अलग-अलग रहें। कभी-कभी मुझे लगता था जैसे मैं कभी औरत थी ही नहीं। पति अक्सर कहते, “जहां जाना है चली जाओ।”

एक मटके पानी से शुरू हुई बदलाव की कहानी | तपती दीवारों के बीच

बाद में पछताते भी थे, लेकिन तब तक मेरे हिस्से में सिर्फ अपमान ही आता था। मैं कभी उस खिड़की से बाहर झांक ही नहीं पाई, जहां जिंदगी मुस्कुरा रही थी, जहां ताजे फूलों की खुशबू थी। घर के रोज-रोज के झगड़ों का असर बच्चों पर भी पड़ने लगा था। हर फैसले में सिर्फ पति की शर्तें चलती थीं। अपमानों की सूची लगातार लंबी होती जा रही थी।

आखिर मैंने अपने बारे में फैसला किया। मैंने खुद से कहा, “मेरी औकात छोटी सही, मैं एक साधारण औरत सही, लेकिन मैं तुम्हारी पत्नी थी। मुझे दया नहीं, अपने हिस्से का प्यार, सम्मान और परवाह चाहिए थी।” मुझे मनहूस कहा गया। पति के व्यापार में घाटा हुआ तो उसका दोष भी मेरे सिर मढ़ दिया गया।

वह कहते थे कि बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं करते, लेकिन व्यवहार में उनका दोहरापन साफ दिखाई देता था। पति की उपेक्षा के साथ-साथ परिवार की संवेदनहीनता ने मुझे भीतर तक तोड़ दिया। बीस साल तक उलझनों में जीने के बाद मैंने तय किया कि अब वापस नहीं लौटूंगी। मैंने सोचा कि बच्चों की जिम्मेदारी मैं खुद उठाऊंगी और जरूरत पड़ी तो कानूनी लड़ाई भी लड़ूंगी। आखिर मेरे भी कुछ अधिकार हैं।

भरे घर में सुक्खो देवी ने अकेली काट दी सबसे लंबी आखिरी रात | कहानी

लेकिन इसी मोड़ पर एक मां फिर हार गई। बच्चों ने साफ कह दिया, “हम अकेले किसी एक के साथ नहीं रहेंगे। अगर आप दोनों साथ नहीं रह सकते तो हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए। हम खुद को अनाथ समझ लेंगे।”

उन्होंने कहा, “अगर अपने-अपने अहंकार और अस्तित्व की लड़ाई लड़नी थी तो हमारे जन्म से पहले फैसला कर लेते।” बच्चों की बात सुनकर मेरे सारे फैसले बदल गए। कुछ दिनों बाद मैं फिर उसी घर लौट आई। वह घर, जहां मेरे हिस्से में आंसुओं के अलावा कुछ भी नहीं था। एक औरत फिर हार गई थी। लेकिन इस बार हार सिर्फ पत्नी की नहीं थी, एक मां की भी थी।