बहुत सोचा। लगा सोच-सोच कर जैसे हार ही गया हो। पर होलू को हारना पसंद भी तो नहीं है। खुद से हारना तो और भी अच्छा नहीं लगता। असल में उसे एक खास तरकीब की तलाश थी। पर इस बारे में वह किसी को बताना भी नहीं चाहता था। तरकीब थी कि सूझ ही नहीं रही थी। गुस्से में उसने सोचा, ‘वैसे तो जब देखो तब मेरे आसपास मंडराती रहती है। पर आज नखरे दिखा रही है। कहां खोजूं। पहले तो सूझ को ही खोजना होगा न? तभी तरकीब मिलेगी।’
परेशान सा होकर अपनी कुर्सी पर ही वह खिसक कर लेट-सा गया। जाने कब उसकी आंख भी लग गई। उठा तो उसे हमेशा की तरह लूलू की याद आई। झट जा पहुंचा लूलू के पास। पहुंचते ही पूछा, ‘लूलू क्या तुमने मेरी सूझ को देखा है?’ ‘सूझ?’ लूलू ने थोड़ा चकराते हुए होलू की ओर देखा। ‘हां सूझ। कब से एक तरकीब खोज रहा हूं। सूझ है कि बता ही नहीं रही है। बताएगी भी कैसे। जाने कहां चली गई है।’ होलू ने पूरी तरह उदास होकर कहा।
लूलू को सुनकर थोड़ी हंसी तो आई, लेकिन उसे रोकते हुए पूछा, ‘अच्छा पहले यह बता कि किसी की भी सूझ रहती कहां है?’ होलू ने कहा, ‘दिमाग में। मैंने तो उसे वहीं से आते हुए देखा है।’ लूलू ने पूछा, ‘तो अपने दिमाग में खोजा उसे?’ होलू ने परेशान होकर कहा, ‘पर वह तो मिल ही नहीं रही।’ ‘तो दिमाग को ताजा करने वाली पुस्तकें पढ़ीं क्या? सूझ वहां भी तो छिपी रहती है। तरह-तरह के रूप धर कर। मैं तो कहता हूं कि वहां भी खोज कर देख ले।’ लूलू ने सलाह दी।
होलू चला आया। सोचा कि मां से ही पूछूंगा। उनके पास तो मेरी हर समस्या का समाधान होता है। मां आंगन में बैठी गेहूं से कंकड़ बीन रही थी। होलू को देखा तो मां ने पूछा, ‘क्या हुआ होलू? ‘मां मुझे मेरी सूझ नहीं मिल रही है?’ होलू ने अपनी आदत के अनुसार बिना किसी भूमिका के सीधे-सीधे पूछ लिया। ‘तो अपने दिमाग को हिला-डुला न।’ मां ने मुस्कुराते हुए कहा। मां समझ गई थी कि होलू के दिमाग में जरूर कुछ खास चल रहा है। ‘पर मां मुझे एक तरकीब जाननी थी। सूझ बता ही नहीं रही है। आसपास हो तभी न बताएगी।’ होलू ने सिर हिलाते-डुलाते हुए कहा।
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‘अच्छा तो यह बात है। कहीं तेरी सूझ मुझमें तो नहीं आ छिपी? देखती हूं।’ मां ने कहते हुए हाथ से सिर में दिमाग को टटोलना शुरू किया। ‘मिली क्या मां?’ होलू ने उत्सुकता के साथ पूछा। ‘मिल तो नहीं रही।’ मां ने कहा। ‘तो मैं अब क्या करूं मां?’ ‘तू चिंता क्यों कर रहा है। जब तक तेरी सूझ नहीं मिल रही, तू मेरी सूझ से काम चला ले। अच्छा बता कैसी तरकीब चाहिए तुझे?’ मां ने कहा।
होलू ने कुछ देर मां को देखा। फिर वहां से जाने को हुआ। मां को अजीब लगा। सोचने लगी कि अचानक होलू को हुआ क्या। होलू अंदर जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। कुछ सोचने लगा। थोड़ी देर बाद होलू फिर बाहर आया। आते ही कहा, ‘मां मैं क्यों बताऊं कि मुझे कैसी तरकीब चाहिए।’ ‘तू नहीं बताएगा तो मेरी सूझ कैसे बताएगी तेरे पसंद की तरकीब।’ मां ने कहा। ‘पर मां वह तो मेरा राज है।’ होलू ने कहा।
‘तब तो तुझे अपनी सूझ के मिलने का ही इंतजार करना होगा।’ मां ने चेहरे पर परेशानी का भाव लाते हुए कहा। होलू को विश्वास है कि मां जरूर मदद करेगी। होलू ने थोड़ा समझदार बनते हुए कहा, ‘अगर कोई बच्चा अपनी मां को बहुत-बहुत खुश करना चाहे तो क्या करे?’ ‘मां तो अपने बच्चे से हमेशा खुश रहती है होलू। फिर भी मां से लिपट कर अपने मन की बात कहे तो मां को अच्छा लगता है। ‘बच्चे के मन की बात सुनकर क्या मां को गुस्सा नहीं आता? बात अच्छी न हो तब भी?’ होलू ने पूछा। ‘बात अच्छी न हो तब तो मां को जरूर बतानी चाहिए। तभी तो मां अपने बच्चे को बुरी बात से बचने की तरकीब बताएगी।’ मां ने समझाते हुए कहा।
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होलू बोल पड़ा, ‘मां मुझे गुस्सा क्यों आया? क्यों मैंने गाली भी बक दी। क्यों इतना खराब-खराब कहा?’ मां ने प्यार से पूछा, ‘होलू किस पर गुस्सा आया और किस बात पर आया?’ होलू ने बताया, ‘मां मुझे अपने प्यारे दोस्त अनुज पर गुस्सा आया। उसने मेरी पेंसिल छिपा दी थी। मास्टरजी से डांट भी पड़वा दी। बाद में जब मैंने गुस्सा किया तो उसने कहा कि उसने तो मजाक में थोड़ी देर के लिए पेंसिल छिपाई थी। पर तभी मास्टर जी आ गए थे। वह कसम भी खा रहा था कि वह मास्टर जी से डांट नहीं खिलाना चाहता था। पर मुझे तो गुस्सा ही बहुत आ गया था। मैंने उसे बहुत बुरा-बुरा कहा।’
मां को सारी बात समझ आ गई थी। अनुज का मजाक होलू के लिए गलतफहमी बन गया था। उसे लगा कि अनुज ने उसकी पेंसिल मास्टरजी से उसे डांट खिलाने के लिए छिपाई थी। उसने देखा, होलू की आंखों से पछतावा टपकता जा रहा था। मां ने पूछा, ‘अब तू करेगा क्या?’ ‘मां, मुझे तो यही सूझ रहा है कि कल अनुज को मिलते ही गले लगा कर माफी मांग लूंगा। वह खुश भी हो जाएगा।’ होलू ने कहा।
‘होलू अब तो तू भी बहुत खुश है न। तेरी सूझ तो पूरी तरह लौट आई है।’ मां ने कहा। ‘हां मां तेरी सूझ ने मेरी सूझ को खोज लिया।’ होलू ने कहा। होलू मां से लिपटा हुआ था। मां भी उसके सिर के बाल सहला रही थी। मानो सूझ भी दिमाग में बैठी खुशियां मना रही थी।
