‘मैं बहुत टेंशन में हूं। एक हफ्ते पहले तक ज्यादा लोगों को पता नहीं था। अब तो मेरे घर वाले चिंता में आ गए हैं कि क्या हो रहा है? बहुत नफरत मिली। मेरी नौकरी चली गई। अब तो मुझ पर केस भी दर्ज हो गया।’

370 रुपए की बिरयानी की टिप्पणी करने वाले हिमांशु जांगड़ा को यकीन नहीं हो रहा कि उनके साथ ऐसा भी हो सकता है। सोशल मीडिया पर छिड़ी मुहिम के कारण पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं जब ऐसी टिप्पणियों पर बड़ी कार्रवाई हो जाती है, जिसे हम बहुत छोटा समझने की गलती करते हैं।

सोशल मीडिया की मुहिम का असर देखने के बाद हम थोड़े आश्वस्त होते हैं कि समाज में ऐसी कुत्सित सोच पर रोक लगेगी, जिसमें स्त्री को एक वस्तु की तरह देखा जाता है। लेकिन देखने में यह आया है कि ऐसी ही कोई शिकायत अगर सोशल मीडिया के इतर आम जीवन में होती है तो हम सब आंखें मूंद लेते हैं। मान लीजिए, ऐसा वाक्या किसी दफ्तर में होता है। दफ्तर में कोई लड़की शिकायत करती है कि उसका सहकर्मी उसे द्विअर्थी बातें बोलता है।

ऐसी किसी शिकायत पर पहली मुहिम शुरू होती है शिकायतकर्ता की कमी निकालने की। उसे काम नहीं करना पड़े, इसलिए शिकायत कर रही है, उसका काम अच्छा नहीं था और टोके जाने पर शिकायत कर रही है। जिस पुरुष की शिकायत की जाती है, वह दफ्तर के लिए सबसे काम का साबित हो जाता है।

जांगड़ा के उदाहरण से सोचा जा सकता है कि जो सार्वजनिक मंच के कार्यक्रम में इस तरह से बोल सकता है तो उस समय उसकी जुबान कैसी होती होगी, जब उसके आस-पास इतने ज्यादा लोग नहीं होते होंगे।

कहते हैं कि किसी घटना की पहले कोई लाल झंडी होती है। लाल झंडी तो बहुत पहले से दिख रही है। टेलवीजिन के ज्यादातर हास्य कार्यक्रमों में पहले लोगों के रूप-रंग का मजाक उड़ाया जाता है तो हम अपने परिवार के साथ ठठा कर हंसते हैं। फिर अश्लीलता का हलका तड़का लगता है। हम सपरिवार हंसते हैं। फिर इंटरनेट पर 370 की बिरयानी जैसा मामला आता है तो हम न्यायप्रिय दिखने की कोशिश में जुट जाते हैं।

किसी स्त्री के साथ गलत के विरोध में जब जमीन पर दस लोग भी साथ नहीं आते हैं तो वैसे ही किसी संदर्भ में सोशल मीडिया पर लाखों लोग कैसे आ जाते हैं? इसका एक ही कारण है कि वहां शिकायतकर्ता और आपके रुख की आमने-सामने की पहचान नहीं है। वह आपकी रिश्तेदार, सहयोगी नहीं है। जमीन पर किसी के लिए इंसाफपसंद रुख रखने में आम लोग सौ दफा सोचते हैं कि इससे कहीं मेरा नुकसान तो नहीं हो जाएगा?

दफ्तर का प्रशासन सोचेगा कि इतने काबिल आदमी पर एक महिला की शिकायत पर कैसे कार्रवाई कर दें? लेकिन सोशल मीडिया पर किसी दूर के मसले पर लाइक, कमेंट और साझेदारी बहुत आसान है। वहां इंसाफ मांगने में हमारी कोई निजी हानि नहीं है, हमारी दोस्ती को कोई नुकसान नहीं है। इसलिए सोशल मीडिया वाला दूर का इंसाफ सुहाना लगता है।